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  • Oct 25 2017 1:14PM

झारखंड में कुपोषण की स्थिति भयावह : हलधर

झारखंड में कुपोषण की स्थिति भयावह : हलधर
खाद्य सुरक्षा का सीधा संबंध कुपोषण से है. सिर्फ लोगों का पेट नहीं भरे, बल्कि उन्हें पोषणयुक्त आहार भी मिले. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रही है. कोई भूखा नहीं रहे, इसके लिए लगातार नये प्रयोगों के साथ-साथ नये-नये प्रयास किये जा रहे हैं. फिर भी जो आंकड़े झारखंड को लेकर आ रहे हैं, उससे यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर तत्काल कोई दूरगामी उपाय नहीं किये गये, तो भविष्य में झारखंड में भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. वर्तमान में राज्य सरकार समेत अन्य संस्थाओं को इसके लिए गंभीरता से सोचना होगा और उसकी बेहतरी के लिए कार्य करना होगा. अगर अब भी तत्परता नहीं दिखायी गयी, तो बहुत देर हो जायेगी. यहां सवाल यह उठता है कि अगर सरकार कह रही है कि खाद्य सुरक्षा का लाभ सभी लोगों को मिल रहा है और जो लोग छूट गये हैं, उन्हें इसके दायरे में लाने का प्रयास किया जा रहा है, तो कमी कहां रह जा रही है. आखिर समृद्ध झारखंड की धरती पर ऐसा क्यों हो रहा है कि भावी पीढ़ी धीरे-धीरे कमजोर हो रही है. खाद्य सुरक्षा लागू होने के बाद भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं. इन तमाम मुद्दों पर पंचायतनामा ने झारखंड राज्य खाद्य आयोग के सदस्य हलधर महतो से झारखंड में खाद्य सुरक्षा की स्थिति, उसके निवारण व अन्य राज्यों व देश से झारखंड की तुलना के संदर्भ में विशेष बातचीत की. पेश है उनसे बातचीत पर आधारित यह आलेख. 
 
 
खाद्य सुरक्षा के तहत सरकार बेहतर कार्य कर रही है. नये प्रयोग के तहत हर जरूरतमंद को भरपेट भोजन देने का प्रयास किया जा रहा है. यह सराहनीय पहल है और इसकी सराहना भी की जानी चाहिए, पर कुछ चिंताएं भी हैं. झारखंड के संदर्भ में कई भयावह आंकड़े भी आये हैं. वर्ष 2012 के आंकड़ों के हिसाब से राज्य में 37 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. भरपेट पौष्टिक भोजन उनके लिए सपने जैसा है. बाकी राज्यों की बात करें, तो उपभोग की गुणवत्ता में सुधार आया है, लेकिन झारखंड जैसे कुछ राज्यों में अभी भी सिर्फ पेट भरने के बारे में ही अधिकतर लोग सोच पा रहे हैं. गरीबी से लड़ने की दिशा में अगर आंकड़ों को देखें, तो पता चलता है कि दूसरे राज्यों की अपेक्षा राज्य में 1994 से 2012 तक झारखंड में गरीबी धीरे-धीरे कम हुई है, वहीं आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गरीबी तेजी से खत्म हुई है. 
1994 से 2005 तक झारखंड में गरीबी के स्तर में तेजी से गिरावट आयी, लेकिन अब वो रफ्तार थोड़ी कम हो गयी है. इन आंकड़ों का सीधा संबध गुणवत्तापूर्ण और भरपेट खान-पान से है. उदाहरण के लिए- अगर एक व्यक्ति महीने में पांच हजार रुपये कमाता है, तो वो खाने में तीन हजार रुपये खर्च कर सकता है, लेकिन तीन हजार खर्च करके वो अपने लिए कितना पोषक आहार ले पायेगा, यह कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ सकता है. अगर उस कमाई पर और पांच लोग आश्रित हों, तो स्थिति क्या होगी, यह भी आप समझ सकते हैं. इसका एक और असर यह होता है कि गरीबी के चलते एक परिवार को अच्छा और संपूर्ण पोषण नहीं मिल पाता है और फिर उसके बाद उसकी आनेवाली पीढ़ी भी कुपोषण और गरीबी का शिकार हो जाती है. 
 
भले ही सरकार जीडीपी में बढ़ोतरी दिखा कर खुश हो रही हो, लेकिन जीडीपी को दिखा कर कुपोषण की सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता है. जीडीपी के विकास के साथ-साथ मानव संसाधन का विकास हो, यह जरूरी नहीं है. अगर ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआइ) के आंकड़े और 1951 से 2006 के बीच की जनसंख्या, जीडीपी और खाद्यान्न उत्पादन के आंकड़ों को देखें, तो जहां जीडीपी में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, वहीं उस अनुपात में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन जिस अनुपात से जीडीपी में वृद्धि हुई, उस अनुपात में खाद्य उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं हुई, जबकि जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई. 
 
