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  • Feb 16 2017 9:11AM

डायन एक काला सच

डायन एक काला सच
प्रवीण तिवारी
ब्लैक ट्रूथ डायन एक काला सच ही है. आज हम विकास की बात जरूर करते है, किन्तु आजादी के 70 साल बाद भी अंधविश्वास के गिरफ्त से बाहर नहीं निकल सके हैं. डायन के मामले में बहुत हद तक यह सच है कि औरत के अस्तित्व का होना ही अपराध है, इसलिए तो हर गुनाह के पीछे तलाशते हैं मेरा वजूद. 
 
झारखंड के प्रथम मुख्य न्यायाधीश बीके गुप्ता ने अपने जरमुंडी (दुमका) दौरे पर कहा था- डायन एक झूठ है. महिलाओं को कमजोर करने के लिए बेईमान मर्द लोग डायन का हवा देते हैं. हाल ही में पूर्व मुख्य न्यायाधीश वीरेन्दर सिंह ने खूंटी के एक सुदूर गांव में झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के एक कार्यक्रम में कहा था कि डायन प्रथा सूबे की एक गंभीर समस्या बन गयी है और इसका समुचित समाधान भी नहीं निकल रहा है. इस पर रोक के लिए इसके खिलाफ समुचित लड़ाई लड़नी होगी. यकीनन आज डायन के नाम पर हत्या और प्रताड़ना के मामले राज्य में नक्सल समस्या जैसी ही गंभीर हो गयी है. झारखंड में 70 और 90 के दशक में डायन कहकर महिलाओं की सामूहिक हत्याएं हुई थी. हालांकि मामला तब सिंहभूम का था. अब यह राज्यव्यापी समस्या बन चुकी है. 
 
बैठक कर लिया जाता है निर्णय
 
आज भी आदिवासियों की जन अदालत लगती है. यहां प्रधान-मांझी हड़ाम का निर्णय ही सर्वमान्य होता है. टोले में बैठक बुलाई जाती है. कथित रूप से महिलाओं पर डायन का आरोप लगता है, जिसमें उनको मैला पिलाये जाने, सामूहिक दुष्कर्म, नाक-कान काटने से लेकर जिंदा जला दिये जाने की सजा दी जाती है. इसके पीछे निहित स्वार्थ ही छुपा रहता है. 
 
राज्य में इस प्रकार के कुकृत्यों का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है. पिछले वर्षां में राज्य में कई बड़ी घटनाएं डायन के नाम पर हुई है. मांडर के कनीजिया गांव में एक साथ पांच महिलाओं की नृशंष हत्या कर दी गयी थी, तो खूंटी में भी खूनी खेल खेला गया. 2003 में गोड्डा जिले के दो आदिवासी महिलाओं को जिंदा जला दिया गया था. आज आये दिन कहीं न कहीं कोई बहामय या सुगनी कथित रूप से डायन के नाम पर मौत के घाट उतार दी जाती है.
 
कमजोर है कानून : झारखंड सरकार के मंत्रिमंडल की 17वीं बैठक में तीन जुलाई 2001 को डायन प्रथा निषेध अधिनियम 1999 को अपनी स्वीकृति दी थी. जिसमें डायन के नाम पर प्रताड़ित करने वालों को जुर्माने के साथ-साथ कारावास की सजा का भी प्रावधान है. पर इसे खौफ पैदा करने वाला कानून नहीं माना जाता है. 
 
जबकि असम का कानून झारखंड, बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र के कानून से अधिक सख्त है, वहां 2015 में डायन हत्या निवारक कानून बिल पास किया गया. जिसमें किसी महिला का डायन कहने भर से तीन से चार साल की कठोर सजा और पचास हजार से पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. डायन के नाम पर हत्या के मामले में धारा 302 के तहत् मुकदमा दर्ज होता है. इस बिल में सात साल से उम्र कैद तक की और एक लाख से पांच लाख रुपये तक जुर्माना तय किया गया है. वहां जांच अधिकारियों के दोषी पाये जाने पर भी दंड का प्रावधान है. झारखंड की मौजूदा व्यवस्था में कानून डायन के नाम पर हत्याएं रोक पाने में विफल है. 
 
कैसे होगा स्थिति में बदलाव : जहां राज्य में डायन प्रथा को लेकर कानून को और कठिन किये जाने की जरूरत है, वहीं डायन कहकर प्रताड़ित महिलाओं के पुर्नवास की भी व्यवस्था होनी चाहिए. केवल गोष्ठियों-सेमिनारों से स्थिति नहीं बदली जा सकती है. कायदे से नियम-कानून बनाने होंगे. जिसे लागू भी करना होगा. महिलाओं को संपत्ति एवं सामाजिक सत्ता पर अधिकार देना होगा. 
 
मामला क्या होता है
 
दरअसल राज्य भर में किसी दूर-दराज के गांवों-कस्बों में डायन के नाम पर प्रताड़ना एवं हत्या की घटनाएं होती रहती है. आपसी रंजिश का बदला चुकाने व अबला-विधवाओं की जमीन-संपत्ति हड़पने का यह नायाब तरीका अख्तियार किया जाता है. और यह खेल अंधविश्वास के सहारे खेला जाता है. राज्य में चिकित्सा सेवा का हाल जग जाहिर है. आज भी आदिवासियों के बीच ओझा-गुनी ही अंतिम सहारा बने हुए है. सुदूर इलाकों में शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं है. 
 
