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  • Feb 16 2017 9:21AM

जेपीएससी से हुआ मोह भंग, सूकर पालन में बढ़ाये कदम

जेपीएससी से हुआ मोह भंग, सूकर पालन में बढ़ाये कदम
एमपी कुरैशी
सिमडेगा जिला मुख्यालय से लगभग पांच किलोमीटर दूर बंगरू पंचायत के खूंटी टोली में युवा प्रभाकर तिग्गा सूकर पालन कर न सिर्फ अपना जीवन यापन कर रहे हैं बल्कि उन युवकों के लिए प्रेरणाश्रोत बन गये हैं, जो लोग सरकारी नौकरी पाने के चक्कर में प्रतियोगिता परीक्षा देते-देते अपनी आधी उम्र गुजार देते हैं. अपने गांव में लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं कर्मठ युवा प्रभाकर तिग्गा. साधारण-सा दिखने वाले प्रभाकर तिग्गा दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस से ग्रेजुएशन किये हैं. प्रभाकर कहते हैं, हाई स्कूल खूंटी टोली से पढ़ाई करते हुए उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली की ओर रुख किये. बड़े शहर की बड़ी बात है. 
 
इस बीच नौकरी की तलाश भी जारी रही. फिर 1996 में झारखंड आया और यहां भी नौकरी की तालश में इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन नौकरी नहीं मिली. 15 नवंबर 2000 को बिहार से झारखंड राज्य बना. राज्य बनते ही झारखंडियों ने कई सपने संजोने शुरू किये, उसमें मैं भी शामिल था. इसी सपने का एक हिस्सा था जेपीएससी की तैयारी. मैंने पूरी शिद्दत के साथ जेपीएससी की तैयारी की. परीक्षा भी दिये, लेकिन असफल रहा. मन छोटा हुआ और दूसरी बार के लिए प्रयास जारी रखा, लेकिन इस बार भी सफलता नहीं मिली. चूकि मेरे घर में मेरे बड़े भाई रेलवे में कार्यरत थे. इसलिए मन में था कि सरकारी ही नौकरी करने में भलाई है, लेकिन अचानक सरकारी नौकरी से मोह भंग हो गया. 
 
सब कुछ त्याग कर अपने पुश्तैनी खेत में किसानी करने का विचार आया और एक दिन मैं खेत में उतर ही गया. फिर रांची आये और मन किया तो कांके की ओर घूमने चले गये. कांके स्थित बिरसा एग्रीकल्चर में पहुंचे और वहां के सूकर फार्म हाउस गये. यहीं से पांच सूकर खरीद कर सिमडेगा गांव वापस आ गये. उसी दिन से सूकर पालन करने लगे हैं, जो आज तक जारी है. प्रभाकर आगे कहते हैं कि शुरुआती दिनों में सूकर पालन करने में काफी परेशानी आयी, लेकिन 15 दिनों का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद सब परेशानी खत्म हो गयी. प्रभाकर तिग्गा पिछले 12 सालों से सूकर पालन कर अपना और अपने परिवार का जीवन बसर कर रहे हैं. पांच सूकर से शुरुआत करने वाले प्रभाकर के पास आज सौ से अधिक सूकर है. 
 
साल में पचास सूकर तो बेच ही देते हैं. यूं कहा जाये कि साल का एक लाख से अधिक का सूकर बेच देते हैं. प्रभाकर तिग्गा कहते हैं कि सूकर व्यवसाय में अधिक खर्च की जरूरत नहीं पड़ती है. इसके रख-रखाव में ध्यान देना और खान-पान की बात है, तो होटलों से बचे हुए खाने को इन सूकरों को देते हैं. प्रभाकर आगे कहते हैं कि झारंखड में टीएंडी नस्ल का सूकर पालन करने से बहुत लाभ होगा. इसकी मांग भी अधिक है.
सिमडेगा जिला का वातावरण भी टीएंडी सूकर के लिए अनुकुल माना गया है. सूकर बीमार होता है, तो उसे स्वयं ही चेकअप करते हैं, क्योंकि प्रशिक्षण में बताया गया है कि सूकर की देखभाल कैसे किया जाये. प्रभाकर ने बताया कि मैं कभी बाहर जाता हूं, तो मेरी धर्मपत्नी इसका ध्यान रखती है. वहीं सूकर के लिए अपने ही खेत में तालाब खोदा गया है, जहां गर्मी के दिनों में सूकर वहां आराम से रहते हैं.