blog

  • Feb 16 2017 8:58AM

जर्नी : मधुपुर टू गोवा

जर्नी : मधुपुर टू गोवा

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in

गोवा नाम सुनते ही आपके दिमाग में कौन-सी तसवीर बनती है? मौज-मस्ती और समुद्र का किनारा! इसे पढ़ने के बाद गोवा आपके दिमाग में एक और तसवीर बनाने लगेगी. गोवा को आप गंगा सिंह की नजर से देखने लगेंगे, जिन्हें गोवा में सिर्फ समुद्र का किनारा और मौज-मस्ती नहीं दिखी. 

उन्हें दिखा अपना भविष्य. वो शहर, जहां लोग कुछ दिनों के लिए छुट्टियां मनाकर अपने पुराने रास्ते पर लौट आते हैं, गंगा ने इस अजनबी शहर में अपनी अलग राह बनायी. गंगा ने कोई बड़ा सपना नहीं देखा. खूब पैसे कमाने का लक्ष्य नहीं रखा. उनका लक्ष्य था, रोज इतनी कमाई हो जाये कि बच्चों का और उनका पेट भर सके. इस छोटे से लक्ष्य को पूरा करते-करते राहें बदलती चली गयी. छोटे-छोटे सपने कब बड़े होने लगे, गंगा भी नहीं समझ पाये. 750 रुपये महीने की तनख्वाह से काम शुरू करने वाले गंगा आज 70 से 80 लाख रुपये लोगों को तनख्वाह दे देते हैं. आज उनकी कंपनी का सालाना कारोबार 15 करोड़ के आसपास है. सोचिये जरा, सफर की शुरुआत कहां से हुई और उनकी मेहनत, लगन, ईमानदारी ने उन्हें कहां पहुंचा दिया. गंगा के इस सफर में कई उतार चढ़ाव हैं. उनका सफर आपको जरूर पॉजिटिव एनर्जी देगा और उनके सफर का उदाहरण देकर आप लोगों से कह सकेंगे बी-पॉजिटिव. 

दूसरों के सपनों को 

पूरा करने का सपना है 

गंगा के जीवन में कई पड़ाव आये. एक वक्त था, जब उनकी नौकरी नेवी में हो गयी थी. ज्वाइनिंग के कुछ दिनों पहले उनका हाथ एक दुर्घटना में टूट गया. वापस गोवा आकर उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड का काम शुरू किया. गंगा ने कभी कोई सपना नहीं देखा, बस अपने कर्म पर विश्वास रखा. गंगा बताते हैं कि जब मैं ठीक तरह से कमाने लगा तो अपने गांव गया, वहां चाचा ने पूछा, कितने लोग काम करते हैं तुम्हारे िलए. मैंने कहा, 500. वो कम सुनते थे. उन्होंने सिर्फ पांच सुने. इतने में ही वो बहुत खुश हो गये और उनकी आंखें भर आयी. उन्होंने कहा, वाह पांच लोग तुम्हारे लिए काम करते हैं. मैं सोचता रहा गया कि काश उन्होंने 500 सुना होता. मेरा सपना उनके सपने से जुड़ा था. मैं एक बार उन्हें हवाई जहाज में बिठा कर गोवा बुलाना चाहता था. मैंने टिकट भी कटा लिया था, लेकिन जिस दिन हम उन्हें लेने जाने वाले थे, उसी दिन उनका निधन हो गया. आज भी इसका बहुत दुख है कि उन्हें हवाई जहाज से यात्रा नहीं करा पाया. 

संघर्ष, मेहनत व ईमानदारी ने बनायी मेरी राह : गंगा सिंह

आपका जीवन गरीबी में बीता हो और कोई आठ करोड़ रुपये दे, तो आप क्या करेंगे. पैसे अच्छे-अच्छों का ईमान हिला देते हैंै, लेकिन गंगा सिंह की यही ईमानदारी ने उनके लिए सफलता की राह बनायी. गंगा बताते हैं कि मैं एक माइंस कंपनी में काम करता था. मेरे काम से कंपनी के सभी लोग बहुत खुश रहते थे. पूरे माइंस में घूमना पड़ता था. बारिश, ठंड सारे मौसमों में डटकर खड़े रहना पड़ता था. मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया. एक बार कंपनी में आठ करोड़ रुपये आये और गणेश चतुर्थी के कारण कंपनी दो दिनों के लिए बंद हो रही थी. कंपनी के मालिक ने मुझे बुलाकर कहा, मेरा नाम रंगा नाथ है और तुम्हारा गंगा, क्या मैं तुम पर विश्वास कर सकता हूं. मैं हैरान था कि ऐसी कौन सी जिम्मेदारी है, जो मुझे दी जा रही है. उन्होंने मुझे आठ करोड़ रुपये दिये और कहा कि इसे दो दिन तुम्हें अपने पास रखना होगा. पहले तो मैं डर गया, लेकिन उन्होंने भरोसा किया था, तो उस भरोसे पर खरा उतरना जरूरी था. मैंने उसे लॉकर में रख कर ताला लगा दिया. 

