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  • Oct 5 2017 1:37PM

किसानों को सता रही भविष्य की चिंता

किसानों को सता रही भविष्य की चिंता

पंचायतनामा डेस्क

रामगढ़ जिले का गोला प्रखंड खेती के लिये मशहूर है. खेती योग्य उपजाऊ जमीन है और किसान मेहनती भी हैं. यही कारण है कि कृषि के क्षेत्र में गोला अपनी एक अलग पहचान रखता है. लेकिन, अब ऐसा लगता है कि गोला कि यह पहचान बहुत दिनों तक नहीं रहेगी, क्योंकि क्षेत्र में औद्योगीकरण जोर पकड़ रहा हैै और खेती योग्य भूमि नये उद्योग की भेंट चढ़ रही है. उद्योग और कृषि कार्य में भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. जल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिसके कारण भूमि के बंजर होने का खतरा बढ़ता जा रहा है.

इलाके में ही राज्य के जल संसाधन मंत्री का घर है, लेकिन किसानों की सिंचाई के लिए कोई मुकम्मल व्यवस्था नजर नहीं आती है. भैरवी जलाशय का निर्माण कराया गया है, लेकिन उससे सिर्फ आसपास के किसान ही खेती कर पायेंगे. छोटी नदियों में चेकडैम बनाये गये थे, पर कार्य की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि एक ही बारिश में सब बह गया. इलाके के किसान खेती तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें भविष्य की चिंता काफी सता रही है. कामता गांव में प्रदूषण इतना अधिक है कि इसका असर सीधे तौर पर किसानों के खेतों और उत्पादन पर पड़ रहा है. हाड़तोड़ मेहनत करनेवाले किसानों को सरकारी सुविधाएं भी नहीं के बराबर मिल रही हैं.

लाखों रुपये का हुआ नुकसान

फसल बीमा के नाम पर राजकुमार भड़क उठते हैं. कहते हैं कि सिर्फ घोषणाओं में सुनते हैं कि किसानों को फसल बीमा का लाभ मिल रहा है, पर आज तक उन्हें कोई लाभ नहीं मिला. फसल बीमा कराने को लेकर किसानों को कई बार प्रखंड कार्यालय का चक्कर काटना पड़ता है, फिर भी जल्दी काम नहीं होता है. राजकुमार कहते हैं कि इस बार मकई की खेती में 50 से 60 हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है. मेहनत बेकार गयी, वो अलग.

किसानों को नहीं मिलती हैं सुविधाएं
क्षेत्र के कई किसान कहते हैं कि कई बार उनके सामने पूंजी का अभाव हो जाता है, बावजूद इसके केसीसी लोन नहीं लेना चाहते हैं. युवा किसान राजकुमार बताते हैं कि बैंक अधिकारियों द्वारा लोन लेने के नाम पर किसानों के मन में इतना डर भर दिया जाता है कि बेचारे कम पढ़े-लिखे किसान लोन के नाम से ही डर जाते हैं और पूंजी के अभाव में भी लोन लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. राजकुमार ने बताया कि पैसे की कमी होने के चलते उन्होंने महिला समूह से 22 हजार रुपये ऋण लिया है. खाद और बीज भी बीज दुकानों से ही खरीदना पड़ता है.
   
लैम्पस में खाद आता है, लेकिन इसकी जानकारी हम किसानों को नहीं मिलती है. किसानों को खेती-बारी की कोई जानकारी नहीं दी जाती है. कृषि मित्र कौन हैं, किसानों को इसकी भी जानकारी नहीं है. राजकुमार कहते हैं कि अगर किसानों को बेहतर खेती-बारी करने की जानकारी दी जाती, तो किसान और अच्छी पैदावार कर सकते थे और उनकी आमदनी भी बढ़ सकती थी.

