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  • Nov 3 2017 1:40PM

वृद्धजनों को मिली नयी आस, नया सहारा

वृद्धजनों को मिली नयी आस, नया सहारा
करीब 70 फीसदी बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. उनमें से 93 फीसदी असंगठित क्षेत्र में हैं. इस क्षेत्र में वित्तीय, खाद्य और सामाजिक सुरक्षा की कमी होती है. जीवित रहने के लिए इन्हें अपने जीवन के आखिरी दिनों तक काम करना पड़ता है. इस कारण ग्रामीण क्षेत्रों के वृद्धों की जिंदगी गरीबी में ही कट जाती है. यह पाया गया है कि वृद्धों को अक्सर आजीविका के अवसरों से उपेक्षित रहना पड़ता है. स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उन्हें वित्तीय संकट से जूझना पड़ता है. उन्हें अपनी जरूरतों के लिए हमेशा परिवार  पर निर्भर रहने की मजबूरी है.
 
ज्योति रानी 
झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी ने बुजुर्ग आबादी को आजीविका से जोड़ने के लिए वर्ष 2015 में एक प्रयास शुरू किया. इसके तहत बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह (इएसएचजी) बनाने का कार्य शुरू किया गया और बुजुर्गों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने की पहल की गयी. बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह बनाने का उद्देश्य बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना, आजीविका का अवसर तलाशना और वित्तीय सहायता कर सक्षम बनाना है.
 
कार्यक्रम, क्रियान्वयन व रणनीति : जेएसएलपीएस, हेल्प एज इंडिया के तकनीकी समर्थन के साथ इएसएचजी के कार्यक्रम को लागू कर रहा है. जिन गांवों में एसएचजी परिपक्व हो रहे हैं, वहां गांव संगठन (वीओ) का गठन किया गया है और उन्हें ही इएसएचजी के कार्यों के लिए चुना गया है. इएसएचजी को 55 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वृद्धों के समुदाय आधारित संगठनों के रूप में समझा जा सकता है. उनके रहने की स्थिति में सुधार लाने, समुदाय में सामाजिक सहायता के साथ-साथ गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने, सेवाएं देने और टिकाऊ आजीविका प्राप्त करने को बढ़ावा देने के लिए बनाया जा रहा है, ताकि बुजुर्ग आत्मसम्मान के साथ जीवन-यापन कर सकें. इन समूहों द्वारा बचत, क्रेडिट, जागरूकता कार्य और सरकारी सेवाओं तक आसान पहुंच प्रदान करने का काम किया जा रहा है. एक इएसएचजी 55 और उससे ऊपर की आयु के 10 से 20 बुजुर्गों द्वारा बनाया जाता है. समूह तीन प्रकार के होते हैं. पुरुष, महिला और मिश्रित समूह. समूह के सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार साप्ताहिक बचत करते हैं. वर्तमान में यह कार्यक्रम राज्य के तीन प्रखंडों में चलाया जा रहा है. रांची जिले के नामकुम प्रखंड, पश्चिमी सिंहभूम जिले के खूंटपानी और पाकुड़ जिले के पाकुड़िया प्रखंड में यह समूह संचालित है.
 
इन सबकी तरह वृद्ध समूह के अन्य सदस्य भी अपनी-अपनी बुनियादी जरूरतें पूरा कर रहे हैं, जैसे- अनाज आपूर्ति, दवाई खर्च, बच्चे, पोते-पोतियों का स्कूल खर्च, सफर खर्च आदि. वृद्ध समूह ने इन लोगों को जीने की नयी चाह और दिशा दिखायी है. झारखंड में कुल 505 इएसएचजी बन चुके हैं. इसमें 120 महिला, 178 पुरुष और 207 मिश्रित समूह शामिल हैं. आगे इन वृद्ध समूहों को सशक्त कर बेहतर आजीविका से जोड़ते हुए और समूहों को ग्राम संगठन से जोड़ने का कार्य करने की योजना है.
 