दो ताले ऑफिस के लगाये और दो ताला मैंने खरीद कर लगा दिया. एक चांबी जंगल में छुपा दी और दूसरी अपने पास रखा. दो दिनों तक मैं गेट पर ही जमा रहा. वही खाना खाया. मेरे साथियों को भी इस पैसे की जानकारी नहीं थी. वो मुझसे पूछते थे कि ऐसा क्या है कि तुम यहीं जमे हो, मैंने बहाना बना दिया कि ऑफिस में छुट्टी है, इसलिए मैं यहीं हूं. दो दिनों के बाद मैंने पैसे मालिक को दिये. इस काम से वो इतने खुश हुए कि उन्होंने मेरी तनख्वाह 2000 रुपये बढ़वा दी. शायद मेरी यही ईमानदारी मुझे आज इस मुकाम तक लेकर आयी है.

अपने पुराने दिनों को नहीं भूले गंगा 

गांव में गंगा की एक अलग पहचान है. गांव के लोग उनसे इतना प्यार करते हैं कि उनके कहने पर गंगा ने 2009 का विधानसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन राजनीति उन्हें आती नहीं है. गंगा कहते हैं, मैं कितने विधायकों से मिलता हूं. सभी कहते हैं कि राजनीति में लोगों की भलाई के लिए काम करना इतना आसान नहीं, मैं देखना चाहता कि यह कैसे इतना मुश्किल हो जाता है. मैं अपने पुराने दिन नहीं भूला. गांव में कहीं किसी के बेटी की शादी हो, किसी को पैसे की जरूरत हो, बुढ़े लोगों को पैसे से मदद करना या मंदिर के निर्माण के लिए गंगा हमेशा आगे रहते हैं. वे कहते हैं, मेरे इस सफर में मेरी पत्नी हमेशा साया बनकर मेरे साथ रही. उसका साथ मुझे हमेशा हिम्मत देता रहा. मेरे माता-पिता, जिन्हें मुझसे कोई खास उम्मीद नहीं थी, आज उनकी खुशी देखकर मुझे लगता है जैसे मैंने सब कुछ पा लिया. 

पहली बार मैं अपनी मां के साथ ही हवाई जहाज पर बैठा था. उनके चेहरे की खुशी मुझे मेरे सफल होने का अहसास दिला रही थी. जिंदगी ने मुझे सब कुछ दिया है, लेकिन मुझे मेरे पुराने दिन नहीं भूलने दिये. मैं अपने साथ काम कर रहे हर कर्मचारी का दर्द समझता हूं. मैं उनकी जगह से ही चलकर यहां तक पहुंचा हूं. किसी जरूरतमंद को देखकर मुंह मोड़ लेने की हिम्मत नहीं होती.  क्या आप अपने शहर, अपने गांव की मिट्टी की कमी महसूस नहीं करते? इस सवाल पर गंगा कहते हैं, मैंने एक छोटा-सा झारखंड यहीं बसा रखा है. आस-पास सब मेरे गांव के मेरी मिट्टी के लोग हैं. भाषा, रहन-सहन सब एक जैसी है. लगता है जैसे मैं अपने ही लोगों के साथ हूं.

15 साल की उम्र में शादी और काम की तलाश 

देवघर जिले के मधुपुर ब्लॉक में अमडीहा के पास हड़िया गांव. इस इलाके में शायद ही कोई हो, जो गंगा सिंह के नाम से परिचित ना हो. न सिर्फ आसपास के, बल्कि झारखंड के कई जिलों के लोग आज गंगा सिंह के पास काम करते हैं. लगभग 1500 लोगों को उन्होंने अलग-अलग कंपनी में काम पर लगा रखा है. गंगा का बचपन इन इलाकों में बीता है. 

गंगा के जीजा सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते थे. बचपन में उनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं थे, तो जीजा जी की फटी हुई वरदी काम आती थी. यही वरदी उनके सीने से ऐसी लगी कि उनके लिए सब कुछ हो गयी. पहली नौकरी मिली, तो 750 रुपये की तनख्वाह और सिक्योरिटी गार्ड की वरदी. किसी भी काम की तलाश में भटकते गंगा सिंह जब गोवा पहुंचे तो उनकी शादी हो चुकी थी. गंगा बताते हैं, मेरी शादी का फैसला भी मेरी किस्मत ने लिया. चाचा के बेटे से जिस लड़की की शादी तय हुई, अचानक किसी कारण से शादी टूट गयी. 

स्कूल से वापस आकर पता चला कि मैं दुल्हा बननेवा हूं. मैंने एक ही तो सपना देखा था. खूब पढूंगा और वही टूट गया, इसके बाद हिम्मत ही नहीं हुई कि कोई सपना देखूं. किस्मत मुझे गोवा ले आयी और काम भी मिल गया. गंगा सिंह सिर्फ नौवीं तक पढ़ पाये, हालांकि अभी भी कम पढ़ने का मलाल  उन्हें है, लेकिन जीवन ने उन्हें इतना कुछ सीखा दिया कि वो अब कई भाषाएं  बोल लेते हैं. गंगा सिंह लगभग 11 भाषाएं बोल और समझ लेते हैं.