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  • Oct 25 2017 12:21PM

सफलता के लिए जरूरी है खुद के प्रति कमिटमेंट

सफलता के लिए जरूरी है खुद के प्रति कमिटमेंट

वर्ष 2014 की बात है. ओल्ड बीआइटीएन (मेसरा) के मित्रों ने बताया कि उनके ही बैच (1983-87) के सहपाठी अजय पांडेय ( इनकम टैक्स, एडिशनल कमिश्नर, मुंबई) की पहली थ्रिलर बुक ‘रेजोनेंस’ ने पूरी दुनिया में धूम मचा दिया है. ये किताब amazon.com और uread.com पर उपलब्ध है. कुछ ही महीनों में ये बेस्ट सेलर की केटेगरी में आ गयी है. रेजोनेंस की पटकथा मुंबई पर 26 /11 के आसपास बुनी गयी थी. अजय पांडेय ने बताया कि इस किताब का 50 फीसदी हिस्सा सच के करीब है और बाकी काल्पनिक. इस किताब में बताया गया है कि मुंबई अटैक से पहले भारतीय सिक्योरिटी एजेंसी किस तरीके से काम कर रही थी.

देश पर खतरे को लेकर किस तरीके के इनपुट एजेंसी को मिल रहे थे. अजय पांडेय की इस विशिष्ट उपलब्धि के लिए बीआइटी मेसरा में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. इस दौरान अजय पांडेय को प्रभात खबर के एक कार्यक्रम में भी संवाद के लिए आमंत्रित किया गया. वह बहुत ही सहज, सरल और रोचक व्यक्तित्व के दिखे.

हाल ही में जानकारी मिली कि अजय पांडेय दूसरी थ्रिलर बुक ‘नो-थिंग’ लिख रहे हैं, जो अप्रैल या मई 2018 तक मार्केट में आनेवाली है. ‘नो -थिंग’ का मतलब है शिव. इस किताब में एक हिन्दू लड़की और एक यहूदी लड़के की कहानी है, जो प्रेम विवाह करते हैं और 1950 के आसपास हिंदुस्तान से इजरायल चले जाते हैं. इस दंपती को दो पुत्र होते हैं. ये बड़े पुत्र की परवरिश यहूदी और छोटे को हिन्दू के रूप में करते हैं. छोटा बेटा बहुत ही ब्रिलिएंट है और एक ऐसी मशीन का ईजाद करता है, जो बिना किसी पेट्रोल, डीजल, हवा और बिजली के चलती है. ये मशीन कॉसमॉस के पावर से चलती है. इस मशीन से ट्रेन, हवाई जहाज, पंपसेट और सबकुछ चलाया जा सकता है. जब इस मशीन के ईजाद की खबर दुनिया में फैलती है, तो अमेरिका, रूस, भारत, चीन जैसे देशों की इंटेलिजेंस एजेंसी उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाती है. बड़ा बेटा हिंदुस्तान में इजरायल का राजदूत बनता है और वृंदावन के एक बाबा के साथ मिल कर ऐसा प्लान बनाता है, जिसमें फंस कर भारत, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन जैसे देश लगभग घुटने टेक देते हैं. इसी कड़ी में कहानी आगे बढ़ती है.

मैंने अजय पांडेय से पूछा कि अपने काम से समय निकाल कर कैसे वो किताब लेखन के लिए समय निकाल पा रहे हैं, जबकि थ्रिलर बुक लिखने के लिए काफी क्रिएटिविटी की जरूरत है. कैसे एक सरकारी अधिकारी थ्रिलर, सस्पेंस की किताबें लिखने लगा? अजय पांडेय ने बहुत ही मजेदार किस्सा सुनाया. उन्होंने कहा कि पढ़ाई में तो वो शुरू से ठीक थे, लेकिन थ्रिलर, एडवेंचर्स और जासूसी की किताबें पढ़ना उनका प्रिय शगल था.

