gound zero

  • Dec 23 2016 8:26AM

खेत से गायब हुआ, डोभा मजदूरों का नहीं हुआ भुगतान, डोभा निर्माण की हकीकत

खेत से गायब हुआ, डोभा मजदूरों का नहीं हुआ भुगतान, डोभा निर्माण की हकीकत
राज्य सरकार एक ओर गांवों में विकास के लिए प्रयत्नशील है, वहीं कई ऐसी योजनाएं आज भी हैं जो कागजों तक ही समिति हैं या यूं कहें कि योजनाओं के नाम पर गड़बड़झाला हो रहा है. सरकार गांवों में हमारी योजना हमारा विकास कार्यक्रम आयोजित कर रही है. इसके पहले भी योजना बनाओ अभियान की शुरुआत हुई थी. गांवों में जल संरक्षण के लिए डोभा का निर्माण हुआ था, लेकिन इस डोभा की हकीकत अब अापको बताने जा रहे हैं. सरकार ने जल संरक्षण के लिए गांवों में करीब एक लाख डोभा का निर्माण कराया, लेकिन आज भी कई ऐसे जिले हैं जहां सिर्फ कागजों पर ही डोभा का निर्माण हुआ और सरकार से मिली राशि को बिचौलियों ने डकार लिया. 
 
जेम्स हेरेंज
 
संयोजक
 
नरेगा वॉच
 
पिछले साल योजना बनाओ अभियान में डोभा निर्माण कार्य की प्रगति अच्छी थी बावजूद इसके सरकार ने उसे रोक कर हर गांव में पांच-पांच डोभा बनाने का आदेश पारित किया, जो गलत है, क्योंकि ग्रामसभा को इसी योजनाओं को पारित करने के लिए बाध्य किया गया. इसे ग्रामसभा के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है. इस संबंध में सरकार को भी लिखित आवेदन दिया गया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही निकले. 
 
राज्य सरकार की योजना बनाओ अभियान और राज्य में बने डोभा निर्माण की असली हकीकत जानने के लिए गैर सरकारी संगठन झारखंड नरेगा वॉच ने चार जिलों का सर्वे किया. खूंटी, सिमडेगा, गिरिडीह एवं गढ़वा जिले के चार प्रखंड को सर्वे में शामिल किया गया. इसके अंतगर्त आठ पंचायतों के 257 डोभा निर्माण योजनाओं का हाल जानने की कोशिश की गयी. सर्वे रिपोर्ट के आधार पर जो तथ्य सामने आये हैं उसे देख आप भी चौंक जायेंगे. डोभा निर्माण में लगे मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलना, डोभा का निर्माण जेसीबी मशीन से कराना समेत कई शिकायतें भी मिली. शिकायतें मिलने पर सामाजिक संगठन नरेगा वॉच और ग्राम स्वराज के सदस्यों ने अपने स्तर से जांच पड़ताल शुरू की.
 
खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं ग्रामीण
 
खरबागढ़ा गांव के लाभुक डोभा निर्माण को लेकर खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं. कई ऐसे लाभुक भी मिलें, जिनके नाम पर डोभा आवंटन हो गया लेकिन लाभुक को ही नहीं पता कि उन्हें डोभा निर्माण करना है. तो कई लाभुक ऐसे भी मिले, जिनके पासबुक से बिना बताये राशि निकासी कर ली गयी. वहीं कुछ लाभुक को डोभा निर्माण के लिए मात्र 15 हजार रुपये दिये गये जबकि खुद का ही डोभा निर्माण करना था. सिमडेगा जिला के जलडेगा प्रखंड स्थित पतियंबा पंचायत के कई गांवों में डोभा निर्माण में काफी गड़बड़झाला सामने आया है.
 
खरबागढ़ा गांव के टेंटेस टेटे की पत्नी के नाम से एमआइएस में दो डोभा दर्ज है. लेकिन, आलम देखिये, इस महिला को पता ही नहीं कि उसके नाम पर दो डोभा है जबकि उन्हें तो एक डोभा निर्माण के बारे में ही जानकारी है. इतना ही नहीं, बिचौलियों ने उनके नाम से कुछ राशि भी निकाल लिए हैं. इसी तरह दो लाभुक ऐसे मिले, जिनके नाम पर उसके पास बुक से राशि निकासी कर ली गयी.
 
