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  • Oct 31 2016 7:34AM

अगर मिलता पौष्टिक आहार तो बच्चे न होते कुपोषित

अगर मिलता पौष्टिक आहार तो बच्चे न होते कुपोषित
राज्य में खाद्य सुरक्षा पर उठे सवाल
हर साल 16 अक्तूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है. देश व राज्य में खाद्य सुरक्षा कानून लागू है. बावजूद इसके झारखंड में स्थिति अच्छी नहीं है. दुमका जिले के गोपीकांदर प्रखंड के चीरूडीह गांव में कुपोषित बच्चों की भयावह स्थिति है. कुपोषण उपचार केंद्र में बच्चे इलाजरत है लेकिन तसवीरें सबकुछ बयां कर रही हैं. भोजन का अधिकार कानून लागू हुए राज्य में एक साल हो गये लेकिन आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां भोजन के साथ-साथ अन्य कारणों से बच्चे कुपोषित हो रहे हैं. पहाड़िया समुदाय के बच्चों की स्थिति तो और भी भयावह है. सरकार की ओर से सिर्फ घोषणाएं होती है लेकिन जमीनी धरातल में उतरता ही नहीं है. 
 
शैलेंद्र सिन्हा
 
दु मका जिले के गोपीकांदर प्रखंड स्थित चीरूडीह गांव के प्रदीप देहरी का एक वर्षीय पुत्र कुपोषित है. कुपोषण के साथ-साथ उसे टीबी बीमारी भी है. इस छोटी-सी उम्र में उसकी स्थिति काफी भयावह है. पौष्टिक आहार नहीं मिलने के कारण बच्चे में बीमारी घर कर गयी. बच्चे की मां कहती है कि, बच्चे के जन्म के बाद उसे माड़ पिलायी थी. जब वह गर्भवती थी उस समय भी उसने कोई पौष्टिक आहार नहीं लिया था. जिसके कारण आज उसका बच्चा इस स्थिति में पहुंच गया. 
 
फार्मूला 75 व 100
 
एफ (फार्मूला) 75 के तहत अति गंभीर कुपोषित बच्चे को 15 दिनों तक पतला दूध, मुढ़ी का पाउडर, तीन ग्राम चीनी, तीन एमएल वनस्पति तेल और पानी मिलाकर चिकित्सीय आहार दिया जाता है. फार्मूला 100 के तहत 75 एमएल दूध, सात ग्राम मुढ़ी पाउडर, दो ग्राम चीनी पाउडर, दो ग्राम वनस्पति तेल के साथ पानी मिलाकर उन्हें भोजन दिया जाता है. कुपोषित बच्चें के साथ आने वाली मां को प्रतिदिन 100 रुपये सरकार की ओर से दिये जाते है. 
 
कुपोषण उपचार केंद्र की एएनएम स्वप्ना मुर्मू ने बताया कि कुपोषित बच्चें जब केंद्र में आते हैं तो बच्चे का वजन और लंबाई मापी जाती है. बच्चों को एक सप्ताह के अंदर दलिया एवं एफ 75 और एफ 100 के तहत आहार देना शुरू किया जाता है. देश में पांच साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण काल के गाल में समा जाते हैं. एनएफएचएस की रिर्पोट के अनुसार, 40 प्रतिशत बच्चों में ग्रोथ की समस्या है एवं 60 फीसदी बच्चे कम वजन के शिकार हैं. गर्भवती महिलाओं को भरपूर पोषण नहीं मिलता और इसका मुख्य कारण गरीबी है. महिलाओं में खून की कमी आम बात है. खून में आयरन की कमी के कारण हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है. बच्चों के खानों में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स की कमी होने से बच्चे कुपोषित होते हैं.
 
क्या कहते हैं चिकित्सक 
 
कुपोषण उपचार केंद्र के डाॅ दिलीप कुमार भगत कहते हैं कि केंद्र में अधिकतर कुपोषित बच्चें पहाडिया समुदाय से आते हैं. केंद्र में उन्हें चिकित्सीय आहार देकर 15 दिनों के बाद घर वापस भेज दिया जाता है, लेकिन बच्चे को घर में संतुलित आहार नहीं मिलने से फिर से वह कुपोषित हो जाता है. दुमका जिला कुपोषण उपचार केंद्र में 20 बेड है, जहां कुपोषित बच्चों को चिकित्सीय आहार दी जाती है. यहां आने वाले अति गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों का उपचार किया जाता है. केंद्र की न्यूट्रीशिनल काॅउसंलर नूतन कुमारी बताती हैं कि अधिकतर मां एनेमिक होती है. गर्भावस्था के दौरान वे पौष्टिक आहार नहीं लेती है. 
 
कई बार तो गर्भवती माता अपने छोटे बच्चें को स्तनपान तक नहीं कराती है, जिस कारण भी बच्चें कुपोषित जन्म लेते हैं. उन्होंने कहा कि संताल परगना में अधिकतर मां एनेमिक हैं और बच्चें कुपोषण के शिकार हैं. एएनएम सर्विल कुमारी कहती हैं कि कुपोषित बच्चों का उपचार केंद्र में 15 दिनों के उपचार के बाद उन्हें वापस घर भेज दिया जाता है. ऐसे बच्चों के माता-पिता को आंगनबाड़ी केंद्र में सरकार की ओर से राशन दिये जाने का प्रावधान है. कहती है कि कुपोषित बच्चों का फाॅलोअप नहीं होता है जिस कारण दोबारा बच्चे कुपोषित हो जाते हैं. झारखंड में अमरूद, पपीता, कटहल, सहजन का साग, पालक का साग प्रचुर मात्रा में पाया जाताहै. इसके सेवन से कुपोषण से बचा जा सकता है.
 
जागरूकता की कमी कुपोषण का मुख्य कारण : बलराम
 
सामाजिक कार्यकर्ता बलराम कहते हैं कि झारखंड के 50 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के वजन मापने की मशीन नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में मिलने वाले फल और दाल से कुपोषण दूर हो सकता है. आंगनबाड़ी केंद्रों में अंडा और दाल पोषण के तहत नहीं दिये जा रहे हैं. साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के ग्रोथ चार्ट का संधारण भी नहीं किया जा रहा है, जिससे बच्चों का सही वजन और लंबाई का पता नहीं चल पा रहा है. बच्चों की सही स्थिति की जानकारी के लिए ग्रोथ चार्ट का भरा जाना अनिवार्य है. 
 
राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में लड़की की कम उम्र में शादी और मां बन जाने से बच्चे कुपोषित जन्म ले रहे हैं. कम उम्र की मां ने गर्भधारण के मानकों का पालन नहीं किया और मां द्वारा छह माह तक बच्चे को स्तनपान भी नहीं कराया गया. इस कारण से बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं. इंडियन काॅउसिंल आॅफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक 65 ग्राम दाल बच्चों को दिया जाना चाहिए लेकिन राज्य में 30 ग्राम दाल भी उन्हें नहीं मिल रहा है. झारखंड के प्रमुख प्रोटीन कोदो, मड़ुआ, मकई, कुरथी एवं अरहर राज्य से विलुप्त हो रहे हैं.