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  • Aug 21 2017 2:09PM

किसानों ने अपनाया श्रीविधि तकनीक

प्रीति लिंडा
प्रखंड : कांके
जिला : रांची
राजधानी रांची के कांके प्रखंड अंतर्गत एक गांव है दुबलिया. इस गांव में हर साल की भांति इस साल भी सभी किसान अपने-अपने खेतों में खेती करने के लिए काफी उत्साहित नजर आयें. दुबलिया गांव में करीब 80 फीसदी ग्रामीण खेती-किसानी कर अपना जीवन यापन करते हैं. 
 
आज भी कई ऐसे किसान हैं, जिन्हें आधुनिक तरीके से खेती-किसानी की कोई विशेष जानकारी नहीं है. सिंचाई की व्यवस्था, फसलों पर किटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं करना, सही बीज की पहचान नहीं होना जैसे कई जानकारियों के अभाव के कारण किसानों को नुकसान भी उठाना पड़ता है. इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए जेएसएलपीएस ने सखी मंडल की दीदियों को कृषि संबंधी प्रशिक्षण देकर खेती-किसानी से जुड़े किसानों को सहयोग देने का अभियान छेड़ा. आजीविका कृषक मित्र की ये दीदियां अपने-अपने गांव के किसानों को सही तकनीक की जानकारी दे रही है. दुबलिया गांव की आजीविका कृषक मित्र है मुन्नी देवी. 
 
मुन्नी देवी अपने क्षेत्र में सभी किसानों को धान की खेती के लिए सर्वोत्तम बीज और श्रीविधि तकनीक से खेतों में धान लगवाने में मदद कर रही है. आजीविका कृषक मित्र मुन्नी देवी कहती हैं कि पहले किसान बिना तकनीक के सहारे खेती करते थे, तो उतना उत्पादन नहीं होता था. 
लेकिन, अब किसान श्रीविधि तकनीक से धान लगा रहे हैं, तो फसल का उत्पादन दोगुना हो रहा है. जेएसएलपीएस की ओर से मिली हुई कृषि यंत्र कोनोविडर के सहारे किसान अकेले ही पूरे खेत की अनचाहे घासों को अासानी से निकाल सकते हैं. आजीविका कृषक मित्र मुन्नी देवी किसानों को श्रीविधि तकनीक के सहारे धान रोपनी को कहती हैं. खेतों में धान के एक से दूसरे पौधों के बीच 10 इंच की दूरी बनाये रखने को कहती है, ताकि पौधे को बढ़ने में आसानी हो सके. इसी तरह से अन्य जानकारी भी आजीविका कृषक मित्र क्षेत्र के किसानों को दे रही है. दुबलिया गांव के किसान पहली बार आजीविका कृषक मित्र के द्वारा बताये गये तकनीक को अपना रहे हैं. 
 
हालांकि, कई किसान इस तकनीक को अपनाने से अब भी डर रहे हैं. वैसे किसानों को अपने खेत के आधे भाग में श्रीविधि तकनीक और आधे में परंपरागत तकनीक के सहारे खेती करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि फसल उत्पादन के समय दोनों के बीच का अंतर किसान को पता चल सके.
 
इस संबंध में महिला किसान सरिता देवी कहती हैं कि अगर इस साल परंपरागत तकनीक की तुलना में श्रीविधि तकनीक से लगे फसल का उत्पादन अधिक हुआ, तो अगले साल से अपने खेत में श्रीविधि तकनीक को ही अपनाया जायेगा.