gram savraj

  • Jul 4 2017 1:26PM

योजनाएं अनेक, फिर भी संकट में खेत

योजनाएं अनेक, फिर भी संकट में खेत
किसानों के द्वार तक कृषि संसाधनों को पहुंचाने के उद्देश्य से पूरे राज्य में कृषि जागृति अभियान चलाया गया. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दावों के साथ-साथ किसान क्रेडिट कार्ड, बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि बनाने, किसानों के बीच बीज का वितरण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और पशुओं का वितरण किया जा रहा है. कृषि खाद-बीज का अधिकृत वितरक लैम्पस-पैक्स में बायोमैट्रिक पद्धति के माध्यम से किसानों के बीच खाद-बीज का वितरण हो रहा है. सरकार दावे-दर-दावे करती है, फिर भी आज किसान भूखे पेट सोने को विवश हैं. खेत सिकुड़ते जा रहे हैं या फसल उगना बंद-सा हो गया है. आर्थिक तंगी के कारण किसान आत्महत्या करने को भी विवश हैं. सवाल उठता है कि आखिर इतनी सरकारी योजनाओं के बावजूद खेती-किसानी पर संकट क्यों है?
 
किसानों को सरकार से नहीं मिलती है मदद 
झारखंड अलग राज्य बनने के बाद से आज तक सरकार किसानों को सही समय पर खाद एवं बीज मुहैया नहीं करा पायी है. खनिज संपदा से भरपूर होने के बावजूद यहां सरकारी तंत्र किसानों के लिए समुचित निदान नहीं निकाल पा रही है. सरकार द्वारा उठाये गये कदम से किसानों को कोई विशेष फायदा होता नहीं दिख रहा है. किसानों को सरकार की ओर से किसी भी तरह की मदद नहीं मिलती है. जो बीज किसानों के लिए खरीदी जाती है, वो भी किसानों को सही समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती है. सरकार द्वारा किसानों को मुहैया कराये जानेवाला खाद-बीज एवं कृषि यंत्र भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. कई किसानों के धान पिछले दो महीने से सरकार द्वारा खरीदी हुई है, लेकिन अभी तक उसकी राशि बैंकों में जमा नहीं की गयी है. सरकार हमेशा घोषणा करती है कि किसानों को सही समय पर खाद एवं बीज मुहैया करा दिया जायेगा, लेकिन यह महज घोषणा ही साबित हो रहा है.
 
 
 
किसानों को घोषणाएं नहीं काम चाहिए : नरेश
सवाल : कृषि युवा क्लब की स्थापना का उद्देश्य व कार्यप्रणाली बतायें. 
जवाब : कृषि युवा क्लब की स्थापना साल 2013 में हुई. इसका उद्देश्य इलाके के किसानों को उन्नत तरीके से खेती-बारी करने के बारे में जागरूक करना, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ सके. साथ ही, जो किसान पूंजी की समस्या और कृषि उपकरणों की कमी से हमेशा जूझते हैं, उन किसानों के समस्या का समाधान करना भी इस क्लब का उद्देश्य है. 10 सदस्यीय कृषि युवा क्लब भी महिलाओं की स्वयं सहायता समूह की तरह ही काम करता है. कल्ब के सदस्यों की सप्ताह में एक दिन बैठक होती है. बैठक में किसानों को बचत करने के साथ-साथ खेती-किसानी से जुड़ी समस्याओं को लेकर चर्चा भी की जाती है. क्लब से जुड़े सदस्यों को आर्थिक रूप से संबल बनाने पर भी जोर दिया जाता है.
 
सवाल : क्लब के माध्यम से किसानों को कैसे सहयोग मिलता है. 
जवाब : क्लब चार साल पुराना है. इस दौरान हर सप्ताह के बैठक में सदस्यों द्वारा जो पैसे क्लब में जमा किये गये, उसका अब तक कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है. हां, अभी बरसात का मौसम है. अगर कोई किसान फसल के लिए ऋण मागेंगे, तो उसे ऋण दिया जायेगा. क्लब के जमा जैसे से पिछले दिनों नामकुम में सीमेंट ईंट की फैक्ट्री लगाने की बात हुई थी, लेकिन यह योजना भी ठंडे बस्ते में ही चली गयी. इसके अलावा लापरवाही और अनदेखी के कारण क्लब आज अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रहा है.
 
सवाल : अपने उद्देश्यों से क्यों भटकने लगा कृषि युवा क्लब.
जवाब : क्लब की स्थापना जिस उद्देश्य से किया गया था, वो अब भटकाव की ओर जा रहा है. क्लब की ओर से आज तक किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं देना भी इसका एक कारण माना जा सकता है. पूर्व में की गयी घोषणाएं जैसे- क्लब के सदस्यों को खेती-किसानी के संदर्भ में प्रशिक्षित करना, सब्सिडी दर पर धान, गेहूं और सब्जियों के बीज दिलाना, कृषि उपकरणों का वितरण मुख्य था, जो अब सिर्फ घोषणाएं ही साबित हुई है. 
 
