gound zero

  • Sep 18 2018 3:47PM

तकनीकी युग में तकनीक व्यवस्था से अछूता बोलबा प्रखंड

तकनीकी युग में तकनीक व्यवस्था से अछूता बोलबा प्रखंड

अभिषेक शास्त्री

जिला : सिमडेगा

इस सावन और भादो में बारिश तो कम हुई. शंख नदी का पानी भी काफी उतर गया है. जो नहीं उतरा वह है बोलबा प्रखंड से कालापानी का अभिशाप. 22 जनवरी 1962 को प्रखंड के रूप में स्थापित यह प्रशासनिक इकाई क्या अन्य प्रखंडों से विकास के साथ कदम ताल कर पा रहा है ? दिल्ली और रांची में संग्रहित डिजिटल आंकड़ों में और गूगल के सर्च पेजों में इस प्रखंड का विकास तो कागज में काफी मेंटेन नजर आता है, लेकिन राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर इस प्रखंड में विकास का नेटवर्क डाइवर्ट हो गया है. सड़क संपर्क के बावजूद टेलीकॉम कम्युनिकेशन के अभाव में बोलबा से अब भी कालापानी का पानी नहीं उतरा है.

कार्य दिवस पर भी प्रखंड मुख्यालय में रहता है सन्नाटा
पांच पंचायत, 26 राजस्व ग्राम और करीब 40 हजार की जनसंख्या वाले इस प्रखंड क्षेत्र में डिजिटल संपर्क के अभाव के कारण प्रशासनिक उपस्थिति प्रभावित हुई है. सप्ताह के पांच कार्य दिवस में प्रखंड कार्यालय में सन्नाटा रहता है. समसेरा पंचायत की मुखिया रुक्मिणी देवी कहती हैं कि गुरुवार को प्रखंड में बाजार लगता है. इस कारण इसी दिन प्रखंड मुख्यालय में भीड़-भाड़ होती है. ग्रामीण जुटते हैं और अपनी समस्या या जरूरतों के लिए अधिकारियों से संपर्क करते हैं. अधिकारियों के अन्य दिन अनुपस्थित रहने पर वे कहती हैं कि अब सभी योजनाओं में
डिजिटल कामकाज चल रहा है.

यह भी पढ़ें: अब भी नाले के पानी से ग्रामीण बुझाते हैं अपनी प्यास

प्रखंड क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क नहीं करता काम
प्रखंड में मोबाइल का नेटवर्क नहीं है. इसलिए सिमडेगा जिला मुख्यालय में ही यहां के काम को अपडेट किया जाता है. किसी भी योजना का भौतिक सत्यापन बोलबा में होता है. उसकी डिजिटल इंट्री सिमडेगा में की जाती है. समसेरा पंचायत की मुखिया रुक्मिणी देवी कहती हैं कि इससे ग्रामीण, मुखिया, पंचायत समिति और प्रशासनिक अधिकारी तक को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. दो दिनों के काम में 15 से 20 दिन लग जा रहे हैं.

टैगिंग बोलबा में, तो अपलोड होता है सिमडेगा में
जिला मुख्यालय में काम करने वाले कर्मचारी का कहना है कि इसमें समस्या है. आधार का जियो टैगिंग बोलबा में होता है, तो अपलोड सिमडेगा में. इससे कई बार सिस्टम द्वारा एरर बता दिया जाता है. इसके लिए फिर से प्रोसेस करना होता है यानी फिर से बोलबा तक जाना और जियो टैगिंग करना पड़ता है.

सभी योजनाएं सुचारु रूप से चल रही हैं : उदय रजक
बोलबा प्रखंड के बीडीओ उदय रजक कहते हैं कि बोलबा प्रखंड जिले के 10 प्रखंडों में विकास में पीछे नहीं है. बस बोलबा से सिमडेगा तक भाग-दौड़ लगी रहती है, लेकिन प्रखंड में सारी योजनाओं का क्रियान्वयन सुचारू रूप से चल रहा है. डिजिटल प्रशासन के दौर में बोलबा प्रखंड का सारा प्रशासनिक कामकाज सिमडेगा मुख्यालय में एक किराए के कमरे में चल रहा है. दो कंप्यूटर और चार लोग मिल कर डिजिटल बोलबा को सिमडेगा से संचालित कर रहे हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना का ऑनलाइन काम, मनरेगा का ऑनलाइन भुगतान, आधार का अपलोड और दाखिल-खारिज सहित आय, जाति, जन्म-मृत्यु जैसे प्रमाण पत्र का काम सिमडेगा से किया जा रहा है.

