blog

  • Nov 6 2017 11:17AM

सपना देखिए, उसे पूरा करने के लिए जी-जान लगा दीजिए

सपना देखिए, उसे पूरा करने के लिए जी-जान लगा दीजिए

 हाल ही में एक फिल्म रिलीज हुई है सीक्रेट सुपरस्टार. ये 10 वीं में पढ़नेवाली लड़की इंशिया के सपनों को हकीकत में बदलने की कहानी है. कैसे एक लड़की, पिता के रूढ़िवादी विचारों और विरोध के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने के लिए जूझती है. फिल्म के एक संवाद में इंशिया अपनी अम्मी (मां) से कहती है कि सपने देखना तो बेसिक है, कम से कम इसकी इजाजत तो सबको होनी ही चाहिए. इस संवाद में प्रतिभाशाली युवा में सपनों को पूरा करने की तड़प दिखाई पड़ती है.

दो दिन पहले खबर आयी कि 2013 में एवरेस्ट फतह करनेवाली दुनिया की पहली दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा पर बायोपिक बनेगी. एकबारगी फिर से अरुणिमा की पूरी दास्तां स्मृति पटल पर आ गयी.

एक लंबी कद-काठी की स्वस्थ लड़की थी, जो नेशनल वॉलीबॉल प्लेयर थी, जिसने अपनी कड़ी मेहनत से सीआइएसएफ का एग्जाम पास कर लिया था. वह ज्वाइनिंग के लिए लखनऊ से पद्मावती एक्सप्रेस ट्रेन से दिल्ली जा रही थी. इसी क्रम में कुछ लुटेरों ने अरुणिमा के सोने की चेन खींचने का प्रयास किया, लेकिन अरुणिमा ने इसका जमकर विरोध किया. अपने मंसूबे पर कामयाबी नहीं मिलने पर उन लुटेरों ने अरुणिमा को चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था. साइड ट्रैक पर दूसरी दिशा से अन्य ट्रेन आ रही थी, जिससे उसका एक पैर कट गया था. उसके बाद कई मुसीबतें आयीं. 

ये आरोप भी लगा कि उसने खुद ही आत्महत्या करने की कोशिश की है. दुनिया की नजर में वो दिव्यांग होकर सहानुभूति का पात्र बन चुकी थी, लेकिन एम्स से छुट्टी मिलते ही अरुणिमा माउंट एवरेस्ट पर चढ़नेवाली पहली महिला बछेंद्री पाल से मिलने गयी. 

उनसे पर्वतारोहण की ट्रेनिंग ली. इस दौरान कई मुसीबतें आयीं, लेकिन उसने हार नहीं मानी और ट्रेनिंग खत्म होने के बाद माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी की. 52 दिनों की कठिन चढ़ाई के बाद आखिरकार 21 मई, 2013 को वह माउंट एवरेस्ट फतह कर ली. इसके साथ ही वह माउंट एवरेस्ट फतह करनेवाली विश्व की पहली दिव्यांग बन गयी.

अरुणिमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि दिव्यांगता इंसान के मन में होती है. शारीरिक विकलांगता पर इंसान विजय प्राप्त कर सकता है. 

मन में विचार जरूर आता है कि इंशिया की कहानी तो रूपहले पर्दे की कहानी है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है या फिर अरुणिमा जैसे कितने उदाहरण हैं, 

लेकिन पिछले 15 महीने में अपने कॉलम लिखने के दौरान अपने बीच से ही बहुत सारे पात्रों को देखने-समझने का मौका मिला, जिन्होंने सपने देखे, सपनों को जीया और फिर उसे साकार किया.
 

डीपीएस के तुषार ऋषि को जाना कि कैसे अचानक बोन कैंसर होने की सूचना मिली, तो लगा कि जैसे जीवन में सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन तुषार ऋषि ने न सिर्फ बोन कैंसर को पराजित किया.

बल्कि एम्स में इलाज के दौरान द पेशेंट किताब भी लिखा और फिर बारहवीं में 95 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल किया.



अरबाज आलम को जाना, जिसके पिता अंडा बेचने का काम करते थे, लेकिन पिता के जज्बे और खुद की प्रतिभा के बल पर आज अरबाज आलम आइआइटी मुंबई में पढ़ाई कर रहे हैं. कलोदी मरांडी को भी जाना, जिसके पिता ने आइआइटी सिंदरी में नामांकन के लिए अपने बैल पंद्रह हजार में बेच दिये, जो उनके जीवकोपार्जन का जरिया था.
 

दुंबी पूर्ति जैसे पिता की कहानी भी जानी, जो गरीबी के कारण तीरंदाजी में बहुत बड़ी पहचान तो नहीं बना सके, लेकिन खरसावां जैसी छोटी जगह में अपनी बेटियों को सड़क के किनारे ही तीरंदाजी सीखा रहे हैं, ताकि अपनी बेटियों के माध्यम से अपने अधूरे सपनों को पूरा किया जा सके.

ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हमें रोज अपने बीच से देखने और सुनने को मिलते हैं. सभी के जीवन में बाधाएं आती हैं, दीवारें खड़ी होती हैं, जहां लगता है कि बस अब आगे का सफर नामुमकिन है, लेकिन लगता है कि हरेक ने अपने सपनों को साकार करने की ठान रखी थी, प्रतिभा तो उनके पास थी ही.

कहा जाता है कि प्रतिभा कितनी भी छिपी हो एक न एक दिन निखर कर सामने आ ही जाती है. इस संदर्भ में सीक्रेट सुपरस्टार का एक संवाद जिसमें शक्ति कुमार (आमिर खान) इंशिया से कहते हैं कि प्रतिभा गिलास में रखे सोडा के बुलबुले की तरह है, जो धीरे-धीरे परत दर परत बाहर आ ही जाती है.