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  • Nov 3 2017 1:33PM

2017 का पहला ओडीएफ पंचायत नेहालू

2017 का पहला ओडीएफ पंचायत नेहालू

रांची जिला मुख्यालय से 52 किलोमीटर दूर बेड़ो प्रखंड का नेहालू कपारिया पंचायत खूबसूरत जंगलों के बीच बसा है. यहां घने जंगलों के बीच से गुजरकर आना पड़ता है. सड़कों की स्थिति ठीक नहीं है. इसके बावजूद पंचायत में विकास दिखता है. सभी घरों के बाहर शौचालय बने हुए हैं. हाल ही में नेहालू कपारिया को ओडीएफ पंचायत घोषित किया गया है. पंचायत का ही एक गांव है गडरी, जिसे राज्य का पहला ओडीएफ गांव होने का गौरव हासिल है. नेहालू कपारिया पंचायत में कुल छह राजस्व गांव केनाभीट्ठा, डुमरी, रोगो, नेहालू कपारिया, रोगाडीह पतराटोली और गडरी है. इन गांवों से अलग सभी गांवों का अपना टोला भी है.

सबसे अधिक नेहालू में 11 टोले हैं. पंचायत का पचास फीसदी क्षेत्रफल जंगलों से घिरा है. पंचायत में कुल 15 वार्ड है और आबादी लगभग आठ हजार है. यह पंचायत लापुंग और बेड़ो प्रखंड के सीमावर्ती क्षेत्र अंतर्गत आता है. नेहालू कपारिया पंचायत आदिवासी बहुल है. विकास के नजरिये से देखें, तो पहले की तुलना में लोगों की सुविधाएं बढ़ी हैं. पंचायत सचिवालय में एक मिनी बैंक भी है, जहां ग्रामीण पैसों की निकासी और जमा करते हैं. नेहालू कपारिया पंचायत 2017 में राज्य का पहला ओडीएफ पंचायत घोषित हुआ है. सड़कों और गांव में इसका असर दिखता है. सिर्फ मुखिया ही नहीं, बल्कि ग्रामीण भी बताते हैं कि गांव के सभी घरों में शौचालय बना हुआ है. अब ग्रामीण शौच के लिए घर से बाहर नहीं जाते हैं. स्वच्छता के प्रति ग्रामीण काफी संवेदनशील हैं. 

सड़क, पानी और बिजली

नेहालू कपारिया पंचायत में प्राथमिकता के हिसाब से सड़क और नाली का निर्माण कराया गया है. अब तक पांच पीसीसी पथ बनाये गये हैं. बरटोली में एक पीसीसी पथ है. इसके साथ-साथ अंबाटोली और सरनाटोली में पीसीसी पथ का निर्माण कराया गया है. रोगाडीह और डुमरी में नाली का निर्माण कराया गया है. मुखिया बसंती देवी कहती हैं कि फंड की कमी के कारण ग्रामसभा के माध्यम से चिह्नित जगहों पर प्राथमिकता के आधार पर सड़क और नालियों का निर्माण कराया गया है. इस पंचायत में पीने के पानी की समस्या पहले से काफी कम हो गयी है. पंचायत के बरटोली, अंबाटोली और रोगाडीह में सौर ऊर्जा द्वारा संचालित पानी टंकी लगायी गयी है. इससे ग्रामीणों को पीने के लिए शुद्ध पानी मिल रहा है. हालांकि, गर्मी के मौसम में पीने के पानी की समस्या हो जाती है, लेकिन इस बार पंचायत क्षेत्र के सभी चापानलों की मरम्मत करायी गयी है. जिन कुओं से ग्रामीण पानी पीते हैं, उन कुंओं का भी जीर्णोंद्धार कराया गया है. पंचायत के गडरी गांव में तो जलमीनार बनाया गया है और उसी से सभी घरों में पानी की आपूर्ति होती है. मुखिया फंड से एक टैंकर भी खरीदा गया है. जिन स्थानों पर पानी की कमी होती है, वहां टैंकर के जरिये पीने योग्य पानी पहुंचाया जाता है. शादी-विवाह जैसे आयोजनों में भी ग्रामीणों को टैंकर के माध्यम से स्वच्छ जल उपलब्ध कराया जाता है. ग्रामीण खुद जाकर मुखिया को योजनाओं के बारे में बताते हैं और मुखिया उनके हिसाब से कार्य करती हैं. पंचायत के सिर्फ राजस्व गांव ही नहीं, बल्कि अन्य गांवों तथा टोलों में भी बिजली उपलब्ध है. पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों के प्रयास से सभी जगहों पर छोटे ट्रांसफार्मर बदल कर नये ट्रांसफार्मर लगाये गये हैं. 

शराबबंदी को लेकर अभियान

आदिवासी बहुल पंचायत होने के चलते इलाके में शराब को बंद कराना एक चुनौती है, फिर भी शराबबंदी को लेकर पंचायत क्षेत्र में कई अभियान चलाये गये हैं. महिलाओं को एकजुट किया गया है. हर एक गांव में सिर्फ शराबबंदी को लेकर ग्रामसभा का आयोजन किया गया है. हालांकि इस अभियान का अब तक उतना असर नहीं दिखा है. शराबबंदी को लेकर व्यापक पैमाने पर अभियान चलाने की जरूरत है. शराब के सेवन से कई लोगों की मौत हो चुकी है.

