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  • Mar 6 2018 11:11AM

अपने हुनर को निखार बड़े सपने को पूरा करतीं ग्रामीण महिलाएं

अपने हुनर को निखार बड़े सपने को पूरा करतीं ग्रामीण महिलाएं

 विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in

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कुछ दिनों पहले मैं अनगड़ा के एक गांव में गया था. वहां गांव के महिलाओं के साथ संवाद का अवसर मिला. उनके साथ संवाद के दौरान उनका आत्मविश्वास बहुत ही सुखद अनुभूति दे रहा था. स्पष्ट नजर आ रहा था कि कल तक घर के अंदर रहनेवाली गांव की महिलाएं, आज घर से बाहर निकल कर स्वावलंबी बन ही रही हैं. बिना सुविधा प्राप्त किये ये महिलाएं अपने हुनर से अपनी अलग पहचान बना रही हैं. इस काम में इन महिलाओं के लिए जेएसएलपीएस ने बहुत बड़ा सहारा दिया, जिसके साथ जुड़ कर आज वो अपने हुनर को निखार रही हैं. साथ ही इसी हुनर के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रही हैं.

पशुओं का इलाज करने वाली डॉक्टर दीदी पुतुल
रांची जिला अंतर्गत रातू ब्लॉक के होचर पतराटोली गांव की पुतुल तिग्गा को अब हर कोई जानता है. वह पशु सखी हैं. उन्होंने किसी वेटनरी कॉलेज से शिक्षण-प्रशिक्षण नहीं लिया, बल्कि पशु सखी के लिए चयन होने के बाद विशेषज्ञ दीदियों से ट्रेनिंग मिली. इसके बाद अपने इलाके में आकर काम करने लगीं. एक साल में ही आसपास के 15-20 किलोमीटर में सब उन्हें जानने-पहचानने लगे हैं. चाहे किसी के मुर्गा-मुर्गी, बकरा-बकरी की बीमारी हो या किसी पशु को कुत्ते ने काट लिया हो, बकरी गर्भवती हो या डिलिवरी करवाना हो, सबके लिए उन्हें फोन आता है. फोन आते ही वो उस जगह पर पहुंच कर उन पशुओं का इलाज करती है.

पुतुल बताती हैं कि उनकी शादी छोटी उम्र में हो गयी थी. वर्ष 2000 में मैट्रिक की परीक्षा पास की. अब दो बच्चों की मां है. पति खेती-बारी का काम किया करते थे. सास का कैंसर के कारण निधन हो गया. आठवीं क्लास में ही पढ़ती थीं, तो अपने एक चचेरे भाई से मोटरसाइकिल चलाना सीखी थीं, लेकिन ससुराल में काफी पाबंदी थी. ऐसे में परिवार की सहमति से सखी मंडल की सदस्य बनी. इससे जुड़ाव के बाद जीवन में काफी बदलाव आ गया. फिलहाल हर महीने पांच हजार रुपये की कमाई हो जाती है, लेकिन पैसे से ज्यादा अहम है कि आज वह अपने पैरों पर खड़ी हैं. इससे आगे बढ़ कर अपने बच्चों के लिए बेहतर सपने पाल रही हैं.

रुक्मिणी ने बंजर जमीन पर उगाया सोना
खूंटी जिला अंतर्गत रनिया प्रखंड का एक गांव है बेलकीदुरा. उसी गांव में रहती हैं रुक्मिणी सिंह. साल 2012 में उनकी शादी भरत सिंह से हुई. उनके ससुराल में 14 लोग थे. रुक्मिणी कहती हैं कि परिवार इतना बड़ा था कि वह दिन भर परिवार में ही लगी रहती थीं. कुछ और सोचने-करने की फुर्सत नहीं मिलती थी. परिवार के सभी सदस्य पारंपरिक खेती पर ही निर्भर थे.

रुक्मिणी नयी-नयी ब्याहता थी. बहुत कुछ कह नहीं सकती थी. वह बताती हैं कि एक दिन गांव में कुछ दीदियां आयीं. सखी मंडल गठित करने के बारे में बतायीं. उनकी बात सुन कर प्रेरित हुईं और फीमेल महिला मंडल से जुड़ गयीं. वह जल्द ही सक्रिय सदस्य बन गयीं. रुक्मिणी के ससुरालवालों के पास पहाड़ के समीप खाली पड़ी जमीन थी, इस पर कुछ करने को ठानी. समूह से सात हजार रुपये कर्ज लेकर खाली पड़ी बंजर जमीन में बांस से घेरा कर खीरा, तरबूज, कद्दू, बोदी, भिंडी और करैला लगा दी. कहीं आसपास एक बूंद पानी नहीं था, लेकिन उन्हें आत्मविश्वास था.

ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद उन्हें पता था कि पहाड़ी के नीचे जमीन है, तो बरसात में जो पहाड़ों से पानी उतरता होगा, वह अपने आसपास की जमीन में अंदर से तर बनाये रखता होगा. एक किलोमीटर की दूरी पर कोयल नदी है. कुछ दिनों बाद खेतों में पांच किस्म के पौधे लहलहाने लगे. लगन का दिन था. सब्जियां खेत से ही बिकने लगीं. 15 दिनों में ही रुक्मिणी पांच हजार की भिंडी बेच दी. कुछ दिनों में दो हजार से अधिक का खीरा बेच दीं. वह कहती हैं कि जब तक लगन का दिन गुजरेगा, तब तक बरसात शुरू हो जायेगी. फिर तो तरबूज, करैला, भिंडी, खीरा और कद्दू खेप का खेप निकलेगा. वह कहती हैं कि जितना कर्ज ली थीं, 15 दिन में ही उतने की सब्जी बेच चुकी थीं. अब जो होना है, आमदनी ही होनी है. इसी बचत से मिट्टी का घर तुड़वा कर ईंट से घर बनवायी.

भविष्य में दुकान खोलने की योजना को ध्यान में रख कर घर के सामने दो दुकान की जगह छोड़ी. कहती हैं कि बेटा अपने नाना के घर रहता है. कमाई अच्छी होगी, तो उसे अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ायेंगी. बंजर जमीन पर लायी हरियाली से उपजी उम्मीदों के जरिये खेत में बैठे-बैठे अगले 20 साल तक का क्रमवार योजना ऐसे बताती हैं, जैसे वह कहीं बेहतर प्रबंधन संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त कर आयी हों. वह कहती हैं कि वह साबित करना चाहती थीं कि छोटे कर्ज से भी बड़े काम हो सकते हैं. छोटे कामों से भी बड़े सपने पूरे किये जा सकते हैं.