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  • Oct 2 2018 12:02PM

झारखंड में भी फलने लगे सेब, रंग लायी किसानों की मेहनत

झारखंड में भी फलने लगे सेब, रंग लायी किसानों की मेहनत

मो असगर खान

रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट के पास बसा छोटा घाघरा और रामगढ़ जिले की संग्रामपुर पंचायत के सरलाकलां गांव में सेब फलने लगे हैं. छोटा घाघरा के रहनेवाले रॉबर्ट एक्का और सरलाकलां गांव के बौंडी महतो की मेहनत रंग लायी. दोनों किसानों ने औसतन 30-35 डिग्री तापमान वाले क्षेत्र में भी सेब उगाया है. रांची में एचआरएमएन-99 के सेब उग रहे हैं. इस किस्म के सेब गर्म इलाकों में भी फल देते हैं. तीन साल पहले उनके परिचित ने शिमला से सेब के दर्जनों पौधे मंगवा कर रॉबर्ट को दिये थे.

लो चिलिंग वेराइटी के हैं सेब
रांची के छोटा घाघरा के किसान रॉबर्ट एक्का ने तीन साल पहले सेब के लगभग एक दर्जन पौधे लगाए थे, जिनमें से सिर्फ सात पेड़ ही बच पाये थे. अब इनमें से पांच पेड़ों में लगभग 20 सेब फले हैं, जिसे देखकर रॉबर्ट की खुशी का ठिकाना नहीं है. इनका कहना है कि सब्जी की तरह ही अब सेब की भी खेती करेंगे और आनेवाले दिनों में इसकी खेती से झारखंड को एक अलग पहचान मिलेगी, वहीं दूसरी ओर रामगढ़ स्थित सरलाकलां गांव के किसान बौंडी महतो के पेड़ पर लदे सेब को देखकर वैज्ञानिक भी हैरत में हैं. नामकुम के प्लांडू स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार बौंड़ी महतो के पेड़ में फलनेवाला सेब लो चिलिंग वेराइटी का है. इस तरह के सेब ठंडे यानी कश्मीर, शिमला और उत्तराखंड जैसे इलाकों में होते हैं. इनका कहना है कि ये किसी करिश्मे से कम नहीं है.

बीज, गांछी, पेड़ और 10 साल बाद फल
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साल पहले रामगढ़ के सरलाकलां गांव के किसान बौंडी महतो ने अपनी बारी में सेब के बीज लगाए थे. कुछ महीने बाद वहां पर सेब का पौधा निकला. उसे वहां से निकालकर खेत के किनारे लगा दिया, हालांकि इसमें आधे पौधे नष्ट हो गये थे, लेकिन जो बचे उसने फल देने शुरू कर दिये. किसान बौंडी महतो कहते हैं कि इन पेड़ों में तीन साल से फल आ रहे हैं. पहले 10-12 की संख्या में आए और दूसरे साल 30 के लगभग, लेकिन इस बार करीब 10 किलोग्राम सेब फले हैं. उधर बौंडी और रॉबर्ट के घर स्थानीय लोग बधाई देने भी पहुंच रहे हैं. हाल ही में बौंडी को झारखंड की एक क्षेत्रीय पार्टी के छात्र नेताओं ने सम्मानित भी किया है.

हरिमन-99 है सेब की किस्म
हरिमन सेब की किस्म काफी विकसित बतायी जाती है. सेब की खेती अमूमन कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे ठंडे इलाकों में होती है. हरिमन सेब के पौधे की खासियत है कि ये 40-45 डिग्री तापमान वाले इलाके में भी फल देते हैं. ये शिमला के किसान हरिमन शर्मा के एक सफल प्रयोग से ही संभव हो पाया. इन्होंने 1999 में एक बीज से सेब का पौधा तैयार किया. उसमें फल आया, जो आकार, गुणवत्ता और स्वाद में पूरी तरह परंपरागत सेब की तरह ही निकला. इस सेब को एचआरएमएन-99 के नाम से जाना जाता है. इसके पौधे 2014-15 में राष्ट्रपति भवन में भी लगाये गये हैं. इसके अलावा कई राज्यों में हरिमन सेब का पौधा लगाया जा चुका है.