सवाल : अपने उद्देश्यों से भटकने की जानकारी आपलोग क्लब के संस्थापक को नहीं दिये. उनका किस तरह का सहयोग मिलता है.
जवाब : राजकिशोर महतो की पहल पर हमलोगों ने किसान क्लब की स्थापना की थी. क्लब गठन होने के बाद लगातार हम उनसे संपर्क में रहे. पूरे कार्यों की जानकारी दी. पहले तो उन्होंने जल्द ही ट्रेनिंग  देने समेत अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की बातें कही, लेकिन धीरे-धीरे उनकी सक्रियता कम होती गयी. आज की तारीख में हाल यह है कि राजकिशोर महतो से मिले हुए बहुत दिन हो गये हैं. क्लब के बारे में वो पूछते भी नहीं हैं. ऐसे में काम कहां से होगा. हमलोगों को आज तक एक क्लब भवन भी नहीं मिला, जहां पर हमलोग क्लब की बैठक कर सके. ऐसे में क्लब अपने उद्देश्यों से भटकेगा नहीं, तो और क्या होगा. 
 
सवाल : किस तरह की समस्याएं हैं और उसका कैसे निराकरण होता है. 
जवाब : क्लब बनने के बाद भले ही आज तक कोई मदद नहीं मिली हो, लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी. आज भी निरंतर बैठकें होती हैं. खेती-बारी के कार्य में व्यस्त होने के बाद भी हमलोग सप्ताह मेें एक बार एक साथ बैठते हैं और खेती-किसानी से जुड़ी विभिन्न मुद्दों की चर्चा जरूर करते हैं. इलाके में मुख्य तौर पर सिंचाई एक बड़ी समस्या है. किसानों के पास अपने खेत तो हैं, लेकिन खेतों में पानी नहीं होने की वजह से क्षेत्र के किसान मायूस हो जाते हैं. कुछ किसानों के पास छोटे-छोटे कुएं हैं, जहां से वो पटवन कर लेते हैं, पर वो नाकाफी होता है. साल 2015 में माॅनसून की बेरुखी के कारण कई किसानों की जैसे कमर ही टूट गयी थी. अगर सिंचाई की सही व्यवस्था होती, तो किसान पटवन करके धान की खेती को बचा सकते थे. इसके अलावा, खेती-किसानी से जुड़ी समस्या के समाधान की जानकारी भी इलाके के किसानों को नहीं होती है. इससे भी फसल उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है. स्थानीय जनप्रतिनिधि और कृषि मित्र, दोनों ही किसानों के बीच नहीं जाते हैं और ना ही सरकारी योजनाओं की जानकारी ही देते है. 
 
सवाल : किसानों के लिए सरकार ने कई योजनाएं चला रही है. इसका लाभ किसान कैसे उठाते हैं. 
जवाब : सरकार की जो भी योजनाएं किसानों के लिए होती और किसान जिसके बारे में जानते हैं, उन योजनाओं को लेकर किसानों का नजरिया काफी सकारात्मक होता है. किसान चाहते हैं कि उस योजना का लाभ किसानों को जरूर मिले, लेकिन अगर किसानों को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है, तो उनका मनोबल टूटता है. अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हैं. उदाहरण के तौर पर बता दूं, गांव में ही चार युवा किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये लोन के लिए आवेदन दिया था. लोन पास भी हो गया, लेकिन जब वो युवक बैंक गयें, तो बैंककर्मियों ने लोन देने से मना कर दिया. मृदा हेल्थ कार्ड की बात करे, तो गांव में किसी भी किसान के खेतों की मिट्टी की जांच आज तक नहीं हुई. किसानों ने भी इसको लेकर किसी से पूछताछ नहीं की और ना ही कोई जानकारी देने के लिए ही आया. तंग आकर किसान खुद कहते हैं, हमें घोषणाएं नहीं काम चाहिए.
 