जिला सिमडेगा
 
जलडेगा प्रखंड के पतियंबा पंचायत में एक ही कार्य का दो योजना रिकाॅर्ड तैयार कर राशि की निकासी कर दी गयी. ऐसी योजनाओं की कुल संख्या चार है और फर्जी निकासी की राशि 1,33,600 रुपये है. इसके अलावा पतियंबा में ही तीन योजनाओं के तहत डोभा निर्माण के लिए जेसीबी का उपयोग किया गया, जिनमें दो योजनाओं में 39,412 रुपये का फर्जी मस्टर रॉल बनायी गयी. वहीं एक योजना में किसी प्रकार का कोई भुगतान दिखाया ही नहीं गया.
 
जिला गढ़वा
 
गढ़वा जिले में कुल 28 योजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हुआ है. इसके तहत मेराल प्रखंड के कड़कोमा पंचायत के आठ योजना, हासनदाग के दस योजना, संगबरिया के आठ योजनाओं में काम शुरू ही नहीं हुआ. हालांकि 13 योजनाओं का फर्जी मस्टर रॉल तैयार कर कुल 2,30,961 रुपये की फर्जी निकासी कर ली गयी. इसके अलावा मेराल प्रखंड में 59 योजनाएं हैं जो भौतिक रूप से पूर्ण हैं लेकिन एमआइएस में कार्य प्रगति पर दिखाया जा रहा है. 
 
जिला गिरिडीह
 
जिले के सदर प्रखंड स्थित सिंदुअरिया पंचायत के बाघमारा गांव के नौ मजदूरों ने डोभा निर्माण में काम नहीं करने की बातें कही. मजदूरों ने कहा कि अर्जुन महतो के डोभा निर्माण में ना तो काम किये और ना ही कोई मजदूरी ली. इसके बावजूद लाभुक अर्जुन महतो ने सभी मजदूरों के रोजगार कार्ड एवं पासबुक अपने पास अवैध तरीके से रखे हुए हैं और अपने ही योजना में मजदूरों की अवैध उपस्थिति दिखा कर 17034 रुपये की निकासी हुई है.
 
हकीकत
 
डोभा निर्माण योजनाओं की प्राक्कलित राशि 61,87,301 रुपये है, जबकि महज 34,10,067 रुपये ही खर्च हो पाये, जो प्राक्कलन राशि से मात्र 55 फीसदी ही राशि खर्च हुए. 46 ऐसी योजनाअों का पता चला जो कि शुरू ही नहीं हुई और मनरेगा वेबसाइट में इसे पूर्ण दिखा दिया गया. डोभा निर्माण में लगे 428 मजदूरों को उनकी मजदूरी 3,53,686 रुपये की भुगतान लंबित रखी गयी. वहीं 32 योजनाओं में मजदूरों को उसके मजदूरी का भुगतान बिचौलियों द्वारा नगद रूप से की गयी है. सर्वेक्षण में 23 योजनाओं में जेसीबी मशीन से कार्य कराने के मामले सामने आये हैं. योजना स्थल के आकलन से स्पष्ट है कि 66 फीसदी योजनाएं टांड़ जमीन पर बनायी गयी है, जबकि तकनीकी दृष्टिकोण से डोभा निर्माण योजना धान के खेतों के लिए उपयुक्त है. 
 
क्या है उपाय
 
मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों में गड़बड़ी ना हो, इसके लिए ऊपर से नीचे की पद्धति को छोड़ नीचे से ऊपर की पद्धति को अपनानी चाहिए. साथ ही मजदूरों की मजदूरी भुगतान नियमित हो ताकि मजदूर काम करने को इच्छुक हो, ना कि काम से भागे. ऐसी स्थिति में मजदूर नहीं मिलेंगे और मजबूरन जेसीबी मशीन से काम होगा, जो अब तक होता आया है. इन सभी पहलुओं पर सरकार को ध्यान देना होगा, तभी मनरेगा के तहत किये जा रहे कार्यों में लूट-खसोट नहीं होगी और योजनाएं धरातल पर सही रूप में दिखेगा.