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  • Jun 21 2017 1:26PM

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने देसी मुर्गा का बनाया हाइब्रीड, देसी मुर्गा को टक्कर देने आया झारसीम

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने देसी मुर्गा का बनाया हाइब्रीड, देसी मुर्गा को टक्कर देने आया झारसीम
झारखंड में कुक्कुट उत्पादन के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के वैज्ञानिक डाॅ सुशील कुमार ने झारसीम नाम से देसी मुर्गा की एक नयी प्रजाति पर सफलतार्पूवक शोध किया. राज्य के लोगों के बीच झारसीम जल्द ही नजर आयेगा. झारसीम यानी झार से झारखंड और सीम से मुर्गा के मतलब को जोड़ कर देसी प्रजाति के मुर्गा को ‘झारसीम’ नाम दिया गया है.
 
झारसीम की आवश्यकता क्यों : गहन व्यावसायिक ब्रायलर उत्पादन के लिए सफेद पंखवाले कुक्कुट ही उपयुक्त होते हैं. लेकिन, ग्रामीण परिवेश में ब्रायलर उत्पादन संभव नहीं हो पाता है. इसलिए ग्रामीण परिवेश के लिए वैसे ही मुर्गे की जरूरत है, जो बैक्यार्ड पद्धति में पाली जा सके. इन बातों को ध्यान में रखते हुए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा एक ऐसी प्रजाति विकसित की गयी, जिसे ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में एवं मौसम के विभिन्न परिस्थितियों में बैक्यार्ड पद्धति में पालन किया जा सकता है. इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय एवं मुर्गी पालन परियोजना निदेशालय, हैदराबाद ने आकर्षक, बहु-रंगीन एवं मजबूत कुक्कुट झारसीम का विकास किया है. ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में यह कुक्कुट अधिक अनुकूलतम वातावरण के नहीं होने पर भी अच्छी तरह से जी लेते हैं. लगभग देसी मुर्गियों की तरह ही इसे पाला जा सकता है. 
 
झारखंड में देश का यह अनोखा प्रयोग : डॉ सुशील कुमार
बिरसा कृषि विवि, रांची के वैज्ञानिक डाॅ सुशील कुमार इस शोध के बारे में बताते हैं कि झारखंड के आदिवासी घरों में मुर्गा, सूकर, बकरी पालने की परंपरा सदियों से रही है. देसी मुर्गा की मांग अधिक रही है. इसी कारण इस पर शोध किया गया. झारसीम को नेशनल पोल्ट्री इंस्टीच्यूट, हैदराबाद से मान्यता मिल चुका है. देश का यह अनोखा प्रयोग झारखंड में ही किया गया है. नयी प्रजाति का यह मुर्गा, देसी मुर्गा की तरह ज्यादा उछल-कूद नहीं कर सकता, लेकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह सही है. वे बताते हैं कि झारसीम मुर्गा में पंजाब ब्वायलर टू, इंग्लैंड की प्रजाति आरआइआर और देसी मुर्गी का योगदान है.

इसका वजन देसी मुर्गा की तुलना में ज्यादा होता है. कम समय में इससे ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है. इसके मुर्गी का अंडा भी देसी मुर्गी की तुलना में बड़ा होता है. झारसीम चार माह में एक किलो का बन जाता है. झारसीम मुर्गी देसी मुर्गी की तुलना में ज्यादा अंडे देती है. झारसीम के भोजन में घर के जूठे भोजन, दाना, चावल के अकउे, मकई का चुरा और मछली का चारा कोकून भी दिया जाता है. डाॅ सुशील बताते हैं कि झारसीम का उत्पादन वर्ष 2016 से प्रारंभ हुआ. अब यह झारखंड के प्रत्येक जिलें में केवीके के माध्यम से प्रोत्साहित भी किया जा रहा है. 
 
झारसीम को अपना कर बढ़ायें अपनी आमदनी : डॉ संजय कुमार
कृषि विज्ञान केंद्र, दुमका के वैज्ञानिक डाॅ संजय कुमार बताते हैं कि झारसीम के अंडे का रंग भूरा होता है. देसी मुर्गे की तरह यह रंगीन होता है. साथ ही झारसीम झारखंडी वातारण के अनुकुल है. दुमका के ग्रामीणों के बीच इसे वितरित किया जायेगा, ताकि वो इसे पाल कर इसका व्यवसायिक उपयोग कर अपनी आय बढ़ा सके. संजय कहते हैं कि तीन माह में यह मुर्गी 58 अंडे देती है और पोल्ट्री मुर्गा से ज्यादा रुचिकर भी है. किसान यदि इसे अपनाते हैं, तो देशी मुर्गा की तरह ही उसका व्यवसाय कर सकते हैं. किसान अपने घर के किसी छोटे से जगह में इसे पाल भी सकते हैं.
 
झारसीम से लाभ
आकर्षक एवं बहु-रंगी पंखवाले इस कुक्कुट से काफी लाभ भी है. 
दाना पर कम खर्च
मांस का अधिक उपज
दुर्बल जन-समूहों में प्रोटिन कुपोषण को मिटाना
महिलाओं के अधिकारों को शक्ति प्रदान करना
साधारण पोषण द्वारा समशीतोष्ण-रूक्ष वातावरण की स्थितियों में अपनाने योग्य
 
बरतें सावधानी
आवश्यक तापमान प्रदान करते हुए परजीवियों के शिकार से बचायें
कुक्कुट घरों के सभी सामान साफ रखें
फर्श, दीवारों को साफ करते रहें
फ्लेम गन के ताप से दीवारों, मेश को साफ करते रहें
गर्म पानी की तेज धारा से कुक्कुट घरों की सफाई करें
कुक्कुट घरों में संक्रामक रोगाणु नाशक दवा का छिड़काव करें