बीआइटी मेसरा रांची (1983-87) में मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने से पहले उन्होंने संत जेवियर्स कॉलेज (1981-83) से इंटरमीडिएट और स्कूलिंग विद्यामंदिर, धुर्वा से किया था. वैसे तो वो मूलतः सीवान के हैं, लेकिन उनके माता-पिता सपरिवार रांची के रातू रोड में रहते थे. कॉलेज से घर की दूरी सिर्फ 20 किलोमीटर होने के कारण लगभग हर एक शनिवार और छुट्टियों में हॉस्टल से घर चला जाता था. बहन की जिद्द पर उसे कहानी सुनाया करता था. इसी क्रम में एक बार उन्हें कोई कहानी समझ में नहीं आ रही थी, तो उन्होंने अपनी बहन को मनगढ़ंत कहानी सुना दी. उनकी बहन को वो कहानी काफी पसंद आयी और वो किताब के लेखक के बारे में पूछने लगी. मैंने टालू अंदाज में कह दिया कि ये युगोस्लाविया के किसी लेखक की कहानी है, जो मैंने कहीं पढ़ी है. लगभग तीन महीने के बाद मैंने अपनी बहन को बताया कि यह मेरी ही मनगढ़ंत कहानी है. मेरी बहन ने हौसला बढ़ाते हुए कहा कि जब तुम इतनी अच्छी कहानी सुना सकते हो, तो फिर किताब क्यों नहीं लिखते. उसके बाद ही मेरा रुझान किताब लेखन की ओर हुआ.

अजय पांडेय ने बताया कि जो किताब वो सबसे पहले लिखना चाहते थे, उसे वो आज तक पूरा नहीं कर सके हैं. शायद वो उनकी तीसरी किताब होगी ‘टाइम जीरो’ के नाम से. टाइम जीरो की मुख्य पात्र एक ऐसी लड़की है, जो अपने भूतकाल में जा सकती है. अजय बताते हैं कि कहानी लिखने के दौरान लड़की को उसके भूतकाल में तो ले गया, लेकिन उसके बाद उस काल से कैसे निकले, इसे सोचने में उन्हें सात-आठ साल लग गये. उसी दौरान मन में विचार आया कि ‘टाइम जीरो’ की कहानी को बाद में आगे बढ़ाउंगा. उसी दौरान बीआइटी मेसरा में अजय पांडेय की पढ़ाई खत्म हो गयी और उनकी नौकरी एनटीपीसी में हो गयी. लेकिन, एनटीपीसी में नौकरी करना उन्हें कुछ खास रास नहीं आया और उन्होंने आइएएस की तैयारी शुरू कर दी और तीसरे प्रयास में उनका चयन इंडियन रेवेन्यू सर्विस (इनकम टैक्स) में हो गया.

इनकम टैक्स विभाग में काम करते हुए उन्हें वर्ल्ड बैंक, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (वाशिंगटन डीसी), इंडियन एम्बेसी (अमेरिका) के साथ जुड़ कर काम करने का मौका मिला. उसी दौरान उनकी ट्रेनिंग ड्यूक यूनिवर्सिटी, नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में हुई. इस कारण वर्ल्ड जिओ पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल स्तर पर इंटेलिजेंस एजेंसीज किस तरीके से काम करती है, इसे बहुत ही बारीकी से समझने का मौका मिला. 26 /11 मुंबई अटैक के बाद उन्होंने रेजोनेंस लिखना शुरू किया, जो 2014 में रिलीज हुई. बाद में इस किताब का हिंदी अनुवाद ‘जिहाद एक प्रेम कहानी के’ नाम से रिलीज हुई.

मैंने अजय पांडेय से पूछा कि जीवन के 51 बसंत पूरे होने के बाद वो अपने जीवन को किस तरीके से देखते हैं? क्या वो अपने को सफल मानते हैं? जीवन में सफलता को लेकर उनका क्या नजरिया है? कोई जीवन में कैसे सफल हो सकता है? अजय पांडेय ने बिंदास अंदाज में कहा कि मैं जो करना चाहता था, वो कर पाया, यही मेरी सफलता है. मैं खूब लिखना चाहता था, तो लेखक बन गया. उड़ना चाहता था, तो प्राइवेट पायलट का फ्लाइंग लाइसेंस ले लिया, लेकिन जीवन में खुश रहने के कारण अलग हैं. मैं आइआरएस नहीं होता, लेखक नहीं होता, प्राइवेट पायलट नहीं होता, उसके बदले किसी बैंक में क्लर्क की नौकरी करता, तो भी खुश रहता, अगर घर आकर सुकून मिलता.

सफल होने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है अपने प्रति कमिटमेंट. अपने प्रति ईमानदार बनें और बहुत ज्यादा भागमभाग करने की जरूरत नहीं है, जो भी काम करें, पूरी तन्मयता से करें. चाहे वो ऑटो चलाने का ही काम हो, किसानी का काम हो या फिर कुछ और. उसे पूरी ईमानदारी से करने की जरूरत है.

अंत में मैंने अजय पांडेय से पूछा कि ऐसा कौन-सा गुण है, जो आपको सफल बनाता है. वो हंस कर कहते हैं कि मैं यारों का यार हूं. दोस्ती करता हूं. दोस्ती निभाता हूं और इसे ही अपने जीवन की पूंजी मानता हूं.

बी-पॉजिटिव

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in