gram savraj

  • Jun 21 2017 1:30PM

नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से जगी उम्मीदें!

नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से जगी उम्मीदें!

हाल ही में केंद्र सरकार ने नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की घोषणा की है. इस नीति के जरिये सरकार ने देश में सभी नागरिकों को निश्चित, सुलभ व उचित स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है. गौरतलब है कि 15 वर्ष बाद किसी सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी किसी राष्ट्रीय नीति को धरातल पर उतारा है. इससे पूर्व 2002 में तथा उससे भी 19 वर्ष पहले वर्ष 1983 में इसी तरह की राष्ट्रीय नीति तत्कालीन केंद्रीय सरकारें लेकर आयी थीं. ग्रामीण क्षेत्रों में लचर होती स्वास्थ्य व्यवस्था तथा निजी अस्पतालों के फैलते जाल के बीच स्वास्थ्य नीति के माध्यम से प्रत्येक जरूरतमंद को उचित व सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की सरकार की प्राथमिकता सराहनीय है. बशर्तें इस नीति का उचित क्रियान्वयन हो तथा जरूरतमंदों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करायी जाएं.

सरकार चाहती है कि शिक्षा के समान ही हरेक भारतीय को स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध करायी जाएं. 

दरअसल, सरकार आमलोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की प्राप्ति का अधिकार देना चाहती है. यह भी प्रयास है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में किसी तरह का भेदभाव न हो. अक्सर यह देखा गया है कि निम्न आय वर्ग वाले परिवार से ताल्लुक रखनेवाले मरीजों के लिए अच्छे अस्पताल में इलाज करा पाना असंभव-सा लगता है. ऐसे जरूरतमंद मरीजों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने कमर कस ली है. स्वास्थ्य नीति की सारी विशेषताओं को भलीभांति लागू करने के लिए सरकार पीपीपी माॅडल (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के प्रयोग की तैयारी कर रही है, ताकि साझे रूप से इस विराट लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके. सरकारी अस्पतालों में अक्सर यह भी देखा जाता है कि बिस्तर की संख्या कम होने के कारण मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यह हकीकत है कि अभी देश में 1000 मरीजों पर औसतन एक भी बेड की व्यवस्था नहीं है, जबकि इस संबंध में विश्व में औसत एक हजार मरीजों पर 2.9 बेड का है. श्रीलंका में यह औसत तीन बेड, अमेरिका में 3.1, ब्रिटेन में 3.9, चीन में यह तीन बेड है. इस पिछड़ेपन को दूर करने तथा अस्पतालों में बिस्तरों की पर्याप्त व्यवस्था के लिए इस नीति के माध्यम से 1000 लोगों की जनसंख्या पर अस्पताल में कम-से-कम दो बिस्तर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है.

बीते दिनों, जिस तरह देश के विभिन्न हिस्सों से स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लोगों की मौत की खबरें सुर्खियों में रहीं. इससे यह साबित हुआ है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी करोड़ों रुपये की योजना के लागू किये जाने के बावजूद देश की एक बड़ी आबादी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है. दीना मांझी जैसे असहाय लोगों की व्यथा ने देशवासियों के हृदय को वास्तव में झकझोर दिया था. यह दुखद है कि लापरवाही बरते जाने के कारण सरकारी अस्पतालों में हर दिन लोग दम तोड़ते हैं. वहीं, दूसरी तरफ निजी अस्पताल, गरीब व बेबस मरीजों के परिवारजनों से मोटी रकम वसूलने का कोई मौका नहीं छोड़ते. कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली में खुल रहे निजी क्लिनिक और अस्पताल, वास्तव में समाज में भेदभाव का पोषण कर रहे हैं. दवा कंपनियों से गठजोड़ करने के कारण, डाॅक्टर मरीजों को जेनरिक दवाओं के प्रयोग की सलाह भी नहीं देते. स्वास्थ्य मोर्चे पर सरकार को मिलती विफलता दरअसल इंसानियत का पेशा समझे जानेवाले चिकित्सा सेवा तथा भगवान के दूसरे रूप समझे जानेवाले डॉक्टरों के व्यवसायीकरण की गिरफ्त में आने का ही नतीजा है. देश की एक बड़ी आबादी को सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रमुख भूमिका अदा करते हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को, एक तरह से भारतीय चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ कह सकते हैं. दरअसल, ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी आज भी चिकित्सा के लिए इन केंद्रों पर ही आश्रित हैं. इनकी नजदीकी उपलब्धता तथा निःशुल्क प्रकृति के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग प्राथमिक तौर पर उपचार के लिए इन केंद्रों की शरण में ही आते हैं. यहां, अगर बीमारियां ठीक नहीं होती, तब उन्हें प्रखंड के रेफरल अस्पताल और जरूरत पड़ने पर बाद में जिला चिकित्सालय भेजा जाता है. देश में सरकारी अस्पतालों की शृंखलाबद्धता बनी है, ताकि अवाम को उचित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराया जा सके.

