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  • Nov 2 2018 5:06PM

खतरे में तोपचांची झील का अस्तित्व

खतरे में तोपचांची झील का अस्तित्व

नितिन सिंह

प्रखंड: तोपचांची
जिला: धनबाद

धनबाद की प्यास बुझानेवाली और पर्यटकों का दिल खोलकर मनोरंजन करनेवाली तोपचांची झील को बचा लीजिए. करीब 94 साल पुरानी इस झील का अस्तित्व अनदेखी के कारण खतरे में है. ब्रिटिश जमाने में इसकी खूबसूरती सबका मन मोह लेती थी. इस झील में कमाल की इंजीनियरिंग भी की गयी है, जिसके कारण आज भी धनबादवासियों की प्यास बुझ रही है. इसके बावजूद इसकी अनदेखी से स्थानीय लोगों में नाराजगी है. तोपचांची झील प्रेमियों ने इसके पुराने दिन लौटाने का संकल्प लिया है. इसके लिए जन जागरूकता अभियान समेत कई कार्यक्रमों के आयोजन की तैयारी की जा रही है.

कभी इसकी खूबसूरती सबका मन मोहती थी
झारखंड के धनबाद जिले के तोपचांची प्रखंड में 214 एकड़ में स्थित तोपचांची झील का उद्घाटन 15 नवंबर 1924 को बिहार और ओड़िशा के तत्कालीन गवर्नर सर हेनरी व्हीलर ने किया था. ये एक कृत्रिम झील है, लेकिन जंगलों और पहाड़ियों के बीच हरे रंग की चादर ओढ़े एक आदर्श पिकनिक स्थल के रूप में स्वागत के लिए हमेशा तत्पर रहती थी. उस वक्त की खूबसूरती मनोहारी थी. इसी कारण पर्यटकों के साथ-साथ कई फिल्मकार आकर्षित हुए और कई फिल्में बनायीं. इसके उत्तर पश्चिम दिशा में पारसनाथ पहाड़ है. धनबाद रेलवे स्टेशन से 37 किलोमीटर दूर और बोकारो से 41 किलोमीटर तथा गोमो रेलवे स्टेशन से सात किलोमीटर दूर है.

कमाल की इंजीनियरिंग
ब्रिटिश राज में इलाके को सूखे से बचाने के लिए झील में कमाल की इंजीनियरिंग विकसित की गयी थी. बिना बिजली खर्च किये गुरुत्वाकर्षण तीव्रता आवेग पर आधारित पानी को साफ करने की तकनीक स्थापित की गयी थी. इसकी मदद से भूमिगत पाइप लाइन के जरिये आज भी धनबाद की प्यास बुझ रही है. झील के ऊपर से अविभाजित भारत का नक्शा देखने को मिलता है. तीन ओर से पारसनाथ पहाड़ी से यह झील घिरी हुई है. आप एक ही समय झील व पारसनाथ पहाड़ को निहारने का आनंद ले सकते हैं.

आज बुनियादी सुविधाएं भी नहीं
आजादी से पहले झील की खूबसूरती मनमोहक थी. सड़क की दोनों तरफ सलीके से फलदार और औषधीय पौधे लगाये गये थे. झील गृह था. पेवेलियन, लीची बागान के पास झील में रिसोर्ट, कर्मचारियों व अधिकारियों के लिए रहने की व्यवस्था समेत अन्य सुविधाएं थीं. पर्यटकों का आवागमन लगा रहता था. सत्तर अस्सी के दशक तक अपनी मोहक छवि से यह सबको लुभाती रही, लेकिन वक्त के साथ अनदेखी से इसका आकर्षण दिनों-दिन कमता चला गया. आज खान-पान, पेयजल और ठहरने की व्यवस्था भी नहीं है. एक अदद शौचालय नहीं है. ऐसे में महिला पर्यटकों को काफी दिक्कत होती है.

झील के दिन बहुरने का इंतजार
नक्सलियों की दहशत पहले की तरह तो नहीं है, लेकिन छेड़खानी और छिनतई की घटनाओं ने इसकी छवि धूमिल की है. झील की देख-रेख करने वाली संस्था झामाडा की हालत खस्ती है. लिहाजा कर्मचारियों को भी इसके दिन बहुरने का इंतजार है.