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  • Oct 19 2016 12:40PM

...और भरी-भरी आंखों से देखती रही कझिया

...और भरी-भरी आंखों से देखती रही कझिया

डाॅ श्याम सुंदर घोष (साहित्यकार)

20-11-1934 / 06-10-2016

वे हमें निस्तब्ध करके सहसा नेपथ्य में चले गये. विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि घोष जी नहीं रहे. वयोवृद्ध साहित्यकार-आलोचक डाॅ श्यामसुंदर घोष, सब लोग उन्हें घोष जी कहकर ही संबोधित करते थे. उनके नहीं रहने की खबर सुनकर हृदय बैठ-सा गया और उनसे इन दिनों नहीं मिल पाने को लेकर हुई गलती के बारे में सोचकर मन खिन्न हुआ जा रहा है. जिसके लिऐ हमें कभी माफी नहीं मिल सकती है.

प्रवीण तिवारी

डाॅ श्याम सुंदर घोष का हिन्दी साहित्य में गहरा लगाव था. उनकी दर्जनों रचनाएं प्रकाशित हैं. जिसमें मधुयामा, राज और उर्वशी, नया मसीहा, नये शिशु का जन्म, रत्ना और भुवन, रात और दिन जैसी चर्चित रचनाएं शामिल हैं. डाॅ घोष ने कबीर पर उल्लेखनीय कार्य किया है. जो लोक साहित्य और विविध प्रयोग कबीर के रूप में प्रकाशित है. 

अभी उनके निधन के ठीक एक दिन पहले पांच अक्तूबर को ही राजकमल प्रकाशन से उनकी दो पुस्तकें ‘शिखर सेतु समापन’ और ‘चीनी साहित्यकारों की नजर में प्रेमचंद’ छप कर आयी थी, जिसे देखकर वे चहक उठे थे. घोष जी का जन्म गोड्डा के सौदापुर गांव में 20 नवंबर 1934 ई. में हुआ था. 1951 में मैट्रिक परीक्षा पास की और इसी साल उनकी पहली कविता भी प्रकाशित हुई थी. उनका सपना काॅलेज में प्राध्यापक बनने का था. जिसे अपने अदभुत जिजीविषा के सहारे तमाम परेशानियों से लड़ते हुए पूरा भी किया. 1957 ई. में वे गोड्डा काॅलेज में हिन्दी के प्राध्यापक नियुक्त हुए. फिर वे अध्यक्ष हिन्दी विभाग भी हुए.

डाॅ घोष निरंतर लिखते रहे थे. वे जितना पठनीय गद्य व कविता लिखते रहे, उससे कहीं पैनी धार में व्यंग्य भी. वे एक आलोचक-समालोचक के रूप में भी जाने जाते थे. वे कई पुरस्कारों से नवाजे भी गये. जिसमें राजभाषा पुरस्कार और झारखंड का प्रतिष्ठित राधाकृष्ण अवार्ड भी शामिल है. पर वे अपने को प्रचार-प्रसार से दूर रखते थे. पिछले कुछ बरसों से वे लंबी बीमारी से जूझ रहे थे. उन्हें पैरालिसिस अटैक का असर था. वे अपने गोड्डा स्थित आवास ‘ऋंतभरा’ में एकाकी जीवन जी रहे थे. चूंकि इन बरसों में शहर का भी मिजाज बदल गया था. मिलने-मिलाने की परंपरा खत्म सी हो गयी थी.

बावजूद इसके इस अवस्था में वे साहित्य और समाज को लेकर चिंतित रहते थे. जब कभी उनसे मिलना हुआ वे शहर और संताल परगना में व्याप्त साहित्यिक सन्नाटा की बात करते थे. फिर बड़े प्यार से नसीहत देते कि, जितना पढ़ोगे उतना अधिक लिख सकोगे. चाहे अखबार का रिपोर्ट ही क्यों नहीं लिखो. फिर उनकी चिन्ता में गंभीरता से आज के युवावर्ग की किताबों से बढ़ती दूरी भी शामिल थी. वे कहते थे, आगे पता नहीं क्या होगा! उनके करीबी रहे अधिवक्ता सह सामाजिक कार्याकर्ता सर्वजीत झा ने बताया कि इन दिनों वे चाहते थे कि उनके पैतृक गांव सौदापुर में लड़कियों के लिए 12वीं तक स्कूल खुले. इसके लिए वे स्थानीय सांसद निशिकांत दुबे से भी मिलना चाहते थे. 