यह भी पढ़ें: वन सुरक्षा समिति के संघर्ष से लहलहा रहे हैं जंगल

बोलबा के कालापानी की कहानी
प्रखंड की स्थापना के 45 वर्षों तक सिमडेगा मुख्यालय से बोलबा जाने के लिए शंख नदी को नाव के सहारे पार करना होता था. बारिश के मौसम में दो महीने तो जान जोखिम में डाल कर लोग आकस्मिक परिस्थितियों में ही इस नदी से गुजरा करते थे. अन्यथा आवागमन बंद रहता था. इन 45 वर्षों में प्रखंड के सभी पदाधिकारी और कर्मचारी ऐसे ही आना-जाना करते थे. इसी कारण यह प्रखंड प्रशासन और जनमानस में कालापानी के नाम से कुख्यात है. यहां सहायक के पद पर कार्यरत एक अधिकारी का कहना है कि उन दिनों बीडीओ को किसी बैठक की खबर दो-तीन दिन पहले दी जाती थी, ताकि वे समय पर बैठक में शामिल हो सकें. जो खबर देने जाता वह भी मुश्किल भरे जंगली रास्तों से होते हुए नदी पार कर ही बीडीओ तक सूचना पहुंचा पाता था. इन वर्षों में सरकारी योजनाओं और विकास का भी यही हाल होता था. न निरीक्षण होता और न ही सत्यापन. कौन देखने आयेगा, यही मान कर योजनाओं में सिर्फ खानापूर्ति होती रही और बोलबा प्रखंड में विकास के ऊपर शंख नदी का पानी चढ़ा रहा.

फिजां बदली है, लेकिन स्थिति पहले जैसी ही
बोलबा प्रखंड में विकास की फिजां बदली है. तकरीबन 45 वर्षों के बाद शंख नदी के ऊपर पुल (2017-2018 में) बना, तो 56 वर्षों के बाद सिमडेगा से बोलबा तक सड़क बन रही है. इन वर्षों में सड़क का संपर्क तो प्रशासन ने साध लिया, लेकिन डिजिटल इंडिया के दौर में टेली कम्युनिकेशन अब भी सपना है. इस प्रखंड में किसी भी मोबाइल सेवाप्रदाता का नेटवर्क पिछले चार सालों से नहीं है.

यह भी पढ़ें: आसमानी बिजली से सुरक्षित नहीं हैं बच्चे

पहले रिलायंस का नेटवर्क होता था, जो बंद होने के बाद इस क्षेत्र से मोबाइल संपर्क ही बंद हो गया. बीएसएनएल का एक टावर प्रखंड कैंपस में ही है, लेकिन हाथी का दांत साबित हो रहा है. आज बोलबा में छोटा काम के लिए भी किसी से संपर्क करना है, तो बोलबा जाना ही होगा. प्रशासनिक काम से लेकर सामान्य काम भी मुश्किल हो रहा है. यहां तक कि इस क्षेत्र के लोग 108 जैसी एंबुलेंस सेवा की सुविधा का लाभ भी नहीं उठा पा रहे हैं. स्थानीय बैंक के शाखा प्रबंधक को कार्यभार ग्रहण करने के बाद घरवालों को खबर करने के लिए प्रखंड से पांच किलोमीटर दूर ऊंचे पठार पर चढ़ना पड़ा. उनका कहना था कि विश्वास नहीं होता कि यह 2018 की बात है कि कोई प्रखंड मुख्यालय नेटवर्क से इस तरह अछूता है. शाम में सिमडेगा लौट कर जब तक घर में बात नहीं कर लेता, तब तक परिजन आशंकित रहते हैं.

जुलाई 2017 से बिजली रानी यहां नहीं पहुंची
बोलबा प्रखंड में बिजली नहीं है. पिछले साल क्लर्क के पद पर नियुक्त हुए पदाधिकारी कहते हैं कि जुलाई 2017 से ही प्रखंड में बिजली नहीं है. बाजार, बैंक और ब्लॉक सब कुछ जेनरेटर के भरोसे चल रहा है. अब तो बिजली के अभाव में होटलों में मिक्सर तक नहीं चलता है. इस कारण उन्हें झारखंड का स्थानीय डिश धुस्का बनाने में परेशानी होने लगी. प्रखंड के दोनों होटलों में अब गीले चावल की की बजाए मैदा के घोल से धुस्का बनाया जा रहा है. नेटवर्क और बिजली के अभाव में यह प्रखंड अब भी कालापानी के अभिशाप से उबर नहीं पाया है.