बुजुर्गों के जीवन में आया सकारात्मक बदलाव
सरवल गांव के 56 साल के ठुमा मुंडा अपने बेटे-बहू के साथ सरवल गांव में रहते हैं. वह दैनिक मजदूर हैं. बढ़ती उम्र के कारण उनके पैर में तकलीफ शुरू हो गयी थी और चलने में काफी परेशानी होती थी. इसके कारण उन्हें जीवन- यापन में परेशानी हो रही थी. वर्ष 2015 में ठुमा के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया. उन्हें बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह यानी इएसएचजी की जानकारी मिली. इएसएचजी के महत्व को समझ कर ठुमा 12 अक्तूबर, 2015 को मिलन वृद्ध आजीविका समूह के सदस्य बने. यह समूह झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा चलायी जा रही है. इएसएचजी के सदस्य बनने के बाद उन्होंने समूह से 150 रुपये का ऋण लिया और सबसे पहले अपने लिए चप्पल खरीदी. खाली पैर होने के कारण कई दिनों से उन्हें चलने में परेशानी हो रही थी. अब उन्हें राहत मिल गयी है.  
 
मरियम  मिश्रित आजीविका वृद्ध समूह के सदस्य हैं बारथोलोमियुस लकड़ा. इस समूह में  महिला और पुरुष दोनों सदस्य हैं. बारथोलोमियुस के पास खेत था. इन्होंने  समूह से ऋण लेकर सब्जियों की खेती शुरू की. दो हजार रुपये के ऋण से  दो  किलो मटर का बीज, एक किलो फ्रेंचबीन और खाद लिया और खेती की. खेत के  किनारों पर मूली लगा दी. सिर्फ मूली को बेच कर इन्हें दो हजार रुपये की  आमदनी हुई, जिससे इन्होंने ऋण चुकता कर दिया. तैयार मटर की बिक्री प्रति  किलो 80 रुपये की दर से हुई. इसके अलावा सप्ताह में लगनेवाले तीन बाजारों  में दो से तीन हजार रुपये के मटर की बिक्री हो जाती थी. इन्हें 20  हजार रुपये का मुनाफा हुआ. साल भर खाने का आलू भी इनके पास है. आगे  बारथोलोमियुस ने बागवानी करने की सोची है, जिसके लिए वह समूह से ही ऋण  लेंगे. 
 
तुम्बगुट्टू गांव की रहनेवाली हैं सीमा लकड़ा. वर्ष 2015 में उजाला वृद्ध स्वयं सहायता समूह से जुडीं. एक घटना में अपने बेटे-बहू को खो चुकीं सीमा अब अपना घर खुद चलाती हैं और अपने पोते-पोतियों की भी बखूबी देखभाल करती हैं. समूह से जुड़ने के बाद से वह अपनी बुनियादी जरूरतें समूह से ऋण लेकर पूरा कर रही हैं. सीमा बताती हैं कि समूह में उन्हें सहारा नजर आता है, जो परेशानी में आपका साथ नहीं छोड़ता और वादा निभाता है. 
 
बिरसा  मुंडा आजीविका वृद्ध पुरुष समूह के सदस्य हैं जोब्रा और तिजुवा लकड़ा.  बरूतोली गांव के इन दोनों वृद्धों ने समूह से ऋण  लिया. ऋण की राशि से दोनों डोभा बना कर सामूहिक रूप से मछली पालन कर रहे  हैं. इसका उद्देश्य आजीविका संवर्धन है. समूह के सदस्य सामाजिक जिम्मेदारी  भी निभा रहे हैं, जैसे- गांव में अगर किसी की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसे  में घरवालों को सहयोग करने के उदेश्य से समूह द्वारा चावल दिया जाता है.  
 
प्लांडू ऊपरटोली की आशुमानी लकड़ा को सरना आजीविका वृद्ध महिला समूह का सहारा मिला. समूह से जुड़ते ही तीन सौ रुपये का ऋण लिया और सबसे पहले वह चावल खरीदी.  जीवन यापन के लिए दोबारा पांच हजार रुपये का ऋण लेकर सूकर और बकरी पालन पशुपालन की शुरुआत की. आज आशुमानी के पास सात सूकर और चार बकरियां हैं. पशुपालन के माध्यम से आशुमानी को आय का नियमित स्रोत शुरू हो गया है.