साथ ही उनकी इच्छा थी कि उनके गांव वाले घर में ही साहित्य व शोध केंद्र भी बने. पता नहीं अब उनका यह सपना किस प्रकार पूरा हो पायेगा. इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सांसद महोदय ने समझ कर पहल करने की बात कही है. 

डाॅ श्याम सुंदर घोष किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. उन्होंने हरिवंशराय बच्चन पर भी काम किया था. जिसके बाद हरिवंशराय बच्चन से उनका घरेलु संबंध बना. देशभर के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों से भी उनका गहरा नाता था. बावजूद इसके वे मंचीय या पुरस्कारों के भेड़चाल में कभी शामिल नहीं रहे. वे बेबाकी से बोलते और लिखते थे. 

 उन्होंने ‘प्रतिमान’ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन भी वर्षों तक किया. जिसकी चर्चा देश भर में होती थी. जाहिर सी बात थी कि डाॅ श्याम सुंदर घोष गोड्डा सहित पूरे राज्य की भी पहचान थे. जबकि सरकार के द्वारा इस प्रख्यात साहित्यकार की कभी सुधी नहीं ली गयी.

घोष जी की महानता की मिसाल इससे भी मिलती है कि उन्होंने अपने पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार कझिया नदी के किनारे ही करने को कहा था. यह वही कझिया है जो कभी संताल परगना की प्रमुख नदी के रूप में बहती हुई यहां की लाइफ लाइन थी और जिस पर घोष जी ने जीवंत लंबी कविता भी लिखी थी. इसी कझिया किनारे सात अक्तूबर की सुबह उनके इच्छानुसार दाह संस्कार कर दिया गया. घोष जी कझिया में समाहित हो गये. अब घोष जी नहीं होंगे फिर भी उनकी शब्द सरिता बहती रहेगी.

डॉ घोष ने स्थानीय कवियों को पहचान दिलायी : विनय

समकालिन हिन्दी कविता के सशक्त युवा कवि विनय सौरव कहते हैं, घोष जी ने विपुल लेखन किया. किताबें भी संपादित की है. साथ ही उन्होंने स्थानीय कवियों को पहचान भी दिलायी. वे हमारे प्रतिनिधि कवि थे. बीमारी के बाद वे सार्वजनिक जीवन से कट गये थे. बावजूद वे लिखते रहे. उन्हें अभी ओर बहुत कुछ लिखना था. उनसे हमारा परिचय नवम कक्षा में धर्मयुग में छपी कहानी महुआ महादेव पढ़कर ही हुआ था.

हिंदी साहित्य की कई विधाओं में विपुल सृजन : ज्ञानेंद्रपति

साहित्य अकादमी व पहल सम्मान प्राप्त झारखंड के गोड्डा जिले के ही कवि ज्ञानेंद्रपति ने जब डाॅ श्याम सुंदर घोष के निधन के बारे में सुना तो स्तब्ध रह गये.

फिर उन्होंने कहा कि, श्याम सुंदर घोष ने हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में विपुल सृजन किया. उनकी साहित्यिक पहचान कवि के रूप में निर्मित हुई, पर स्थिर हुई विवेचनात्मक गद्य के समझदार लेखक के रूप में. आलोचना, निबंध, संस्मरण, व्यंग्य जैसे अनेक लेखनय रूपों को अपने योगदान से उन्होंने समृद्ध किया. आत्मय व्यंग्य की तो एक विधा ही इजाद की. सामाजिक विषमताओं और सामयिक समस्याओं को आंकने में वे अचूक थे. 

प्रतिमान नाम से एक गंभीर साहित्यिक पत्र निकला, जिसे हिन्दी जगत में गोड्डा की पहचान बनी. पक्षाघात के बावजूद उनकी बौद्धिक सक्रियता अंत-अंत तक बनी रही. अंतः कझिया के कवि की नश्वर देह कझिया नदी के किनारे भष्मीभूत हो गई और कझिया भरी-भरी आंखों से देखती रही. पर उनका कृतित्व अनश्वर है और जनपद की सर्जनात्मक संभावनाओं को हमेशा उत्प्रेरित करता रहेगा.