सिंचाई के लिए होती है परेशानी

राजकुमार द्वारा अपने खेत के पास एक डीप बोरिंग करायी गयी है, जिससे वो खेतों में सिंचाई करते हैं. पीने योग्य पानी से सिंचाई किये जाने के सवाल पर राजकुमार बताते हैं कि सिंचाई का दूसरा कोई विकल्प नहीं है. पास से ही एक छोटी नदी गुजरती है, पर उसमें बनाये गये सभी चेकडैम बारिश की भेंट चढ़ गये़  सिर्फ नाम के लिए चेकडैम बनाये गये थे. गुणवत्ता का कोई ख्याल नहीं रखा गया और पैसों की बंदरबांट की गयी़  अगर चेकडैम का निर्माण गुणवत्तापूर्ण हुआ होता, तो आज किसानों को सिंचाई में परेशानी नहीं होती़  भैरवी जलाशय का भी निर्माण कराया गया है, लेकिन उसका पानी इलाके के सभी किसानों तक पहुंचाया जाये, इसके लिए अब तक समुचित प्रयास नहीं किया गया है. क्षेत्र में जलस्तर की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजकुमार महतो की 450 फीट की बोरिंग सूख चुकी है. राजकुमार बताते हैं कि राज्य के जल संसाधन मंत्री हमारे क्षेत्र से हैं, लेकिन इसका फायदा यहां के किसानों को नहीं मिल रहा है.

बर्बाद हो गये कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू 
इस बार आलू लगाने के लिए राजकुमार ने 17 बोरे आलू कोल्ड स्टोरेज में रखवाये, लेकिन जब आलू की बुआई करने के लिए राजकुमार आलू लेने कोल्ड स्टोरेज गये, तो देखा कि सभी आलू खराब हो चुके हैं, जो अब खेत में लगाने लायक नहीं हैं. इससे उन्हें लगभग छह हजार रुपये का नुकसान हो गया और उसकी भारपाई करनेवाला कोई नहीं है. राजकुमार बताते हैं कि कोल्ड स्टोरेज का मैनेजर इस मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. अब राजकुमार को यह चिंता सता रही है कि उन्हें दोबारा बाजार से आलू खरीदना पड़ेगा.

बड़े बाजार की है जरूरत
गोला प्रखंड सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन उत्पादन के अनुरूप किसानों के लिए बाजार उपलब्ध नहीं है. इसका खामियाजा मंझोले और छोटे किसानों को भुगतना पड़ रहा है. किसान कहते हैं कि बाजार बड़ा होता, तो किसानों को सब्जियों के उचित दाम मिलते. लेकिन, बाजार में छोटे व्यापारी औने-पौने दाम में किसानों से सब्जियां खरीद लेते हैं और उन्हें  आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.      q

भैरवी जलाशय में दुलेश्वर की डूब गयी फसल

राजकुमार महतो के खेत के बगल में खेती कर रहे दुलेश्वर महतो कहते हैं कि भैरवी जलाशय में पानी भर जाने के कारण उनकी पूरी फसल डूब कर बर्बाद हो गयी़  मजबूरन वह  कामता गांव में आकर लीज पर जमीन लेकर खेती कर रहे हैं. फिलहाल उनके खेत में खीरा और लौकी है और आलू एवं मटर लगाने की तैयारी की जा रही है. सिंचाई के लिए उनके पास कोई संसाधन नहीं है. दूसरों के कुएं से सिंचाई करते हैं. फसल बर्बाद होने के बाद भी आज तक उन्हें एक रुपये का मुआवजा नहीं मिला है. खेती के लिए कृषि लोन लिये, लेकिन पूरी फसल बर्बाद हो गयी है. दुलेश्वर की अब परेशानी यह है कि लोन लिये पैसे को वह चुकायेंगे कैसे. दुलेश्वर कहते हैं कि दूसरा कोई काम नहीं है, तो क्या करें. परिवार के 12 सदस्यों का पेट भरना है, तो खेती करनी ही पड़ेगी. सरकारी लाभ के नाम पर कुछ नहीं मिलता है. महंगी खाद और बीज खरीदने पड़ते हैं और बाजार में कभी-कभी सब्जियों के दाम भी सही नहीं मिल पाते हैं, जिसके कारण घर की जमा पूंजी भी खत्म हो जाती है. हम किसानों की कई समस्याएं हैं, लेकिन हमारी सुध लेनेवाला कोई नहीं. नौबत यहां तक आती है कि हम दूसरों का पेट भरने के बाद ही अपना पेट भर पाते हैं़

