gram savraj

  • Jan 19 2017 9:36AM

ऑनलाइन चंदे से केड़िया गांव में खुला बिहार का पहला

ऑनलाइन चंदे से केड़िया गांव में खुला बिहार का पहला
पर्व त्योहार हो या कोई बड़ा कार्यक्रम, चंदे लेने की खबर हर बार मिलती है लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि किसानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से चंदा लेकर कोल्ड स्टोरेज बनाया गया हो और वो भी ऑनलाइन के माध्यम से. नहीं ना, तो चलिए हम आपको लिये चलते हैं बिहार राज्य स्थित जमुई जिले का केड़िया गांव. इस गांव में बकायदा ऑनलाइन से चंदा इकट्ठा करके 12 लाख रुपये की लागत से सोलर कोल्ड स्टोरेज लगाया गया ताकि यहां के किसान अपनी फसलों की बर्बादी से मुक्त हो सके. इसकी खासियत है कि यह हाइब्रिड टेक्नोलॉजी से विकसित किया गया है ताकि बारिश या ठंड में बिजली या डीजल से इस प्लांट को चलाया जा सके. यह सिर्फ खबर मात्र नहीं बल्कि किसानों के लिए एक प्रेरणा भी है ताकि वोभी अपने क्षेत्रों में सोलर कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था कर सके.
 
बलिराम सिंह
 
बि हार का पहला सौर शीतगृह (सोलर कोल्ड स्टोरेज) बिहार के जमुई जिला के केड़िया गांव में शुरू हुआ. केड़िया गांव के किसान पिछले दो सालों से प्राकृतिक खेती के जरिये किसानों के लिए एक उदाहरण पेश किया है. 12 लाख रुपये की लागत से इस स्टोरेज के लगने से यहां के किसानों के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो गया है. आइआइटी खड़गपुर के युवा इंजीनियरों ने इस प्लांट को विकसित किया है, जो कि सामान्य सौर शीतगृह से उन्नत है. 
 
इसे हाइब्रिड टेक्नॉलाॅजी के तहत विकसित किया गया है, ताकि बारिश अथवा सर्दियों में इस प्लांट को बिजली अथवा डीजल से चलाया जा सके. इस तकनीक में बैट्री के बजाय थर्मल प्लेट का इस्तेमाल किया गया है. इसमें सब्जी के रख-रखाव के लिए किसान को रोजाना 50 पैसे एक कैरेट (25 किलोग्राम) सामान के लिए भुगतान करना होता है. 
 
लोगों के सहयोग का प्रतीक है 
 
शीतग्रह : सौर ऊर्जा से संचालित होने के अलावा इस शीतगृह की सबसे खास बात यह है कि यह देश भर के लोगों के सहयोग का प्रतीक है. इस शीतग्रह को ऑनलाइन चंदा इकट्ठा करके स्थापित किया गया है. देश में कृषि उत्पाद का लगभग 40 फीसदी नष्ट हो जाता है क्योंकि किसानों के पास उत्पादन के भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है. लेकिन, ग्रीनपीस इंडिया ऑनलाइन क्राउडफंडिग करके केड़िया के किसानों के लिए सोलर शीतगृह लगाने में कामयाब रहा. ग्रीनपीस के इस मुहिम में बॉलीवुड से जुड़े कई हस्तियां जैसे- वहीदा रहमान, पूजा बेदी, पंकज त्रिपाठी व सलीम मर्चेंट ने वीडियो जारी कर लोगों से केड़िया के किसानों की मदद करने की अपील की थी. 
 
रासायनों के इस्तेमाल से आजादी की शुरूआत : ग्रीनपीस के कैंपैनेर इश्तियाक अहमद ने कहा कि केड़िया के किसानों के साथ एक नयी आजादी का जश्न मना रहे हैं. यह आजादी है- रसायनों के दुष्प्रभाव से, ऊंची लागत व जानलेवा कर्ज से, मौसम व बाजार की स्थितियों की अनियमितता से और औने-पौने दामों में बेचने की मजबूरी से.
 
सोलर कोल्ड स्टोरेज क्या कहते हैं किसान
 
गांव की किसान सुनीता देवी कहती हैं कि अभी तक हम व्यापक तौर पर सब्जी इसलिए नहीं उपजाते थे क्योंकि हमें इसके बर्बाद होने का डर रहता था. अब हमारे गांव में सोलर कोल्ड स्टोरेज लग गया है तो हमने अधिक सब्जी की खेती शुरू कर दी है. अब हमें ना ही सब्जी सड़ने का डर है और ना ही हमें अपने उत्पाद को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ेगा. अब तो हम भी बाजार में बेहतर कीमत आने का इंतजार कर सकते हैं.
 
पैदावार का भंडारण सुगम
 
कोल्ड स्टोरेज (शीतगृह) के खुलने से केड़िया गांव के किसान अपनी पैदावार का भंडारण आसानी से कर सकते हैं. उन्हें इन उत्पादों को बाजार में अपनी शर्तों पर बेचने का मौका मिलेगा. किसानों को आर्गेनिक उत्पादों के एवज में उचित कीमत मिल सकेगी, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा बढ़ेगी. इसके अलावा किसान अपने पारंपरिक बीजों को संरक्षित कर सकेंगे. सोलर से संचालित यह कोल्ड स्टोरेज केड़िया के किसानों द्वारा पर्यावरणीय व इकोलॉजिकल कृषि को अपनाने की कोशिश को मजबूती प्रदान करेगा. 
 
समिति बना कर आगे बढ़ रहे हैं किसान 
 
केड़िया के सभी किसानों ने जीवित माटी किसान समिति से जुड़ कर अपने गांव को बिहार सरकार की कृषि योजनाओं से जुड़ कर ही आदर्श जैविक गांव बनाने का निर्णय लिया है. मिट्टी को स्वस्थ बनाने के लिए वे अपने खेतों में वर्मी खाद, अमृत पानी, जीवामृत, घन जीवामृत, गौमूत्र और मानव मूत्र जैसे रसायन मुक्त उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं. फसलों पर लगने वाले कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए वे नीमामृत, अग्निअस्त्र, तम्बाकू के चूर्ण से बने कीट नियंत्रक दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें जिला प्रशासन का पूरा सहयोग प्राप्त हो रहा है. फिलहाल, इस तरह के प्लांट के लिए केंद्र सरकार 30 फीसदी सब्सिडी दे रही है, जबकि बिहार सरकार 15 फीसदी सब्सिडी देगी. इस तरह के प्लांट छत्तीसगढ़ के अलावा दक्षिण भारत के गांवों में लगने शुरू हो गए हैं, लेकिन उत्तर भारत में जागरूकता का अभाव है.