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  • Jun 21 2017 1:29PM

मधुपुर के गांवों में सब्जी के भाव बिक रहा काजू

मधुपुर के गांवों में सब्जी के भाव बिक रहा काजू
आमतौर पर आठ सौ से एक हजार रुपये किलो तक बिकनेवाला काजू मधुपुर प्रखंड के कई गांवों में सब्जियों से भी कम भाव में बिक रहा है. ग्रामीणों को इसके इतना महंगा होने के संबंध में कम जानकारी है. इसलिए वे पेड़ों पर से तोड़ कर 20-25 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव में बेच देते हैं. वन विभाग ने काजू के हजारों पेड़ इस इलाके में लगाये हैं, लेकिन यहां इसकी कोई प्रोसेसिंग इकाई नहीं लगायी गयी है. न ही इसके व्यवसाय को प्रोत्साहित करने के लिए कोई योजना चल रही है.
 
काजू उत्पादन का हब बन सकता है संताल परगना : वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संताल परगना की जमीन काजू की खेती के लिए उत्तम है. प्रत्येक प्रखंड में 50-50 हजार काजू के पौधे लगाये जा सकते हैं. इनकी सही देखभाल से बड़े पैमाने पर काजू के फल निकल सकते हैं. इन पेड़ों को जहां जानवर खा भी नहीं सकते, वहीं इन पेड़ों की लकड़ियों का भी कोई इस्तेमाल नहीं होता है. एक हेक्टेयर जमीन में न्यूनतम एक से ढाई हजार तक पौधे लगाये जा सकते हैं.
 
काजू की खेती से हो सकती है अच्छी आय : वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अगर उचित मात्रा में खाद व पानी दिया जाये, तो प्रत्येक वर्ष एक पेड़ से 40 किलोग्राम काजू की उपज होती है. प्रोसेसिंग के बाद कम-से-कम 20 किलोग्राम काजू तैयार होता है. इसका बाजार मूल्य 800 से एक हजार रुपये प्रति किलोग्राम है. एक पेड़ से 12-15 साल में ढाई से तीन सौ किलोग्राम काजू मिल सकता है, जिसकी कीमत दो लाख रुपये तक हो सकती है. ग्रामीण स्तर पर एसएचजी ग्रुप बना कर भी खेती को प्रोत्साहन किया जा सकता है. जामताड़ा के नाला, दुमका के जरमुंडी, जगदाहा आदि कई जगहों पर काजू के हजारों पेड़ हैं, लेकिन विभाग न तो इनकी नीलामी कर रहा है और न ही कोई प्रोसेसिंग प्लांट है, जिसके कारण यह फसल बेकार हो रहा है.
 
कहां-कहां हैं काजू के पेड़
प्रखंड के भिरखीबाद मोड़ के अलावा बुढ़ैय-बेलाटांड़ व सलैया सड़क के किनारे सुल्तानपुर, बरमसिया, दुबरा, नैयाडीह, मंझलाडीह, बेलाटांड आदि गांवों में तकरीबन चार से पांच हजार पेड़ हैं. इनमें हर साल फरवरी महीने में फल लगते हैं. ये फल अप्रैल के अंत व मई तक पेड़ों पर तैयार हो जाते हैं. जानकारी के अनुसार, वन विभाग ने इन इलाकों में वर्ष 2005-06 व 2009-10 में सैकड़ों हेक्टेयर भूमि पर काजू के पौधे लगाये थे, जो बड़े होकर वृक्ष बने और फल देने लगे. हालांकि जानकारी के अभाव में कई जगहों पर ग्रामीणों ने काजू के पेड़ों को काट भी दिये.
 
काजू उत्पादन से ग्रामीणों की आजीविका में होगा सुधार
संताल परगना की जमीन काजू की खेती के लिए काफी उपयुक्त है. इसकी खेती कर लोग लाखों की कमाई कर सकते हैं. प्रोत्साहन जरूरी है. काजू का पेड़ पर्यावरण के दृष्टिकोण से काफी उपयुक्त माना जाता है. मधुपुर के इलाके में फिलहाल 4-5 हजार पेड़ बचे हुए हैं.
महादेव रजक, वन क्षेत्र पदाधिकारी