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  • Feb 16 2018 3:48PM

रोन्हे गांव में कभी पानी के लिए करनी पड़ती थी मशक्कत, आज घर तक पहुंच रहा है पानी

रोन्हे गांव में कभी पानी के लिए करनी पड़ती थी मशक्कत, आज घर तक पहुंच रहा है पानी

पवन कुमार

खूंटी जिले के तोरपा प्रखंड की हुसीर पंचायत में है रोन्हे गांव. जंगलों से घिरे इस गांव का इतिहास गवाह है कि किस तरीके से प्रकृति का वरदान रोन्हे के लिए पहले अभिशाप था. इसकी पहचान नक्सल प्रभावित गांव के रूप में थी. हाथियों का आतंक अलग, लेकिन गांव की महिलाओं की बेहतर सोच, कुछ करने की इच्छा और एकता ने आज गांव की तस्वीर बदल दी है. आज गांव के तीन टोलों के घरों में पाइपलाइन के माध्यम से सोलर पंप के जरिये जलापूर्ति हो रही है. 

कड़ी मेहनत के बाद मिली सफलता

पहले रोन्हे गांव में पानी की काफी किल्लत थी. खासकर गर्मी के दिनों में तो समस्या और बढ़ जाती थी. पानी के लिए रात-रात भर जागना पड़ता था. रात 12 बजे से एक बजे के बीच पानी भरने के लिए घर से बाहर जाना पड़ता था. गांव से दूर कुएं से पानी निकालते वक्त हाथियों का भी खतरा बना रहता था. इस परेशानी को देखते हुए ग्रामीण महिलाओं ने इस समस्या के समाधान का निश्चय किया. एक समूह बनाया और इस समूह को प्रदान का मार्गदर्शन मिला. गांव में ग्रामसभा का आयोजन कर पानी टंकी लगाने का प्रस्ताव पारित हुआ. महिलाओं ने वर्ष 2011 में नल जल प्रबंधन समिति का गठन किया. गांव में कुआं खोदने के लिए गांव के मुंडा और प्रबंधन समिति के कोषाध्यक्ष ने पानी टंकी बनाने के लिए अपनी-अपनी जमीन दी. पूरे गांव में पानी आपूर्ति के लिए पाइपलाइन बिछायी गयी और 25 दिसंबर 2013 से ग्रामीणों के घरों में पानी पहुंचना शुरू हो गया. योजना में कुल 29 लाख 22 हजार रुपये की लागत आयी. फिलहाल तीन टोली के 85 परिवारों तक इसका लाभ पहुंच रहा है. 

पानी के लिए हर परिवार से लिये जाते हैं 60 रुपये

रोन्हे गांव के केंदटोली, मुंगा टोली और घुरा टोली में कुल 113 परिवार रहते हैं, लेकिन सिर्फ 85 परिवार ही पानी का लाभ उठा रहे हैं. लाभ उठानेवाले परिवारों को हर माह 60 रुपये पानी के लिए देने पड़ते हैं. बाकी परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी नहीं है कि वो पानी के लिए हर माह 60 रुपये भी दे सकें. इस वजह से वो परिवार कुएं या चापाकल का पानी पीते हैं. पाइपलाइन के माध्यम से घरों में पानी आपूर्ति करने के लिए एक ऑपरेटर की नियुक्ति की गयी है, जिसे पारिश्रमिक के तौर पर हर महीने 1500 रुपये दिये जाते हैं. पानी की टंकी की सफाई, ब्लीचिंग पाउडर डालने और पाइपलाइन की मरम्मत समेत अन्य की जिम्मेवारी जल समिति की है. प्रत्येक मंगलवार को जल नल प्रबंधन समिति की बैठक होती है. अब गांव में जल संरक्षण पर कार्य करने को लेकर विचार किया जा रहा है.

बरसात में होती है परेशानी

पीने की पानी की समस्या का तो हल निकाल लिया गया है, लेकिन बरसात के मौसम में समस्याओं का सामना करना पड़ता है. दरअसल जलापूर्ति के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. बरसात के मौसम में धूप कम होने पर मोटर नहीं चल पाता है, तो पानी की सप्लाइ नहीं हो पाती है. इस पर प्रबंधन समिति का कहना है कि अगर एक बड़ा ट्रांसफॉर्मर लगा दिया जाये, तो बारिश के दिनों की समस्या खत्म हो जायेगी. इसके अलावा लाभुकों द्वारा सही समय पर पैसे का भुगतान नहीं करना भी एक समस्या है, क्योंकि सही समय पर पैसे नहीं मिलने से टंकी के रख-रखाव के कार्यों में परेशानी आती है.

रात 12 बजे कुएं में घुस कर निकालते थे पानी : भोसा गुड़िया

गांव के बुजुर्ग भोसा गुड़िया बताते हैं कि पहले सूखा गांव होने के कारण ही गांव का नाम रोन्हे पड़ा, क्योंकि मुंडारी भाषा में रोहड़ो रोने का मतलब सूखा गांव होता है. वह बताते हैं कि वो दिहाड़ी मजदूरी का कार्य करते हैं. फिलहाल वो अपने घर के लिए शौचालय का निर्माण करा रहे हैं. पहले उनके गांव में पानी की बहुत दिक्कत थी. गर्मी के मौसम में वो रात 12 बजे तो कभी एक बजे घर से दूर कुएं से पानी लाने जाते थे. कुएं के अंदर जाकर छोटी कटोरी से पानी एक बड़े बर्तन में भरते थे और उनकी पत्नी उसे ऊपर रखती थी. स्थिति यह थी कि अगर कोई ग्रामीण पानी लेने में देरी करता था, तो दूसरे दिन उसे पानी नहीं मिलता था. 

कुएं में डूबने से हुई थी चार की मौत : बिरसमनी देवी

नल जल प्रबंधन समिति की सदस्य बिरसमनी देवी कहती हैं कि पहले दिन में भी बच्चों को छोड़ कर घर से दूर पानी लेने के लिए जाना पड़ता था. गर्मी के मौसम में यह समस्या और बढ़ जाती थी, क्योंकि गर्मी के दिनों में नहाने-धोने व कपड़े धोने तक के लिए पानी नहीं मिलते थे. बरसात के मौसम में कुएं में पानी भरने के दौरान गांव में चार लोगों की मौत भी हो चुकी है. 

पहले दिन भर पानी भरना पड़ता था : मरसा गुड़िया

मरसा गुड़िया बताती हैं कि उसके परिवार में सास-ससुर समेत सात लोग थे. इसके अलावा घर में गाय, बैल और बकरी भी थी. दिनभर पानी भरना पड़ता था. 30 लीटर वाले बरतन में पानी ढोकर लाती थी. परेशानी तब होती थी, जब कुओं में पानी कम होने के कारण बाल्टी से थोड़ा-थोड़ा पानी निकलता था और उसी से बड़े बरतन को भरना पड़ता था. अब यह समस्या दूर हो गयी है. 

पानी ने महिलाओं की जिंदगी को बनाया आसान : सरोज डांग 

नल जल प्रबंधन समिति की अध्यक्ष सरोज डांग ने बताया कि वो खुद भी पानी की समस्या को लेकर काफी परेशान रही हैं. खासकर बरसात के मौसम में खेत से काम करके लौटने के बाद शाम में पानी भरने जाना बहुत बड़ी परेशानी थीं. शाम में अंधेरा होता था. रास्ते में कीचड़ होती थी और सांप का डर अलग से होता था. अब इससे राहत मिल गयी है.