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  • Apr 20 2017 8:00AM

लड़कियों के लिए स्कूल खोलने वाले शुकुल गुरुजी

लड़कियों के लिए स्कूल खोलने वाले शुकुल गुरुजी

निराला बिदेसिया

सि वान में एक गांव है पंजवार. रघुनाथपुर प्रखंड में. छपरा से सिवान जाने के रास्ते में. उस गांव में पहुंचना किसी जंग जीतने के समान ही होता है. उबड़-खाबड़ और बेतरीब गड्ढों वाला रास्ता है रघुनाथपुर जाने के लिए. इस लिहाज से सड़क किनारे होते हुए भी पंजवार को एक सुदूरवर्ती गांव कह सकते हैं. गांव की हर गली में स्कूल ही स्कूल देखेंगे, कहीं पुस्तकालय, तो कहीं बिस्मिल्लाह खान संगीत महाविद्यालय देखेंगे, जो एक अलग अनुभूति होगी. जब गांव से बाहर निकल जाएंगे, तो एक बड़ा-सा कॉलेज दिखेगा- प्रभा प्रकाश डिग्री कॉलेज. प्रभावती देवी और जयप्रकाश नारायण के संयुक्त नाम पर स्थापित कॉलेज. 

उस कॉलेज के बाहर एक छोटी-सी झोपड़ी दिखेगी. उस झोपड़ी में एक बूढ़ा होता हुआ एक आदमी मिलेगा. ये वही हैं, जो पंजवार गांव के गलियों से गुजरते हुए गांव से बाहर निकल जाने पर सारी चमत्कृत करनेवाली कहानियों का रचनाकार होगा. अगर आप बात करेंगे तो सहजता से भोजपुरी में एक लाइन का जवाब मिलेगा- हम कुछो नइखी कइले, ई कुल अनेरिया बात ह, गांव के लोग कईले बा, हम तो रिटायर आदमी हईं, एहिजे कालेज पर रहीं ना. जो इतनी सहजता से जवाब देकर अपने संघर्ष और सृजन के लंबे अध्याय को एक पंक्तियों में समेटना चाहते हैं, उन्हें गांव-जवार-जिले के लोग प्यार और आदर से शुकुल गुरुजी कहते हैं. पूरा नाम है घनश्याम शुक्ल. 

घनश्याम शुक्ल, जिन्होंने पिछले पांच दशक से अपना पूरा जीवन ही अपने गांव, गांव के बहाने जवार और गांव-जवार के बहाने सिवान जिले की पहचान को बदलने में लगा दिया है. 

और उसमें भी सबसे ज्यादा ऊर्जा लड़कियों और महिलाओं के लिए नये संसार की रचना करने में. पंजवार गांव में जो ढेरों स्कूल दिखते हैं, हर गली में स्कूल-कॉलेज जाती हुई लड़कियां, बिस्मिल्लाह खान संगीत महाविद्यालय में हारमोनियम के साथ सुर मिलाते हुए लड़कियां और पुस्तकालय में पढ़ती लड़कियां दिखती हैं, ये सारे छोटे-बड़े संस्थान शुक्लजी ने ही या तो खड़े किये हैं, करवाये हैं या नवजीवन दिया है.

शुक्लजी से कॉलेज के बाहर मुलाकात होती है. उनके संघर्ष और सृजन की कहानी को उनसे ही सुनना चाहते हैं. बात करने की कोशिश करते हैं. खुलकर बात करते हैं. सब विषय पर बात करते हैं, लेकिन अपने बारे में नहीं बताते. एक बार भी अपने बारे में नहीं. शुकुल गुरुजी जब अपने बारे में नहीं बताते, तो फिर मास्साब से घंटों बात करने के बाद हम संजय सिंह से पूछते हैं. संजय सिंह उसी गांव के रहनिहार हैं. पेशे से प्रशासनिक अधिकारी. 

शुक्ल मास्साब की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कर्मठ युवा. संजय कहते हैं कि आप पंजवार गांव में जितने संस्थान देखें, जो बदलाव देखें, सब मास्साब ने ही किया है, उनके ही प्रेरणा से हुआ है और गांव के बीचो-बीच जो विशाल घर देख रहे हैं, बड़े अहाता वाला वह मास्साब का ही घर है, लेकिन मास्साब का बसेरा अब वहां नहीं, यहीं रहते हैं, कॉलेज के बाहर कुटिया बनाकर. यही खुली हुई झोपड़ी और अब यही उनकी संपत्ति है, दो कपड़े, एक साइकिल और दो कंबल. 

बकौल संजय, शुकुल मास्साब ने अपना पूरा जीवन ही लड़कियें को आगे बढ़ाने में लगा दिया और हम जैसों को बस एक ही मंत्र देते हैं कि लडकियांं को आगे बढ़ाओ और जितना संभव हो शिक्षा को आगे बढ़ाओ.1992 में घनश्याम शुक्ल ने उस गांव में बिस्मिल्लाह खान संगीत महाविद्यालय खोला. गांव के लोगों ने विरोध किया कि अब नाच-बाजा करवायेंगे गांव में. लड़कियों को बिगाड़ेंगे. गांववालों ने विरोध किया, लेकिन शुकुल मास्साब अड़े रहे.

