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  • Jan 19 2017 9:49AM

नोटबंदी के बाद : ग्रामीण बैंकों में बढ़ी भीड़, ग्रामीणों के लिए मददगार बन रहीं बैंक सखी

नोटबंदी के बाद : ग्रामीण बैंकों में बढ़ी भीड़, ग्रामीणों के लिए मददगार बन रहीं बैंक सखी
आठ नंवबर की मध्यरात्रि से 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट के चलन पर रोक क्या लगी, हर कोई अपने पुराने नोट को बदलवाने के लिए बैंक की ओर रुख करने लगा. ऐसे में दूर-दराज के ग्रामीण भी बैंकों में जाने लगे, लेकिन बैंकिंग कार्य में होनेवाले तामझाम से उनके पैर बैंक पहुंचने से पहले ही रुकने लगे. तब बैंक सखी के रूप में बैंक में कार्यरत एसएचजी महिला सदस्य इन ग्रामीणों के लिए मददगार बन कर सामने आयीं. बैंकों में ग्रामीणों की जमा व निकासी राशि के लिए भरपूर सहयोग कर रही हैं बैंक सखी. साथ ही अपने खातों में दूसरों की नकद राशि जमा नहीं कराने को लेकर ग्रामीणों को जागरूक भी कर रही हैं, ताकि बाद में ग्रामीण किसी परेशानी में ना पड़ें. बैंक सखी के सकारात्मक सहयोग का ही परिणाम है कि अब दूर-दराज के भी ग्रामीणों ने बेझिझक बैंकों में आकर 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बदलवाये और अब अपने खाते में राशि जमा या निकासी कर रहे हैं.
 
बैंकिंग में सहयोग देती हैं बसंती
 
रांची के कांके स्थित होचर के पंजाब नेशनल बैंक के शाखा में बैंक सखी के तौर पर काम कर रही है बसंती देवी. केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद अन्य बैंक कर्मियों की तरह इनका काम भी अचानक बढ़ गया है. बसंती देवी प्रतिदिन 150-200 बैंक ग्राहकों के निकासी या जमा फार्म भर रही हैं क्योंकि आजकल 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को बदलने के लिए हर तबके के लोग बैंक में आ रहे हैं. चूंकि बैंक ग्रामीण इलाकों में स्थित है इसलिए बैंक आने वाले महिला-पुरुष व युवाओं को बैंकिंग प्रक्रियाओं में सहयोग कर रही है. 
 
बैंक ने भी अपने एक कर्मी ग्राहकों को सहयोग करने के लिए उपलब्ध करा रखा है, लेकिन नोट बदलवाने वालों की इतनी भीड़ है कि एक आदमी कम पड़ जाता है. बसंती देवी कहती हैं कि नौ नवंबर से मैं सुबह 10 बजे आती हूं तो शाम पांच बजे ही काम से फुर्सत मिल पाता है. लोग मेरे टेबल के चारों ओर भीड़ लगा देते हैं और हर कोई को अपना फार्म पहले भरवाने का जल्दी होती है. वहीं बात करते-करते बसंती मायूस भी हो जाती है. कारण पूछने पर कहती है कि मार्च महीने से बैंक सखी के रूप में काम कर रही है. आठ महीनों से बिना पैसों के काम कर रही है. कहती हैं, एक साल के अपने बच्चे को छोड़कर बैंक में आती हूं. पहले एसएचजी समूह को प्रशिक्षण देने आये प्रशिक्षक ने कहा था कि पहले एक साल तक आपके काम को देखा जायेगा फिर आपको वेतन मिलेगा. एक साल होने का इंतजार कर रही हूं. 
 
पुष्पा सिंह के सहयोग से ग्रामीणों का काम हुआ आसान
 
सोनम 
 
नोटबंदी के इस माहौल में जब पूरा देश बैंक की कतारों में खड़ा है तो सुदूर गांवों की सुध लेकर बैंकिंग सुविधाएं मुहैया कराने में आजीविका बैंक सखी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. 
 
बैंक सखी के रूप में प्रशिक्षित की गयी गांव की ये महिलाएं ग्रामीणों को पैसे बदलने से लेकर उनके अनुतरित सवालों की जिज्ञासा को खत्म करने का काम बखूबी कर रही है. ऐसी ही पलामू जिले के छतरपुर प्रखंड में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में बैंक सखी के रूप में पदस्थापित हैं पुष्पा सिंह. एक साल पहले पुष्पा जेएसएलपीएस के तहत हीरा आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी. समूह से जुड़ने से  पहले पुष्पा के लिए आमदनी का स्त्रोत कहीं से भी नहीं था. पुष्पा ने ग्रेजुएशन तक की पढाई पूरी की हुई है. आजीविका सखी मंडल की अन्य सदस्यों ने पुष्पा को बैंक सखी के रूप में चुना. परीक्षा और इंटरव्यूह के तहत सफलता प्राप्त कर पुष्पा आज स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, छतरपुर में बैंक सखी के रूप में कार्यरत है. 
 