सवाल : सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बातें कह रही है. क्या यह धरातल पर उतर पायेगा. 
जवाब : अगर इच्छाशक्ति हो, तो असंभव कुछ भी नहीं होता, लेकिन मेरा मानना है कि जब देश का किसान दो जून की रोटी के जुगत में परेशान रहता है और खेती छोड़ दूसरे जगह पर मजदूरी करने को विवश होता है, तो किसानों की आय दोगुनी कैसे हो सकती है. देश की हालत आप देख ही रहें हैं. फसल और सब्जियों के उचित दाम नहीं मिल पाने के कारण किसान आंदोलन कर रहे हैं. अपने खून-पसीने की मेहनत से उगाये गये सब्जियों को मंडियों की बजाये सड़कों पर फेंक रहे हैं, तो ऐसे में किसान कैसे समृद्ध हो पायेंगे, ये आपको भी सोचने की जरूरत है. बात अगर होंचाई गांव और सदमा पंचायत की करे, तो सरकार का यह एलान दिवा स्वपन ही लगता है, क्योंकि कागजी तौर पर भले ही यह संभव हो जाये, जमीनी तौर पर इतनी जल्दी संभव नहीं दिखता है. आप लैम्पस का ही जिक्र कर लिजिए. गांव के पास ही एक लैम्पस संचालित होता है, लेकिन अगर आप पूरे इलाके में लाभुकों की संख्या देखेंगे, तो नहीं के बराबर मिलेगा. दरअसल होता यह है कि लैम्पस में जो भी खाद और बीज किसानों के लिए आते हैं, वो या तो देरी से केंद्र में पहुंचते हैं या फिर किसानों को देरी से जानकारी मिलती है. किसानों को बीज और खाद लेने के लिए उस समय बुलाया जाता है, जब वो बीज अपने खेतों में डाल चुके होते हैं. मैंने लैम्पस में यूरिया बरबाद होते हुए देखा है. कृषि मित्र नाम के लिए बनाये गये हैं. कृषि मित्र ना कभी किसानों से मिलते हैं और ना ही कृषि युवा क्लब के सदस्यों से. ऐसी व्यवस्था के जरिये सरकार कैसे बोल रही है कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी कर देगी, जबकि सच्चाई तो यह है कि घाटे का व्यवसाय होने के कारण अब तो कई किसान खेती-किसानी छोड़ने को ही मजबूर हैं.
सवाल : जीएसटी से किसानों को कितना फायदा या नुकसान होगा. 
जवाब : जीएसटी से कीटनाशक खाद महंगे होंगे. ट्रैक्टर पर भी 12 फीसदी जीएसटी लगेगा, तो इससे किसानों को ही नुकसान होगा. सब्जियों और फसलों का उचित दाम नहीं मिल पायेगा. देखिए, जहां तक मेरी जानकारी है खाद्य वस्तुओं पर भी जीएसटी लगाया गया है.
 
 
पूरे देश में एक जुलाई से जीएसटी यानी गुड्स एवं सर्विस टैक्स लागू हो गया. व्यापारी वर्ग इसका विरोध कर रहे हैं. कई सेक्टर में इससे लाभ भी होगा और कई सेक्टर में इससे नुकसान भी. फिलहाल नफा-नुकसान की बात सभी कर रहें हैं, लेकिन झारखंड के किसान इस मुद्दे पर कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. कारण है कि जीएसटी इन किसानों के पल्ले नहीं पड़ रही और किसानों में इसको लेकर जागरूकता का अभाव देखा जा रहा. जानकार मानते हैं कि इससे किसानों पर बोझ बढ़ेगा और किसानों को इसका लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि जीएसटी लागू होने के बाद खाद पर 12 फीसदी टैक्स बढ़ेगा, कीटनाशकों पर 18 फीसदी टैक्स लगेगा और ट्रैक्टर पर 12 फीसदी टैक्स देना होगा. अगर प्रति एकड़ खेती की बात करें, तो जीएसटी के बाद प्रति एकड़ खेती में लागत 360 रुपये तक बढ़ जायेगी. बात अगर फायदे की करें, तो कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण के बाद उन पर जीएसटी लगेगा, लेकिन किसानों को उसका लाभ नहीं मिल पायेगा. अगर किसान अपने द्वारा उपजाये गेहूं को बिस्किट या ब्रेड की शक्ल में खरीदेगा, तो उसे अधिक दाम देने होंगे. यही वजह है कि मौसम विभाग की अच्छी बारिश की भविष्यवाणी के बाद भी किसानों के चेहरे पर मायूसी है. किसान इसलिए भी डरे हैं, क्योंकि उन्हें जीएसटी के बारे में सही और सटीक जानकारी देनेवाला कोई नहीं है. ओरमांझी प्रखंड के सदमा पंचायत स्थित होंचाई गांव के युवा किसान नरेश प्रजापति से पवन कुमार ने खेती-किसानी और जीएसटी से होनेवाले नफा-नुकसान के बारे में बातचीत की. नरेश युवा कृषि किसान क्लब के अध्यक्ष के साथ-साथ पंचायत स्वंयसेवक भी हैं. पेश है युवा किसान        नरेश प्रजापति से बातचीत के मुख्य अंश.