बस यहीं से आरंभ होता है- हवा, फोकसिन, डायन, डकनी, टोनही, भूत, चुड़ैल, जंतर-मंतर एवं टोना-टोटका पर विश्वास. जिसकी परिणति गांव-घरों में किसी महिला को डायन-चुड़ैल करार दिये जाने के रूप में होती है. संताल-आदिवासी समाज में डायन को फोकसीन कहते हैं, जिसे अलग-अलग जगहों पर विभिन्न नाम से जानी जाती है. अलबत्ता डायन दिखती नहीं है, पर इसके नाम पर नंगा नाच जरूर होता है. हाल के वर्षां में डायन के नाम पर हत्या व प्रताड़ना के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और इसकी पुष्टि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों से भी होती है. जाहिर-सी बात है कि यह लिंगगत पुरुष समाज का पूर्वाग्रह नहीं तो और क्या है. 
 
संताल परगना की महिलाएं हमेशा हाशिए पर
 
संताल परगना में महिलाओं का सवाल हमेशा हाशिए पर रहा है. कमोवेश यही स्थिति पूरे राज्य की है. दीगर बात है कि महिला दिवस, महिला मुक्ति और आधी आबादी को हक दिये जाने की आवाज गूंजती रहती है. यहां इन महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बेहतर नहीं है. 
 
उन्हें सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के सरकारी प्रयास फ्लॉप है. यहां भी महिलाओं के दैहिक और मानसिक शोषण की घटनाएं होते रहती है. वृद्धावस्था पेंशन, अंत्योदय, मातृत्व लाभ की योजनाओं सहित मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी फेल है. गांव में भूख, बीमारी, गरीबी, शोषण-अत्याचार एवं प्राकृतिक आपदाओं का आफत बरकरार रहता है, पलायन बदस्तूर जारी है. 
 
यहां की महिलाएं ईंट भट्टा, क्रशर मिलों, कोयला खादानों व घरेलू रोजगारी का काम करती है. इसके लिए उन्हें दिल्ली-पंजाब जाना पड़ता है, जहां वे न्यूनतम मजदूरी व शारीरिक शोषण का शिकार होती है. ताउम्र जिस कुचक्र से वह निकल नहीं पाती है और यह सब कुछ सुनियोजित ढ़ग से रैकेट द्वारा संचालित होता है. संताल परगना में महिला साक्षरता दर राज्य के औसत साक्षरता दर से भी कम है, तो निरक्षरता की ऐसी स्थिति में कायाकल्प की कल्पना कैसे की जा सकती है. 
 
राज्य का मौजूदा कानून कमजोर
 
राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्षा महुआ माजी ने कहा कि डायन प्रताड़ना को लेकर राज्य का मौजूदा कानून कमजोर है. इसे सख्त बनाये जाने की जरूरत है. उन्होंने डायन हत्या व प्रताड़ना के कारणों में शिक्षा में कमी को बताया. उन्होंने इसके लिए मानसिक जागरूकता की बात कही. उन्होंने स्कूलों के सिलेबस में डायन के अंधविश्वास के बारे में पढ़ाये जाने की जरूरत बतायी. उन्होंने इसे महिलाओं के प्रति साजिश करार दिया, जिसमें महिलाओं की जमीन- संपत्ति हड़पने की मंशा होती है.
 
आकर्षक रंगोली बना कर बच्चों ने दिखायी प्रतिभा
 
कौशल विकास दिवस के अवसर पर बहादुरपुर स्कूल के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा दिखायी. रंगोली के माध्यम से आकर्षक चित्र उकेर कर अपनी प्रतिभा का लौहा मनवाया. विद्यार्थियों ने स्कूल के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाया. स्वामी विवेकानंद के चित्र भी रंगोली से बनाये. विद्यार्थियों की रंगोली के माध्यम से बनाये गये आकर्षक चित्र को उपस्थित लोगों ने काफी सराहा. इन बच्चों की प्रतिभा निखारने में सामाजिक संस्था स्मृति किरण के सदस्यों ने अहम भूमिका निभायी. 
 
संस्था के सचिव विजय ठाकुर ने कहा कि इस क्षेत्र के बच्चों में भी काफी प्रतिभा छुपी है, सिर्फ जरूरत है इन बच्चों की प्रतिभा को निखारने की. कौशल विकास दिवस के अवसर पर इन बच्चों ने जो अपनी प्रतिभा दिखायी है, वो काबिल-ए-तारिफ है. इन बच्चों को हर स्तर से प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि ये बड़े स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखा सके. इस अवसर पर पंचायत समिति सदस्य पुष्पा ने कहा कि बच्चों की कलाकारी को देख सभी हतप्रभ हैं. सभी को बच्चों में छुपी प्रतिभा को निखारने में सहयोग करना चाहिए, ताकि अपने क्षेत्र का नाम रौशन हो सके.