बैंक सखी के रूप में पुष्पा को विभिन्न प्रकार के कार्य करने होते हैं. पुष्पा आजीविका सखी मंडल से जुड़ी अन्य सदस्यों का खाता खोलने का काम करती है. अभी तक पुष्पा ने कुल छइ सौ सदस्यों का जन धन योजना के तहत खाता खुलवाया है. यहां तक की कुल 241 आजीविका समूह मंडल का बैंक लिंकेज भी करवाया है, जिसमे प्रति समूह को एक लाख के बैंक लिंकेज की राशि उनके खाते में डलवाने का काम कर चुकी है. 
सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बंद कर देने के फैसले पर पुष्पा कहती है कि आजीविका सखी मंडल के सदस्यों ने नोटबंदी को लेकर ग्रामीणों को कोई परेशानी ना हो, इसके लिए सहयोग देते हुए ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है. वहीं पुष्पा फोन के जरिये आजीविका सखी मंडल के सदस्यों को आवश्यक जानकारी भी दे रही है. यहां तक कि ग्राम संगठन की मीटिंग में खुद  जाकर आजीविका सखी मंडल के सदस्यों को बताती है कि वो अपने समूह के या फिर स्वयं के पास रखे हुए  500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को अपने खाता में 30 दिसंबर तक जमा करवा ले. सरकार के इस फैसले के बाद बैंक में लोगों का जैसे सैलाब सा जुटने लगा है. ऐसे में पुष्पा हर तरह की जानकारी देने में तनिक मात्र भी पीछे नहीं हटती है. आजीविका सखी मंडल की सदस्यों के लिए बैंक में अलग से एक लाइन बनाया गया है, जिसमें पुष्पा सिंह आजीविका सखी मंडल के सदस्यों को खाता भरने से लेकर रकम जमा और निकासी कराने का कार्य कर रही है. पुष्पा बताती है कि वो दीदियों से उनका एक आधार कार्ड के फोटो कॉपी लाने को कहती है और फिर उसमें उनका हस्ताक्षर करवा कर पैसे उनके खातों में जमा करवा रही है. 
 
शक्ति स्वयं सहायता समूह के सदस्य करुणा देवी ने बताया कि पुष्पा दीदी के आ जाने से बैंक आने में अब  डर नहीं लगता है. वो हमें हर तरह की सही-सही जानकारी देती है. यहां तक कि मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं, फिर भी बैंक आती हूं तो पुष्पा दीदी मेरा पर्चा भर देती है और फिर में अपना अंगूठा लगा कर अपनी राशि आसानी से जमा कर देती हूं. ऐसे में मुझे बैंक के काम में बहुत ही राहत मिल गया है. मेरे पास कुछ 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट रखे हुए थे जिसे पुष्पा दीदी ने मेरे आधार कार्ड की कॉपी से मेरे खाते में जमा करवाने में मेरी बहुत मदद की है.  सरकार के इस फैसले के बाद से पुष्पा सिंह जैसे बैंक सखियों के वजह से आजीविका सखी मंडल के सदस्यों को बैंक के काम में बहुत ही राहत मिली है. उन्हें बैंक आने में डर नहीं लगता और वो आसानी से अपना काम करवा पा रही है.
 
बैंक सखी मेरे लिए वरदान है : जौनी उरांव 
 
कांके प्रखंड के इकम्बा गांव से 75 वर्षीय वृद्ध महिला जौनी उरांव भी नोट बदलवाने के लिए बैंक पहुंची. कहती है, इतनी उम्र हो गयी है कि अब हाथ भी नहीं काम करता. ऐसी स्थिति में बैंक का फार्म भरना दूर की बात है. बैंक सखी के रहने के कारण आसानी से बैंक से पैसे निकाल या जमा करा पा रही हूं. कहती है, बैंक सखी के बैंक में नहीं रहने पर फार्म भरने के लिए दूसरे लोगों से निवेदन करना पड़ता है लेकिन सभी काम व्यस्त रहने के कारण उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता है. ऐसे में बैंक सखी की कमी खलती है. जौनी कहती हैं नोटबदी से उत्पन्न स्थिति में बैंक सखी बसंती देवी एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह काम कर रही है. 
 
बैंक आने पर बैंक सखी को ही करती हूं याद : मुनकी देवी
 
कांके प्रखंड के होचर गांव निवासी मुनकी देवी एसएचजी सदस्य है. साक्षर हैं, पर बैंक में जब आती है तो बैंक सखी बसंती देवी को ही सबसे पहले याद करती है. मुनकी देवी कहती हैं कि मुझे बैंक से पैसा निकालने या जमा कराने बैंक सखी का बहुत सहयोग मिलता है. कुछ दिन पहले से जब 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बैंक में बदले जा रहा हैं, तो लंबी-लंबी लाइनों के कारण महिलाएं काफी परेशान थी. ऐसे में फार्म भरने व जमा करने में बैंक सखी बसंती देवी ने बहुत मदद की. 
 