नेतरहाट में है खेती की काफी संभावना
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसंधान केंद्र (प्लांडू) के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ विकास दास झारखंड में सेब की खेती की संभावना पर कहते हैं कि पेड़ में फल आना और खेती करना अलग-अलग चीज है, लेकिन बौंडी महतो के पेड़ में सेब जिस तरह उगे हैं, उसने झारखंड में सेब की खेती की संभावना को जगा दिया है. विकास दास कहते हैं कि सेब की बहुत सारी किस्म है. इसकी खेती के लिए ठंडा मौसम चाहिए. सेब के पेड़ को जितनी चिलिंग यूनिट मिलेगी, वो उतना ही उत्तम किस्म का होगा. सेब के उत्पादन में देखा जाता है कि पौधे को सात डिग्री के नीचे हर घंटा कितना चिलिंग यूनिट तापमान मिलता है. पौधे में फूल आने से पहले उसके चिलिंग यूनिट को मापा जाता है. जितना चिलिंग यूनिट मिलेगा, सेब उतना मीठा और उन्नत किस्म का होगा. सेब की खेती का सबसे अच्छा तरीका है कलम या ग्राफ्टिंग तकनीक से इसके पौधे लगाए जाएं. दो पौधे के बीच चार मीटर की दूरी हो. गर्मी के दिनों में इसकी देखरेख अच्छे से की जाये. डॉ दास बौंड़ी महतो के पेड़ में फले सेब को देखकर हैरत में हैं. उन्होंने इसे जांचने के बाद कहा कि ये सब भी लो चिलिंग वेराइटी है, हालांकि फल में लाली नहीं आ पायी, लेकिन पेड़ में केमिकल और काम करने पर आ सकती है. तब जाकर उसे बाजारों में बेचा जा सकता है. डॉ दास मानते हैं कि झारखंड में सेब की अच्छी किस्म और बड़े पैमाने पर खेती की संभावना नेतरहाट में हो सकती है, क्योंकि यहां का मौसम इसके लिए काफी अनुकूल है.

सब्जियों की तरह सेब की खेती करने की चाहत : रॉबर्ट एक्का
किसान रॉबर्ट एक्का कहते हैं कि सात साल पहले ड्राइवर की नौकरी छोड़कर खेती करनी शुरू की. आज मेरे खेतों में उपजनेवाली सब्जियां रांची के स्थानीय बाजार तक जाती हैं. इस साल सब्जी और दो ट्रैक्टर तरबूज बेच कर दो लाख रुपये तक की आमदनी हुई है. अब सेब की भी खेती करने की इच्छा है. रॉबर्ट को सरकार की तरफ से कोई सहायता नहीं मिलने का मलाल तो है, लेकिन वो रांची के नामकुम स्थित इंडियन कॉन्सिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में प्रशिक्षण के लिए जाते हैं. खेती में रुचि और सफलता देख कर सेंटर से उन्हें खेत में छिड़काव करनेवाली दो मशीन दी गयी है.

सेब उगने से सपने हुए साकार : बौंडी महतो
किसान बौंड़ी महतो कहते हैं कि सब्जियों की खेती की तरह ही सेब के पौधे में भी खाद-पानी दिया जाता था.उनके पूरे परिवार की आजीविका खेती पर ही निर्भर है. कहते हैं कि खेती से साल में लगभग तीन लाख रुपये की बचत होती है. सेब की खेती करने का विचार तो आता था, लेकिन यह एक सपने जैसा ही था. दो साल पहले जब पहली बार इस पेड़ में फल आएं, तब काफी उम्मीद जगी. इस साल पेड़ में लगे फल को देख कर ऐसा लगता है कि जैसे मेरे ख्वाब को पंख लग गये हों.