gram savraj

  • Aug 2 2018 4:13PM

भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी की धुन पर बीहड़ में भी उमड़ती है भीड़

भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी की धुन पर बीहड़ में भी उमड़ती है भीड़

मो असगर खान 

गांव : हेसो

पंचायत : लाली
प्रखंड : नामकुम
जिला : रांची

फूस की झोपड़ी. दस बाई आठ का एक कमरा और बेहद तंग ओसारा. इसी में दो पत्नी, पांच बेटे और तीन बहू के साथ वह रहते हैं. यहीं पर सांझ (शाम) होते ही बैल-बकरियों को बांध दिया जाता है. हर रोज का ये दृश्य लाली पंचायत के हेसो गांव में भुनेश्वर मुंडा के घर का है. रांची के नामकुम प्रखंड का यह गांव घने जंगलों से घिरा है और इसकी मदमस्त शाम भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी में समायी है. इनकी बांसुरी की धुन पर बीहड़ में भी भीड़ उमड़ आती है. मधुर धुन पर पशु झूमने लगते हैं, तो चिड़ियां चहचहाने लगती हैं.

पद्मश्री मुकुंद नायक भी कर चुके हैं प्रशंसा
भुनेश्वर, ठेठ और पौराणिक झारखंडी गीतों को अपनी बांसुरी में पीरो देते हैं. राग और धुन ऐसी निकालते हैं कि मानों बस झारखंडी संस्कृति के गीत ही सुन रहे हों. यही वजह है कि पद्मश्री मुकुंद नायक भी भुनेश्वर की प्रशंसा करते नहीं थकते, लेकिन 54 वर्षीय भुनेश्वर कहते हैं कि 35 सालों से गाने-बजाने के बाद भी लोग मुझे लोक कलाकार के रूप पहचान नहीं सके हैं. इन्हीं हसरतों की आस आज भी है कि कब एक लोक कलाकार के रूप में लोग उन्हें जान पायेंगे. परिवार में भुनेश्वर मुंडा की दो पत्नी, पांच बेटे और दो बेटी हैं. दो बेटी और तीन बेटे की शादी हो चुकी है. परिवार के आजीविका का मुख्य स्त्रोत मजदूरी है.

बिरसा, बांसुरी और बालिका
भारतीय संस्कृति में बांस-बांसुरी का इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना बताया जाता है. इतिहासकार कहते हैं कि बांसुरी यानी प्रेमभाव. ये एक ऐसा वाद्ययंत्र है जिसमें कई प्रेम कहानियां छुपी हैं. आदिवासी संस्कृति के जानकार और लेखक अश्विनी पंकज कहते हैं कि बांसुरी यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक हिस्सा है. पर्व-त्योहार में जनजातीय और आदिवासी गीतों की धुन पर बांसुरी की आवाज मंत्रमुग्ध कर देती है. वो भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी की धुन को भी इसी कड़ी में देखते हैं. कहते हैं कि भुनेश्वर की तरह ही कई और ग्रामीण अच्छे बांसुरी वादक हैं, लेकिन ऐसे लोग सिमटे पड़े हैं, जिन्हें खोजने और आगे बढ़ाने की जरूरत है. रांची के ही लालू शंकर, मनदखन बड़ाइक, सिसई के रामेश्वर मिंज आदि जैसे अच्छे बांसुरी वादक की स्थिति को देख कर समझा जा सकता है, जिन्हें कई गीतों की धुन पर बांसुरी बजाने में महारत हासिल है. बिरसा मुंडा और उनके आंदोलन पुस्तक में सुरेश सिंह ने लिखा है कि बिरसा मुंडा बांसुरी से कई राग और धुन निकाला करते थे. उनकी बांसुरी की आवाज में एक अजीब-सा जादू था. यही वो बात है, जो भुनेश्वर मुंडा को बिरसा मुंडा से जोड़ती है. भुनेश्वर कहते हैं कि जमुना देवी नाम की एक लड़की उनसे प्यार करती थी, लेकिन जमुना को भुनेश्वर से कहीं ज्यादा उनकी बांसुरी की धुन से प्यार था. भुनेश्वर कहते हैं कि हालांकि मेरा भी जमुना देवी से धीरे-धीरे लगाव बढ़ता गया. परिवारवालों के कहने पर 1987-88 में मैंने पहली शादी संजोती देवी से की, पर एक साल के बाद जमुना देवी से भी विवाह कर लिया.

रामदयाल मुंडा की बांसुरी ने किया प्रेरित
भुनेश्वर मुंडा बचपन से ही पर्व-त्योहार में बजनेवाले पारंपारिक गीतों में हिस्सा लिया करते थे. बात 1977 की, जब भुनेश्वर महज 10 साल के थे, तब पहली बार उन्होंने बांसुरी खरीदी और खुद से ही बजाना शुरू किया. इस बीच डॉ रामदयाल मुंडा को बांसुरी बजाते देख-सुन कर ही धीरे-धीरे उन्होंने धुन निकालना शुरू किया. वर्ष 1985 तक सरहुल, जदूर, गेना, मागे और कर्मा जैसे आदिवासी और जनजतीय गीतों की बेहतरीन धुन बांसुरी से निकालने लगे थे. कई मौके पर रामदयाल मुंडा ने उनकी बांसुरी की प्रशंसा भी की थी. गाहे-बगाहे उन्हें कार्यक्रम के लिए रांची और जमशेदपुर तक से आमंत्रण आते. रांची में सरहुल के मौके पर भुनेश्वर ने बतौर बांसुरी वादक प्रदर्शन किया, जिसकी तारीफ पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तक ने की, जबकि भुनेश्वर मुंडा बताते हैं कि हर साल बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर जमशेदपुर के कदमा में आयोजित होनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में बांसुरी बजाते हैं. इसके अलावा भुनेश्वर मुंडा केनरा पर भी इन्हीं गीतों की धुन निकाल लेते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता आलोका कहती हैं कि भुनेश्वर मुंडा के अंदर लोक गायक वाली प्रतिभा है. उन्हें आगे लाने के लिए सामाजिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए.

पहचान नहीं मिलने का आज भी है मलाल
झारखंडी लोक गायक किसी सामाजिक या सांस्कृतिक संस्था से जुड़े होते हैं. इन्हें सरकार की तरफ से बीच-बीच में सहयोग राशि या मानदेय भी दिया जाता है और इनकी पहचान लोक कलाकार के रूप में होती है. भुनेश्वर मुंडा को इसी बात का मलाल है कि 30-35 वर्षों में भी उन्हें लोक कलाकर की पहचान नहीं मिल सकी और न ही उन्हें किसी ने यह पहचान दिलाने में उनकी मदद की. मुकुंद नायक कहते हैं कि इनकी बांसुरी की आवाज गांव-कस्बों में त्योहार के मौके पर बजनेवाले पौराणिक गीत-संगीत की तरह है. वह इसी तरह बांसुरी बजाते रहें, ताकि आनेवालों दिनों में इनकी पहचान अन्य राज्यों में भी हो सके. पूरी बातचीत के दौरान मजदूरी और थोड़ा बहुत खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण करनेवाले भुनेश्वर मुंडा का चेहरा यह एहसास कराता रहा कि वो कभी-कभार शहरों में अपनी बांसुरी की धुन से लोगों का दिल जीत तो लेते हैं, लेकिन एक लोक कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि उनकी पहचान आज भी जंगलों और पहाड़ों तक ही सिमटी है.