यह स्वास्थ्य नीति इसलिए भी खास है कि इसके माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को अधिक क्षमतावान बनाने का प्रयास किया जायेगा. मसलन, आमतौर पर देखा गया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित डाॅक्टर की कमी रहती है और दवा तथा जांच मशीनों की अनुपलब्धता की वजह से जटिल बीमारियों का इलाज संभव नहीं हो पाता. इस वजह से, मरीज रेफर कर दिये जाते हैं, लेकिन सरकार की इस नीति के माध्यम से लक्ष्य है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अनेक बीमारियों की जांच की सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी. पहले, यहां सिर्फ टीकाकरण, प्रसूति-पूर्व जांच एवं अन्य छोटी समस्याओं का इलाज संभव होता था, लेकिन नीतिगत बदलाव यह है कि अब इसमें गैर-संक्रामक रोगों की जांच और कई अन्य पहलू भी शामिल होंगे. नई नीति के तहत जिला अस्पतालों के उन्नयन पर ज्यादा ध्यान होगा और पहली बार इसे अमल में लाने की रूपरेखा तैयार की जायेगी. इसके साथ ही, जिला अस्पतालों को अपग्रेड करने के लिए काम किया जायेगा.

स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए सरकार ने स्वास्थ्य नीति के माध्यम से आगामी कुछ वर्षों के लिए एक टारगेट सेट किया है. किसी लक्ष्य को दो वर्षों में पूरा करना है, तो किसी को तीन और पांच वर्षों में. शिशु मृत्यु दर को कम करना भी इन्हीं लक्ष्यों में से एक है. अभी, भारत में जन्म लेनेवाले 1000 बच्चों में से 40 की मौत हो जाती है. सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2019 तक इन मौतों की संख्या को कम कर 28 पर लाया जाये. वहीं, जन्म देनेवाली एक लाख माताओं में से 167 की मौत हो जाती है, जिसे 2020 तक 100 से भी कम करने का प्रयास किया जायेगा. इसके साथ ही 2022 तक प्रमुख रोगों की व्याप्तता तथा इसके रूझान को मापने के लिए अशक्तता समायोजित आयु वर्ष सूचकांक की निगरानी करने के साथ, साल 2025 तक पांच वर्ष तक से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर को कम करके 23 करने का लक्ष्य रखा गया है. स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. एक बच्चा जिसने जन्म लिया है, वह आगे जाकर क्या बनेगा या क्या करेगा, यह बहुत हद तक उसकी सेहत पर भी निर्भर करता है. 

समाज का भविष्य कैसा होगा, इसका निर्धारण भी किसी प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति ही निर्धारित करती है. लिहाजा, इस क्षेत्र में अधिक-से-अधिक निवेश की जरूरत है. यह अच्छी बात है कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूदा समय में हो रहे एक फीसदी के सरकारी खर्च को वर्ष 2025 तक बढ़ा कर 2.5 फीसदी करने पर विचार कर रही है. गौरतलब है कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के मामले में भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से भी पीछे है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सकल घरेलू उत्पादन का करीब पांच फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करने का मानक बनाया हुआ है. चिंताजनक यह है स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के मामले में हम निम्न आय वाले देश मसलन श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल से भी पीछे हैं. सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन में वहां की सकल घरेलू उत्पाद का तीन फीसदी खर्च स्वास्थ्य सुविधाओं पर किया जाता है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन में यह आंकड़ा क्रमशः 8.3 और 9.6 फीसदी के आसपास का है. वहीं, आबादी के अनुपात में डाॅक्टरों की संख्या के मामले में भी हम काफी पिछड़े हुए हैं. एक लाख की आबादी पर भारत में महज 80 डाॅक्टर हैं, जबकि चीन में 130 डाॅक्टर हैं. इसी तरह, नर्सें भारत में एक लाख की आबादी पर मात्र 61 हैं, जबकि चीन में यह 96 है. देश में अच्छे और प्रशिक्षित डाॅक्टर तथा नर्सें तैयार हों, इसके लिए देश में मेडिकल कॉलेज व सीटें बढ़ाये जाने की जरूरत है. अभी देश में 64,000 सीटें ही उपलब्ध हैं, जबकि देश की आबादी के लिहाज से यह करीब ढ़ाई गुणा तक ज्यादा होनी चाहिए.

स्वास्थ्य और शिक्षा, दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिस पर मानव संसाधन के विकास का भार टिका होता है. लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए किसी भी सरकार को अधिक ध्यान देने की जरूरत है. इन दोनों क्षेत्रों में जितना अधिक निवेश होगा, देश उतना ही अधिक मजबूत होगा. अब जबकि सरकार ने स्वास्थ्य नीति को मंजूरी प्रदान कर दी है, तब उम्मीद है कि जल्द ही नयी शिक्षा नीति को भी व्यवहार में लाया जायेगा. आशा तो यह भी है कि इस संबंध में न सिर्फ ठोस नीतियां ही बने, बल्कि उसका उचित कार्यान्वयन भी हो. अगर, सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो 2025 तक भारतीयों की जीवन-प्रत्याशा को 70 वर्ष करने का लक्ष्य भी हासिल कर लिया जायेगा और अंत में नयी स्वास्थ्य नीति से ढेर सारी उम्मीदें हैं. इन उम्मीदों पर तुषारापात ना हो, सरकार इसका विशेष ध्यान रखे.

(लेखक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी 

में स्नातक अंतिम वर्ष के छात्र हैं.) q

सुधीर कुमार