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  • Apr 3 2018 1:12PM

आम अवाम से भी सीख सकते हैं सफलता के सरल सूत्र

आम अवाम से भी सीख सकते हैं सफलता के सरल सूत्र

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in

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आप सफल होने के लिए केवल बड़ी शख्सियतों के जीवन से ही सीख नहीं ले सकते हैं. सफलता के सरल सूत्र आपके आस-पास गांव-गिरांव के वैसे लोगों के पास भी है, जिनके लिए कभी जीवन बोझ हुआ करता था. जीने की चाह तो रही होगी, लेकिन कोई राह नहीं दिखती होगी. ऐसे लोगों की सफलताओं को अधिकांश लोग नजरअंदाज कर देते हैं. ऐसी ही दो महिलाओं के जीवन संघर्ष की सच्ची दास्तान आपके सामने रख रहा हूं, जिन्होंने बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को पूरा किया और जीवन की छोटी-छोटी खुशियां हासिल कीं. इन दोनों की कहानियों से आज के युवाओं को तो जरूर प्रेरणा लेनी चाहिए, जो हर बात पर अपनी परिस्थितियों को दोष देते हैं.

1.
डरना नहीं, आगे बढ़ना है
नगड़ी जिले के साहेर गांव में एक कास्मेटिक (साज-श्रृंगार) की दुकान चलाने वाली राधा देवी से मिल कर आपको इस बात पर जरूर यकीन हो जायेगा कि अगर आप कुछ अलग करना चाहते हैं, तो तमाम मुश्किलों के बावजूद आप सफल हो सकते हैं, बशर्ते आपको अपने आप पर भरोसा हो. राधा देवी को ससुराल वालों ने हमेशा बाहर जाने से मना किया. ऐसे में उन्होंने रास्ता ढूंढ़ना शुरू किया. आजीविका मिशन से कर्ज लेकर पहले एक सिलाई मशीन खरीदी और गांव में सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया. मामला जम गया, तो थोड़ा-सा और कर्ज लिया. फिर घर में ही साज-श्रृंगार की दुकान खोल दी. यह दुकान भी चल पड़ी, तो उसी दुकान पर कपड़े बेचने का काम शुरू कर दिया. राधा के बिजनेस मॉडल और उनके सरोकारी होने के कारण उनकी लोकप्रियता का अंदाजा उनके गांव साहेर जाने पर लगता है. गांव के लोग कहते हैं कि दो साल में ही राधा ने साबित किया है कि घर-परिवार से सामंजस्य बिठाये रखते हुए कैसे खुद को खड़ा किया जा सकता है. राधा के इस मॉडल के बाद और उनकी सफलता के बाद अब कई महिलाएं राधा की राह चलने की तैयारी में हैं और अपनी तकदीर की कहानी खुद लिखना चाहती हैं. राधा अब बंदिशों की दुनिया से बहुत आगे निकल चुकी हैं और घर-परिवार को भी नाराज नहीं किया. मैट्रिक पास कर चुकी अपनी बेटी को भी अब दुकान पर बिठा कर दुनिया दिखा रही हैं कि लोगों से कैसे बातचीत करते हैं, अपना व्यापार कैसे करते हैं. राधा के दो बच्चे हैं. एक बेटा अभी पांचवीं में पढ़ता है और बेटी मैट्रिक पास कर चुकी है़. बेटी अब धीरे-धीरे सब संभालने लगी है और चाहती भी हूं कि उसे स्वावलंबी बनने का प्रशिक्षण दूं, ताकि उसके लिए दुनिया आसान रहे. बेटा तो अभी छोटा है. बड़ा होगा. मैट्रिक पास करेगा, तब तय करेगा कि क्या करना चाहता है.

 

2. सपना देखो व उसे पूरा करो
दो भाई और दो बहनों में सबसे बड़ी सुमन किस्पोट्टा को पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी, क्योंकि उनके पिता के पास आगे पढ़ाने की हैसियत नहीं थी. फिर दो साल खुद ही मजदूरी कर पैसा जुटायी और फिर इंटर में दाखिला लिया. रांची में इंटर की पढ़ाई करने जाती थी. रविवार या छुट्टी वाले दिनों में सुमन रांची मजदूरी करने जाती थी, ताकि कॉलेज आने-जाने का भाड़ा निकल सके. इंटर के बाद 2010 में सुमन की शादी हो गयी और वह ससुराल आ गयीं. ससुराल आने के बाद सुमन पांच साल घर में ही रहीं. ससुराल में लंबा-चौड़ा परिवार था. उनमें ही व्यस्त रहने लगीं. ससुरालवालों के साथ मिलकर खेती के काम पर जाने लगीं. इस बीच दो बच्चों की मां भी बन गयीं. सुमन कहती हैं कि ससुराल आकर एक तरह से घर में कैद हो गयी थी. मन छटपटा कर रह जाता था. बचपन से सपना था कि पढ़ूं और आगे बढ़ूं. जब दोनों बच्चे बड़े हो गये, तो उनका दाखिला स्कूल में करवा दिया और खुद भी बीए में एडमिशन ले लिया.
सुमन ने यह सब कैसे किया. यह जानना दिलचस्प है. सुमन बताती हैं कि उनके सपने बड़े थे. वह खुद पढ़ना चाहती थीं. बच्चों को निजी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहती थीं. उनके सपनों को सबसे पहले उनके पति ने हौसला दिया. पति ने कहा कि आगे बढ़ो, तो आजीविका मिशन के लिए बुक कीपिंग का काम करना शुरू किया. फिर स्पेशल ट्रेनिंग लेकर बुक कीपिंग ट्रेनर बन गयीं. एक के बाद एक करके 9,000, 15,000, 20,000, 30,000 का छोटा-बड़ा कर्ज लिया. फिर धान कूटने की मशीन लीं और पति घर में बैठे रहते थे, तो उन्हें इस काम में लगायी. इस बीच सरकार की योजना आयी, तो 110 पेड़ आम का लेकर एक बगीचा लगाया. इस दौरान यह समझ में भी आया कि गांव के लोगों को रोज ही जेरॉक्स करवाना होता है. कभी खतियान का, कभी आधार कार्ड का, जो बच्चे पढ़ते हैं उनके लिए स्टेशनरी की दुकान भी नहीं है, तो एक जेरॉक्स मशीन भी खरीद ली. इस तरह उनके सपने सच हो रहे हैं और हौसला बढ़ता जा रहा है.