gram savraj

  • Jan 27 2017 8:42AM

दिव्यांगों में आत्मविश्वास बढ़ाने की पहल

दिव्यांगों में आत्मविश्वास बढ़ाने की पहल

झारखंड के दिव्यांगों को रोजगार दिलाने के उद्देश्य से रोजगार मेला का आयोजन किया गया. इसका आयोजन रांची के जिला स्कूल मैदान में 23 दिसंबर को किया गया. मेले में राज्य की 20 कंपनियों ने हिस्सा लिया, जिसमें होटल रेडिसन ब्लू, सिकिक्म मणिपाल विश्वविद्यालय (कोलकाता शाखा) आदि शामिल थे. झारखंड के अलग-अलग जिलों से दिव्यांग युवक-युवतियों ने रोजगार मेला में हिस्सा लिया. कुल 200 दिव्यांग आवेदकों ने मेले में अपना नाम सूचीबद्ध कराया. 

मेले में शिरकत कर रही कंपनियों ने अपने कंपनी के लिए उपयुक्त आवेदकों के बायो-डाटा और उनके प्रमाण पत्रों को जांच-पड़ताल कर अगली प्रक्रिया के लिए आवेदन अपने पास रख लिये. अब कंपनियां इन आवेदकों को फोन कर साक्षात्कार के लिए बुलायेगी और वहीं उन्हें नौकरी का प्रस्ताव दिया जायेगा. जेएसएलपीएस व साइट सेवर्स ने संयुक्त रूप से इस रोजगार मेला का आयोजन किया था. रोजगार मेला में शिरकत करने आये दिव्यांगों को होटल रेडिसन ब्लू की प्रतिनिधि मधुमेखा दास, अरुण तिवारी (प्रबंधक, आधार, झारखंड प्रक्षेत्र), सुदिप्तो मोहांती (क्षेत्र निदेशक, साइट सेवर्स), कुमार गौरव (सीएसआर, टाटा स्टील) ने कई गुर सिखायें. 

रोजगार सभी के लिए जरूरी : देविका

दुमका जिला के सरैयाहाट प्रखंड स्थित है मोखापर गांव. इस गांव की देविका कुमारी रोजगार मेला में शामिल होने पहली बार रांची आयी है. इनका प्रारंभिक चयन एक एनजीओ के लिए हुआ है. 

साक्षात्कार के बाद देविका का अंतिम रूप से चयन होगा. बीए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं और इन्होंने एक वर्ष का कम्प्यूटर कोर्स भी किया है. अपना योगदान कम्प्यूटर के क्षेत्र में ही देना चााहती है देविका कुमारी. देविका कहती हैं कि रोजगार सभी के लिए आवश्यक है, पर दिव्यांगों के लिए कुछ अधिक ही महत्व रखता है क्योंकि हमें समाज का एक बोझ समझा जाता है. केंद्र सरकार ने दिव्यांगों को सरकारी नौकरियों में तीन फीसदी की छूट दी है. समाज में दिव्यांग की संख्या जितनी बतायी जाती है उससे अधिक है. कई दिव्यांग घर से बाहर ही नहीं आते हैं. कहती हैं कि पहली बार रांची आयी हूं. रोजगार मेला के नाम पर जिला से बाहर निकलने और काफी कुछ जानने का मौका िमला है. यहां कितने सारे कोचिंग संस्थाएं हैं तथा पढ़ाई के लिए अच्छे निजी संस्थान भी है. दुमका में अच्छे संस्थान की कमी है. मुझे अगर रोजगार मेले के जरिये नौकरी मिलती है, तो रांची में नौकरी करना चाहूंगी. दिव्यागों के लिए रोजगार मेला का आयोजन करना अच्छा कदम है. इससे दिव्यांगों को नौकरी पाने में सहयोग मिलता है. 

मेला दिव्यांगों के लिए प्रेरक : खुर्शीद

रामगढ़ जिला के लाटी गांव से रोजगार मेला में आये 26 वर्षीय खुर्शीद आलम विद्यार्थी हैं. रांची में रहकर पढ़ाई कर रहे दोस्तों से रोजगार मेला के बारे में जानकारी मिली. खुर्शीद 10वीं तक पढ़े हैं और इन्हें उम्मीद है कि इस तरह के रोजगार मेला दिव्यांगजनों को रोजगार पाने में सहायक साबित होगा. चूंकि यह रोजगार मेला सिर्फ दिव्यांगों के लिए है, इसलिए यहां जो लोग भी रोजगार पायेंगे, वो दिव्यांगों से ही होंगे. इस कारण से यह रोजगार मेला हमारे लिए बहुत महत्व रखता है. कहते हैं कि अगर हमें रोजगार मिलता है तो हम आत्मनिर्भर बनेंगे तथा मेरे परिवार समेत समाज में यह अच्छा संदेश जायेगा कि हम दिव्यांग किसी के लिए बोझ नहीं हैं. हममें भी काम करने के अनेक गुण हैं. खुर्शीद अभी तक सिलाई का काम करते रहे हैं. इनकी इच्छा है कि योग्यता के हिसाब से अगर नौकरी मिलती है, तो अपनी काबिलियत दिखाने का अवसर मिलेगा. 

अगर मिला मौका तो उत्कृष्ट कार्य करके दिखायेंगे : सिक्की

दुमका जिला के सरैयाहाट प्रखंड के मोखापर गांव की रहने वाली हैं सिक्की कुमारी. 10वीं के बाद पढ़ाई नहीं कर सकी. आगे पढ़ाई जारी नहीं रखने का सिक्की को मलाल भी है. कहती हैं कि रोजगार मेले के माध्यम से अगर नौकरी मिल जाती है तो काम के साथ आगे की पढ़ाई भी जारी रखेंगी. मेला में कॉउंटरों पर बढ़ रही आवेदकों के भीड़ में नहीं जाना चाहती हैं सिक्की. 

कहती हैं, हम सभी दिव्यांग हैं, अगर भीड़ में कुछ दुर्घटना हो गया तो एक और परेशानी बढ़ जायेगी. जब सभी आवेदकों का नाम सूचीबद्ध होना है तो भीड़ क्यों लगायें. हम नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा? इनका यह विचार यह दर्शाता है कि सिक्की कुमारी वैचारिक तरीके से कितनी परिपक्व है. इनके बायो-डाटा को एक कंपनी ने चयन किया है. कंपनी ने इनकी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच भी की. अब आगे इनका साक्षात्कार होगा, जिसके लिए कंपनी सिक्की कुमारी को फोन पर सूचना देगी. सिक्की कुमारी कहती हैं कि अगर मुझे कंपनी में काम करने का मौका मिलता है तो मैं भी गैर दिव्यांगों की तरह कुछ करके दिखा दूंगी. 

मुझमें भी क्षमता है, बस एक अवसर की तलाश है, रोजगार मेला शायद यह अवसर हम दिव्यांगों को उपलब्ध करा रहा है. सिक्की अंत में कहती हैं कि भेदभाव से मुझ जैसे दिव्यांग का हैसला कम होता है. यह भेदभाव हमारे घर से शुरू हो जाता है. जब परिवार वाले मेरी दिव्यांगता को पिछले जन्म का पाप कहते हैं तो बहुत बुरा लगता है. कुछ काम करके आत्मनिर्भर बनना ही उनसबों को मेरी तरफ से जवाब होगा. इनके गांव में लगभग 12 लोग दिव्यांग हैं, जिनमें पांच लड़कियां हैं. सभी की स्थिति बहुत ही खराब है.सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है.