फिर हिंदुओं ने विरोध किया कि संगीत महाविद्यालय खोलना ही है, तो मुसलमान के नाम पर काहे. मास्साब अड़े रहे जिद पर. तब बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न भी नहीं मिला था. घनश्याम शुक्ल ने संगीत महाविद्यालय खोला. उस समय गांववालों ने विरोध किया था, अब उस संगीत महाविद्यालय में सब अपने बच्चों का दाखिला कराना चाहते हैं. वजह है वहां से पढ़ाई कर निकले करीब 20 बच्चे अब तक सरकारी संगीत शिक्षक बन चुके हैं और उस एक संगीत महाविद्यालय की वजह से गांव में माहौल भी बदल चुका है. वहां भारी संख्या में लड़कियां संगीत सिखने आती हैं. लड़कियों को आजादी मिली, तो पूरा का पूरा गांव ही बदल गया. संजय बताते हैं कि यह सब इतना आसान नहीं रहा गुरूजी के लिए कभी. 

वर्षों पहले मास्साब ने मुसहर समुदाय की लड़कियों को रख कर पढ़ाना शुरू किया था. सबके घर जाते थे. किसी के घर खा लेते थे. इसकी सजा उन्हें यह मिली कि गांववाले उन्हें भरी सभा में बिठाकर उन पर थूके कि ये सब नष्ट कर रहे हैं, लेकिन इतने के बावजूद कभी भी मास्साब अपने कर्तव्यपथ से डिगे नहीं. संजय जयप्रभा डिग्री कॉलेज दिखाते हुए बोलते हैं कि यह भी इनका ही किया हुआ है और इस एक कॉलेज ने पूरे इलाके को बदल दिया. 

है तो यह कोएड कॉलेज, लेकिन यहां काफी संख्या में लड़कियां ही पढ़ने आती है और इस कॉलेज के खुलने के पहले इस पूरे इलाके की लड़कियां मैट्रिक के बाद आगे पढ़ाई आसानी से कर नहीं पाती थी. संजय बताते हैं कि इस कॉलेज के भी खुलने की कहानी रही. मास्साब रिटायर हुए तो उन्हें पैसा मिला. उन्होंने अपने रिटायरमेंट का पूरा पैसा लगाकर एक कॉलेज शुरू कर दिया. यह बात 2008 की है. 

कॉलेज को वे खड़ा करते रहे, लोग कहते रहे कि पागलपन करते रहते हैं. लड़कियों को पढ़ायेंगे, गवायेंगे, नचवायेंगे, पागलपन है कि लड़कियों के लिए पूरी कमाई, पूरा जीवन आहूत कर रहे हैं, लड़कों के लिए करते तो कुछ फायदा भी होता. शुकुल मास्साब सबकी बात एक कान से सुनते थे, दूसरे से निकाल देते थे. 2011 में कॉलेज में पढ़ाई शुरू हो गयी. जिस दिन से घनश्याम शुक्ल ने कॉलेज खोला, उसी कॉलेज के बाहर एक खुली झोपड़ी बनाये और फिर हमेशा वहीं रहने लगे. जहां भी जाना होता है, उसी साइकिल से आते-जाते हैं. 

चूंकि कॉलेज में फंड का अभाव रहता है, इसलिए शुकुल मास्साब चपरासी से लेकर प्राध्यापक तक का काम खुद ही करते हैं. कॉलेज के अहाते में सोते हैं, सुबह जगते हैं और पौ फटने के पहले ही कॉलेज के सभी भवनों को और परिसर को साफ कर देते हैं और बच्चों के आने के पहले नहा-धोकर प्राध्यापक की भूमिका में आ जाते हैं और नियमित क्लास भी लेते हैं. घनश्याम शुक्ल के बारे में संजय ढेरों बात बताते हैं, तो हम एक बार फिर शुकुल मास्साब से मिलते हैं. 

उनसे पूछते हैं कि आप तो अपने बारे में कुछ बता ही नहीं रहे. वे कहते हैं कि बतानेवाली कोई बात ही नहीं. मुझसे मेरे बारे में पूछियेगा तो यही कहूंगा कि मैं एक प्योर पोलिटिकल आदमी हूं. राजनीति करता हूं और राजनीति को ही बदलाव का जरिया मानता हूं. पूछता हूं कि कैसे राजनीति करते हैं आप? चुनाव लड़ते हैं, लड़वाते हैं. हंसते हुए कहते हैं-बस, वही राजनीति है क्या? राजनीतिक चेतना का संचार करना भी राजनीति ही है. लड़कियों को पढ़ाइये, पढ़ने के लिए तैयार कीजिए, उनके लिए संभावनाओं के द्वार खोलिए, उन्हें संगीत सिखाइये, लड़कियों को आजादी मिलेगी, समाज मजबूत होगा, समझदार होगा, राजनीति की धारा बदलेगी. लड़कियां बढ़ेंगी तो समाज बदलेगा, समाज बदलेगा तो राजनीति अच्छी होगी, राजनीति अच्छी होगी तो सब अच्छा होगा. 

घनश्याम शुकुल बात बदलते हैं. कहते हैं कि संजय आपको सब बताया लेकिन यह नहीं बताया होगा कि नयी पीढ़ी के बच्चे भी कितना काम कर रहे हैं. मास्साब बताते हैं कि हमलोगों ने तो 1994 में एक छोटी-सी शुरुआत की थी, आज विशाल वटवृक्ष बन गया है. इस गांव में हर साल नवचेतना समिति द्वारा वर्ष 1994 से सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन होता है. 

अब तक करीब 50 हजार बच्चे इस प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं. पूरे सिवान जिले के बच्चों में इस प्रतियोगिता में भाग लेने और विजेता बनने की होड़ रहती है. हर साल यह प्रतियोगिता होती है. इस प्रतियोगिता के पहले बैच के विजेता आज ग्वालियर के एसएसपी हैं. इस प्रतियोगिता का मकसद और कुछ नहीं. एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण कर शिक्षा में युवाओं की रुचि को जगाना है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)