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  • Nov 3 2017 1:30PM

ठगे जा रहे हैं पुनगी के किसान

ठगे जा रहे हैं पुनगी के किसान

 रांची जिला मुख्यालय से दूर मांडर प्रखंड मुख्यालय से कुछ दूरी पर स्थित है पुनगी गांव. खेती-बारी के लिए पुनगी गांव की इलाके में एक अलग ही पहचान है. यहां के अधिकतर लोग खेती करते हैं और खेती ही यहां के ग्रामीणों का मुख्य पेशा भी है. लेकिन, जागरूकता की कमी के कारण खासकर छोटे किसानों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

खाद, बीज और कीटनाशक दवाइयों के नाम पर आज भी ठगे जाते हैं. फूलो उराइन पुनगी गांव की एक महिला किसान है. खेती-बारी में पति और बच्चे सहयोग करते हैं, तब जाकर छह सदस्यों वाला उनका परिवार चलता है. महिला फूलो उरांइन जागरूकता की कमी से होनेवाले नुकसान को भी बेबाक से बताते हुए कहती हैं कि जब तक किसान जागरूक नहीं होंगे, उनके खेतों में लगे फसल या तो औने-पौने दामों में ही बिकेंगे या फिर कीट-बीमारियों से बर्बाद होते रहेंगे.भले ही सरकार किसानों की भलाई की बातें करती हों, लेकिन आज भी किसान यूं ही ठगे जा रहे हैं.

 
खेती-बारी में होती है बहुत परेशानी : फूलो उराइन
सिंचाई के लिए फूलो उराइन पारंपरिक संसाधनों पर ही निर्भर हैं. इसके कारण अक्सर सिंचाई की समस्या हो जाती है. फूलो कहती हैं कि अगर सिंचाई की व्यवस्था होती, तो और अच्छी तरीके से खेती कर सकती थी. कृषि मित्र के बारे में पूछने पर फूलो कहती हैं कि उसे कृषि मित्र के बारे में कोई जानकारी भी नहीं है. बेहतर खेती-बारी करने के बारे में कोई भी उसे बताने के लिए नहीं आता है. किसान क्रेडिट कार्ड के बारे में भी फूलो को कुछ नहीं पाता, क्योंकि आज तक इस संबंध किसी ने उसे कुछ नहीं बताया. फूलो बताती है कि खेती-बारी में बहुत परेशानी होती है. कभी थोड़ा फायदा होता है, तो कभी नुकसान भी हो जाता है. दिन-रात मेहनत करने के बाद भी उतना लाभ नहीं हो पाता है, जितना होना चाहिए, क्योंकि बाजार में अगर थोड़ा भी उतार-चढ़ाव आता है, तो सब्जियों के उचित दाम नहीं मिल पाते हैं.
 
खरीदने पड़ते हैं धान और सब्जियों के बीज
कम पढ़ी-लिखी होने के कारण फूलो उरांइन मजदूरी के अलावा और कोई दूसरा काम कर नहीं सकती थी. इसी बीच खेती करने को सोची. खेती-बारी करते हुई कई साल बीत चुके हैं. खेती-किसानी के कार्यों का फूलो ने कई दौर देखा है. फूलो बताती है कि पहले तो घर के बीज से ही खेती होती थी. गोबर खाद का इस्तेमाल होता था और सिंचाई के लिए कुओं से पर्याप्त पानी मिल जाते थे. पर, अब तो हर साल धान का बीज और सब्जियों के बीज खरीदने पड़ते हैं. आस-पास डीप बोरिंग कर दी गयी है, तो कुएं का पानी भी अब सूख जाता है. पहले गोबर खाद से अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन अब खेत में बिना यूरिया डीएपी का इस्तेमाल किये काम ही नहीं होता है. फिर भी खेत अपना है, तो खेती करना पड़ता है. फिलहाल फूलो उरांइन के करीब 60 डिसमिल जमीन में फूलगोभी लगे हुए हैं. आलू और मटर लगाने की तैयारी चल रही है.

जागरूकता की कमी से हो रहा नुकसान
फूलो उरांइन बताती है कि खाद और बीज के लिए आज भी पूरी तरह से दुकानों पर निर्भर रहना पड़ता है. लैम्पस तो है, लेकिन कभी भी समय पर खाद और बीज वहां से नहीं मिलता है. जब भी लैम्पस जाते हैं, तो बताया जाता है कि खाद खत्म हो गया. बीज खत्म हो गयी है. इतना ही नहीं, अगर फसल उगा लिया, तो उसे बेचने के लिए मजबूरन स्थानीय व्यापारियों के पास ही जाना पड़ता है, जहां फसल का उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता है. फूलो कहती हैं कि पिछली बार भी खेत में फूलगोभी लगाये थे, लेकिन कीट व बीमारियों के कारण पूरी सब्जी ही बर्बाद हो गयी. सिर्फ उसका ही नहीं, बल्कि आस-पास के जितने भी किसानों ने दुकान से लाये बीज को लगाया था, सबकी मेहनत बेकार हुई. पैसे भी बर्बाद हो गये. फूलो कहती हैं कि दुकानदार ने जो बीज दिया था, वो ही खराब था, जिसके कारण किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था. किसानों को नुकसान तो हुआ, लेकिन वो शिकायत करें भी तो कहां करें. कीटनाशकों की भी यही स्थिति है. इलाके के किसानों में जागरूकता की कमी है, जिसके कारण दुकानदार उसका फायदा उठाते हैं. फूलो कहती हैं कि उसके खेत में लगे फूलगोभी के पौधों में कीड़े लगे थे, पर दुकानदार ने कीड़े मारने की दवा के बजाय उसे विटामिन व दूसरी दवा दे दी.