अभी- अभी प्रकाशित ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत 119 देशों की सूची में फिर से तीन स्थान नीचे गिर कर 97 से 100वें स्थान पर पहुंच गया है. हमारी स्थिति  कांगो, बांग्लादेश, नेपाल और माली से भी खराब है. इस बीच  ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हुए बदलाओं में जहां चीन, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, सूडान , श्रीलंका व मंगोलिया यहां तक की युगांडा में भी एक सकारात्मक कमी हुई, वहीं भारत में यह बदलाव नकारात्मक रहा है और  1996 से लगातार नीचे गया है. 1996 में जहां यह  22.9  अंक था, वहीं वर्ष 2011 में यह बढ़ कर 23.7, वर्ष 2016 में 28.5 एवं वर्ष 2017 में पुन: बढ़ कर 31.4 अंक के साथ बहुत ही गंभीर स्थिति में पहुंच गया है .  वर्ष 2008 में ( इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (आइएफपीआरआइ) द्वारा ग्लोबल हंगर इंडेक्स के एक तुलनात्मक विश्लेषण में झारखंड की स्थिति सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक देशों, मेडगास्कर के समान की गयी है, जो हैती, मोजांबिक जैसे देशों से काफी नीचे है. इस संदर्भ में झारखंड के जनजातीय बहुलतावाले क्षेत्रों की तुलना तो विश्व के अति पिछड़े देशों जैसे अंगोला, चाड, इथियोपिया, बुरुंडी या कांगो जैसे देशों से की जा सकती है.
 
प्रति व्यक्ति खाद्यान्न खपत की बात करें, तो पूरे विश्व में औसतन जहां प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की खपत 316 किलोग्राम है, वहीं भारत में यह उसका अाधा यानी मात्र 175.1 किलोग्राम है. दूसरी ओर, अमेरिका में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की खपत सबसे ज्यादा 953 किलोग्राम है. चीन में 287.9 किलोग्राम है. उसी प्रकार मांस एनिमल प्रोटीन के सेवन की बात करें, तो वि‌श्व का औसत 40.2 किलोग्राम है. अमेरिका का औसत 126.6 किलोग्राम है. चीन में यह औसत 56.8 किलोग्राम है, जबकि भारत में यह औसत वैश्विक औसत से आठ गुना कम यानी मात्र 5.3 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है. हां, दूध के सेवन में हम काफी आगे हैं. भारत में प्रति व्यक्ति दूध की खपत 84.5 लीटर है. चीन में 22.7 लीटर, जबकि वैश्विक औसत 97.8 लीटर है. ये रही देश और दुनिया की बात. अगर झारखंड की बात करें, तो यहां के हालात ठीक नहीं हैं. नेशनल फैमिली फूड एंड हेल्थ सर्वे यानी एनएफएचएस के 2015-16 के आंकड़ों की मानें तो झारखंड में पांच साल से छोटे बच्चों में से 47.8 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं यानी उन्हें बेहतर और गुणवत्तापूर्ण खाना नहीं मिल पा रहा है. 29.11 फीसदी बच्चे नाटे (स्टेंटेड) यानी उनकी लंबाई उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ी है. मतलब शारीरिक विकास रूक गया है, जो यह स्पष्ट करता है कि लंबे समय से उनके परिवार में खाने की कमी रही है. मतलब साफ है कि काफी समय से बच्चों को भी भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है. महिलाओं में कुपोषण की बात करें तो 62.6 फीसदी गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है यानी हमारी कुल गर्भवती महिलाओं में आधा से अधिक महिलाएं एनिमिक हैं. इस मामले में भी झारखंड की स्थिति पूरे देश में सबसे खराब यानी पहले नंबर पर है. ऐसे ही पांच साल से छोटे बच्चों में एनीमिया के मामले में हम नीचे से दूसरे नंबर पर हैं. लगभग 69.9 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रसित हैं. ये आंकड़े झारखंड के लिए काफी डराने वाले हैं, क्योंकि इनका सीधा संबंध हमारे मानव विकास से जुड़ा हुआ है. आनेवाली पीढ़ी को अगर मजबूत करना है, तो हम इन चुनौतियों को छोड़ने की शायद कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. जो भी आंकड़े हैं, वो डराने वाले हैं. हमें इन चुनौतियों के टिकाऊ और स्थायी उपाय ढूंढने होंगे. खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत उल्लेखित प्रावधानों एवं नीति आयोग द्वारा अनुशंसित राष्ट्रीय पोषण रणनीति को अगर हम तर्कपूर्ण एवं प्रभावी तरीके से धरातल पर उतार सकें, तो झारखंड के लिए यह एक प्रभावकारी एवं कारगर उपाय साबित हो सकता है.
 
इन सभी के अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून अंतर्गत भोजन सुरक्षा को बढ़ावा देनेवाले उपाय जैसे छोटे और मंझोले किसानों के हित (उत्पादन और जीवनयापन सुरक्षा) को ध्यान में रखने, कृषि योग्य भूमि को गैर कृषि कार्य के उपयोग में परिवर्तित होने से बचाने वाले नीतिगत उपायों से सुरक्षा, स्थानीय स्तर पर खाद्यान्न उत्पादनों की खरीद, भंडारण एवं वितरण इत्यादि की व्यवस्था के साथ-साथ वृद्ध एवं वरीय नागरिकों, विकलांगों एवं एकल महिलाओं के लिए पर्याप्त पेंशन और सुरक्षा के उपायों को सुनिश्चित किये बिना कुपोषण की वर्तमान स्थिति से बाहर आना मुश्किल लगता है. खाद्य सुरक्षा कानून इन सबको सुनिश्चित करने के लिए एक बेहतर और कारगर हथियार साबित हो सकता है.
 
हलधर महतो
(सदस्य), राज्य खाद्य आयोग