बैंक सखी गंभीरता से सुनती हैं हमारी समस्याएं : राजदर्शन महतो
 
होचर के पीएनबी शाखा में पैसे बदलवाने आये राजदर्शन महतो कहते हैं, महिला बैंक सखी हमारी समस्या को गंभीरता से सुनती है और हर किसी का बैंक फार्म बिना परेशान हुए भरती है, यह बहुत बड़ी बात है. ऐसे बैंक सखी हर बैंक में होनी चाहिए. कहते हैं फार्म भरने में आने वाली दिक्कतों के बारे में पूछने पर भी बैंक सखी काफी सहयोग करती है.
 
नोटबंदी के बाद : ग्रामीण बैंकों में बढ़ी भीड़, ग्रामीणों के लिए मददगार बन रहीं बैंक सखी
 
सैकड़ों महिलाओं को दलालों की चंगुल से बचाया पूनम जारिका ने
 
िदव्या गौतम
 
नो टबंदी की घोषणा होते ही खूंटपानी की पूनम जारिका दीदी के मोबाइल पर एक के बाद एक कई फोन कॉल्स आने लगे. सभी घबराये हुए थे कि क्या उनके 500 और 1000 रुपये के नोट रद्दी कागज के टुकड़ों में बदल गए हैं. 
 
इलाके के कई गांवों की घबरायी हुई महिलाएं पूनम दीदी से एक बार बात करने को आतुर थीं. पूनम दीदी ने बड़े ही धैर्य से काम लेते हुए महिलाओं को नोटबंदी के बारे में जागरूक किया. वे कई दिनों से महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्राम संगठनों के बीच मीटिंग कर रही हैं. नोटबंदी के दौरान इलाके में दलाल सक्रिय हो गए थे और वे महिलाओं के पैसे ठगने की फिराक में थे. केवल 10वीं तक पढ़ी-लिखी पूनम दीदी न केवल स्वयं जागरूक बैंक सखी हैं बल्कि वह निरक्षर और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं के बैंक संबंधित कार्यों में मदद करती हैं. बैंक सखी पूनम दीदी ने महिलाओं को यह भी बताया कि किसी भी दलाल के चक्कर में फंसने की जरूरत नहीं है. बैंक ने मंगलवार के दिन स्वयं सहायता समूह की दीदियों के लिए अलग काउंटर की व्यवस्था की है, जहां वे अपने पुराने नोटों को समूह के खाते में डाल सकती है.
 
जेएसएलपीएस ने पूनम दीदी को बैंक सखी की ट्रेनिंग दिसंबर 2014 में दी. उसके बाद से वह पंजाब नेशनल बैंक की पंड्ररासली शाखा में बैंक सखी के रूप में कार्यरत है. केवल डेढ़ साल के दौरान वह 212 महिला स्वयं सहायता समूहों का बैंक अकाउंट खुलवा चुकी हैं. उलीबा महिला समूह, केंदुलोटा आजीविका महिला ग्राम संगठन से जूड़ीं पूनम दीदी कुछ वर्ष पहले तक खुद काफी तंगहाली में जी रही थी. पति गांव में ही अस्थाई रोजगार करते हैं. 
 
मगर समूह से जुड़ने और बैंक सखी बनने के बाद वह न सिर्फ आत्मनिर्भर हुईं बल्कि परिवार की आमदनी में बड़ा योगदान दे रही हैं. पूनम ने अपनी जिम्मेदारियों को केवल परिवार तक सीमित न रखकर उसका दायरा समाज हित तक बढ़ाया. आज पूरे इलाके में उनका बड़ा नाम है. लोग उन्हें काफी इज्जत देते हैं और एक सशक्त महिला के रूप में आसपास के कई गांवों की महिलाओं के लिए वे एक मिसाल बन गयी हैं. पूनम दीदी की दो बेटियां हैं. बेटे-बेटियों के भेदभाव भरे माहौल में भी वह अपनी दोनों बेटियों को प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहती हैं, ताकि समाज का और भला हो सके. इस तरह वह बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को और सशक्त कर रही है.
 
आजीविका सखी मंडल के सदस्यों के लिए 
 
खास बातें
 
- आजीविका सखी मंडल, स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अपने समूह के खाते में दूसरों की नकदी को न डालें
- आप अपने खाते में भी किसी अनजान एवं दूसरे का नकद न डालें
- किसी के बहकावें में आकर 500 व 1000 रुपये के पुराने नोटों को कम मूल्य पर न बदलें
- रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मुताबिक, 10 का सिक्का लेन-देन का माध्यम है, उससे जुड़ी अफवाहों पर ध्यान न दें
- समूह, ग्राम संगठन एवं संकुल संगठन के कैश में उपलब्ध 500 एवं 1000 रुपये के नोटों की बदली बैंक से 30 दिसंबर 2016तक कर लें
- किसी के बहकावे में आकर दूसरों के नकदी को अपने समूह, ग्राम संगठन व संकुल संगठन के खाते में कभी जमा नहीं करें
- अगर आपको नोटबंदी से कोई समस्या, सवाल है तो आप अपने नजदीकी बैंक सखी, आजीविका मिशन के कर्मचारियों एवं प्रखंड मिशन प्रबंधन इकाई में संपर्क करें