पुरखों को देख खेती करने को उतरे किसान राजकुमार
राजकुमार महतो गोला के युवा किसान हैं. कृषि पर ही इनका और इनके परिवार का भविष्य निर्भर है. राजकुमार महतो के घर में कुल पांच सदस्य हैं. राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद राजकुमार पूरी तरह खेती-बारी में लग गये और खेती करने लगे. पुश्तैनी जमीन थी. दादाजी और पिताजी को खेती करते देखा था और खुद भी हाथ बंटाते थे, इसलिए शुरुआत से ही कोई परेशानी नहीं हुई. राजकुमार को खेती करते हुए आज लगभग 15 साल हो गये हैं. राजकुमार के खेतों में 60 डिसमिल में भिंडी लगी हुई है. 20 डिसमिल में मूली, दो डिसमिल में हल्दी, छह डिसमिल में मकई, 20 डिसमिल में कच्चू और 80 डिसमिल मेें अरहर की फसल लगी हुई है. अभी मिर्च और बैंगन का बिचड़ा खेतों में तैयार है. राजकुमार बताते हैं कि खेती करने में मेहनत तो लगती है, लेकिन उसके अनुरूप उन्हें फायदा नहीं होता है. हालांकि, सुकून इस बात का है कि पूरा परिवार एक साथ रहता है और खाने-पीने की तकलीफ नहीं होती है.

बीएमएल के डस्ट से बंजर हो रही जमीन, उपज पर भी असर
युवा किसान राजकुमार महतो कहते हैं कि अब खेती-बारी के पेशे में किसानों को पहले की अपेक्षा अब मौसम की मार ज्यादा झेलनी पड़ रही है. समय से बारिश नहीं होती है और कभी-कभी बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है, इससे खेती पर प्रतिकूल असर पड़ता है. राजकुमार कहते हैं कि इलाके के किसानों का दर्द सिर्फ इतना भर नहीं है. पास में ही स्थित बीएमएल (ब्रह्मपुत्र मेटेलिक लिमिटेड) फैक्ट्री से निकलनेवाले डस्ट से भी किसान परेशान हैं. डस्ट के कारण जमीन के बंजर होने का खतरा बढ़ गया है, साथ ही खेत में काम करनेवाले किसानों को भी स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों का डर सताने लगा है. किसान कहते हैं कि दिनभर हवाओं में धूलकण उड़ती रहती है. बराबर धूलकण उड़ने के डर से अब इलाके के किसानों ने फूलगोभी और मटर लगाना ही छोड़ दिया है, जबकि पहले यहां के किसान फूलगोभी और मटर का उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमाते थे. फैक्ट्री का डस्ट सब्जियों के फूलों पर जम जाता है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है. अपने मकई के पौधों को दिखाते हुए राजकुमार ने बताया कि कैसे मकई की पूरी पत्तियां काली हो गयी हैं. धूलकण की रोकथाम के लिए कई बार इलाके के किसानों ने फैक्ट्री प्रबंधन से डस्ट नियंत्रण मशीन लगवाने का आग्रह किया,  लेकिन आज तक किसानों की समस्या का समाधान नहीं हुआ है. इतना ही नहीं, इन किसानों की समस्या पर अधिकारियों से लेकर इलाके के जनप्रतिनिधि भी कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसका खामियाजा क्षेत्र के किसानों को उठाना पड़ रहा है.