कृषि व सिंचाई की स्थिति

आदिवासी बहुल इलाका और खेती योग्य जमीन होने के कारण नेहालू कपारिया पंचायत की 95 फीसदी से अधिक की आबादी कृषि पर निर्भर है. पंचायत क्षेत्र में अभी अलग-अलग सब्जियां, धान और मड़ुआ की फसल खेतों में लहलहा रही है. किसान मेहनती हैं, इसका गवाह खेतों की हरियाली है. सिंचाई के लिए किसान पारंपरिक संसाधनों पर ही निर्भर हैं. पूरे पंचायत क्षेत्र के सभी गांवों में मनरेगा द्वारा डोभा का निर्माण कराया गया है. मनरेगा के तहत कुल 80 डोभा बनाये गये हैं. भूमि संरक्षण विभाग की ओर से 16 डोभा का निर्माण कराया गया है. साल 2016-17 में 16 कुएं बनाये गये हैं. किसान बाजार और बेड़ो लैंपस से खाद और बीज खरीदते हैं. वह अपने धान की बिक्री लैंपस में करते हैं, जिससे उन्हें धान के अच्छे दाम मिल जाते हैं. पंचायत के सभी गांवों में बिजली है, जिसके कारण सिंचाई करने में आसानी होती है. रांची के बड़े बाजारों में से एक है बेड़ो बाजार. यह पंचायत क्षेत्र से 15 किलोमीटर दूर है, जहां किसान अपनी सब्जियां और फसल को बेचते हैं.

शिक्षा और स्वास्थ्य

पंचायत के सभी गांवों में कुल 16 स्कूल हैं. इसमें चार माध्यमिक विद्यालय और 12 प्राथमिक विद्यालय है, लेकिन एक भी हाइस्कूल नहीं है, जिसके कारण बच्चों को आठवीं के बाद आगे की पढ़ाई में परेशानी होती है. हाइस्कूल की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को बेड़ो, भरनो या दोलैंचा जाना पड़ता है, जो पंचायत से 15 किलोमीटर दूर है. हालांकि जल्द ही पंचायत के एक स्कूल को हाइस्कूल का दर्जा मिल जायेगा. फिलहाल इन स्कूलों में शिक्षकों की कमी से थोड़ी परेशानी है. सभी स्कूलों में बच्चों को मेन्यू के अनुसार मिड-डे-मिल दिया जाता है. इसके लिए मुखिया खुद समय-समय पर सभी स्कूलों में जाकर निरीक्षण करती हैं. गांव की शिक्षा समिति भी काफी सक्रिय है. आज पूरे पंचायत में ड्रॉप आउट रेट बिल्कुल शून्य है. स्वास्थ्य की बात करें, तो पंचायत में एक उप स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन सिर्फ एक एएनएम के भरोसे लगभग आठ हजार की आबादी है. इस कारण एएनएम अच्छी तरह से सेवा नहीं दे पाती हैं. पंचायत के गांवों में कहीं-कहीं पर झोलाछाप डॉक्टर भी हैं, जिनसे ग्रामीण अपना इलाज कराते हैं.

नेहालू के खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) पंचायत बनने की कहानी

नेहालू कपारिया पंचायत के ओडीएफ घोषित होने पर मुखिया बसंती कुमारी काफी उत्साहित हैं. कहती हैं कि ग्रामीणों की मेहनत रंग लायी है. ग्रामीण भी काफी उत्साहित हैं और उन्हें अब गंदगी से होनेवाली बीमारियों का डर नहीं है. मुखिया कहती हैं कि पंचायत को ओडीएफ बनाने की राह इतनी आसान नहीं थी. कुछ टोले के ग्रामीण तो शौचालय निर्माण और उसके इस्तेमाल को लेकर तैयार ही नहीं थे. इसके कारण शौचालय निर्माण की योजना को लेना भी नहीं चाहते थे. इस समस्या को चुनौती के रूप में लिया. ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए स्कूली बच्चों का सहारा लिया. ग्रामसभा के माध्यम से भी लोगों को जागरूक किया गया. स्कूल में जाकर बच्चों को शौचालय के फायदे और साफ-सफाई के बारे में बताया गया. धीरे-धीरे इसका असर भी दिखना शुरू हुआ और लोगों ने शौचालय बनाना शुरू कर दिया और इस तरह यह पंचायत ओडीएफ घोषित हो गया़ . 

सोच में बदलाव का ही नतीजा है : बसंती 

नेहालू कपारिया पंचायत की मुखिया बंसती देवी कहती हैं कि ग्रामीणों की सोच में आये बदलाव का ही नतीजा है कि पंचायत को ओडीएफ घोषित किया गया. आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण लोगों की मानसिकता को बदलना उतना आसान नहीं था. पहले लोग पंचायत भवन में आते भी नहीं थे, पर अब लोग पंचायत के महत्व को समझने लगे हैं. ग्रामसभा में पहले की अपेक्षा ग्रामीणों की भागीदारी काफी बढ़ी है. अब ग्रामीण सिर्फ बैठकों में आते भर नहीं हैं, बल्कि गांव के विकास को लेकर अपनी राय भी देते हैं. लोगों की सोच में आये इस बदलाव के लिए हमेशा हर गांव में जाकर लोगों से बात करना पड़ता है. पंचायत भवन में जाकर बैठना पड़ता है. पहले पंचायत भवन ढंग से नहीं बना था, पर इसके बन जाने के बाद से भवन में सुविधाएं बढ़ायी गयी हैं. हर दिन कोई न कोई जनप्रतिनिधि पंचायत सचिवालय में बैठते हैं. नियम के अनुसार महीने में दो बैठकें भी आयोजित की जाती हैं. धीरे-धीरे काफी कुछ बदल रहा है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है. वर्तमान में सभी घरों में शौचालय है और लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं़

बसंती देवी

मुिखया