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  • Oct 25 2017 1:12PM

खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी से बढ़ रहा कुपोषण

खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी से बढ़ रहा कुपोषण

 शैलेंद्र सिन्हा

झारखंड में कुपोषित बच्चों की संख्या में लगातार वृृद्धि हो रही है. 70 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है. आदिवासी महिलाओं में तो 85 फीसदी में खून की कमी पायी गयी है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई की ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में सबसे अधिक कुपोषित महिलाएं हैं. राज्य की महिलाएं कद-काठी में कमजोर हैं. लंबाई और वजन का अनुपात 18:5 से भी कम है. राज्य में एक चौथाई से अधिक महिलाओं का वजन औसत से भी कम है. राज्य में 50,58,212 महिला कुपोषण की शिकार हैं. कुपोषण उपचार केंद्र राज्य के सभी जिलों में कार्यरत है. कुपोषण उपचार केंद्र में अधिकतर बच्चे आदिवासी व पहाड़िया जनजाति से आते हैं. 
 
गर्भवती महिलाओं से दूर होता पूरक पोषाहार : झारखंड के अधिकांश आदिवासी बच्चे कुपोषित और महिलाएं एनिमिया की शिकार हैं. झारखंड में कुपोषण की स्थिति भयावह  है. पांच वर्ष की आयु के बच्चे सर्वाधिक कुपोषण के शिकार हैं. राज्य के प्रत्येक जिले में कुपोषण उपचार केंद्र खोले गये हैं. उपचार केंद्र में बच्चों का इलाज दवा से नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से किया जाता है. केंद्र द्वारा छह माह से 72 माह के बच्चों को प्रतिदिन आठ रुपये की दर से पूरक पोषाहार दिया जा रहा है. गर्भवती महिलाओं को भी पूरक पोषक आहार दिये जा रहे हैं, लेकिन यह ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं पहुंच पा रहा है. राज्य में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा हो रहा है. गर्भावस्था के दौरान आदिवासी महिला आयरन की गोली नहीं लेती हैं. अपने स्वास्थ्य की जांच भी नहीं कराती हैं. ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत कर्मचारी के नहीं रहने से प्रसव भी गांव के दाई द्वारा ही कराया जाता है. गरीबी के कारण गर्भवती स्त्री पोषक आहार नहीं ले पाती हैं. बासी भात और स्थानीय साग ही उनके खाने का एकमात्र साधन है. आदिवासी महिलाएं दाल का प्रयोग नहीं कर पाती हैं. ग्रामीण परिवेश में रहनेवाली महिलाएं स्वास्थ्य विभाग के लाभ से वंचित रह जाती हैं. वो आज भी सदियों से चली आ रही परंपराओं को मान रही हैं, इस कारण बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं. इन रीति-रिवाजों के कारण कई बार वे अपने नवजात को खिरसा दूध भी नहीं पिलाती हैं. नवजात को समय पर स्तनपान नहीं कराने के कारण बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है. बच्चों का विकास अवरुद्ध हो जाता है और वो कुपोषण के शिकार हो जाते हैं.
 
क्या कहती है कुपोषित बच्चे की मां
कुपोषित बच्चे की मां ने बताया कि प्रसव के समय वे खाने में दाल-भात और साग लेती हैं. वो आयरन की गोली नहीं लेतीं और न ही उनका प्रसव अस्पताल में होता है. उनके बच्चे का जन्म गांव के दाई द्वारा घर में हुआ. कुपोषण उपचार केंद्र में यूनिसेफ के फार्म में माता का नाम दर्ज नहीं किया जाता, सिर्फ पिता का ही नाम दर्ज किया जाता है, जबकि एनिमिक मां का नाम लिखा जाना चाहिए.

राज्य की चार में से तीन महिलाएं एनिमिक
सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली के निदेशक डाॅ जुगल किशोर के अनुसार किसी भी पुरुष या महिला का बीएमआई यदि 19 से कम है, तो वह कुपोषण का शिकार है. बीएमआई औसत से कम होना मौत का बड़ा कारण माना जाता है. देश में हर तीन में से एक महिला एनीमिया की शिकार है. झारखंड में चार में तीन महिला एनिमिया की शिकार है. प्रसव के दौरान हर साल लगभग हजार मौत आम बात है.
 
2022 तक चलनेवाला कुपोषण मुक्त भारत अभियान शुरू
झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पानी और स्वास्थ्य विभाग की हालत लचर है. संस्थागत प्रसव कम होते हैं. अधिकतर प्रसव घर में ही होते हैं. आदिवासी परिवार बच्चों का इलाज वैद्य से जड़ी-बूटी के सहारे ही करवाते हैं. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में हैं. भारत में यूनिसेफ के प्रतिनिधि यास्मिन अली हक ने वर्ष 2022 तक चलनेवाले कुपोषण मुक्त भारत अभियान की शुरुआत की है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार पांच वर्ष की आयु तक के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में हैं. उसका बड़ा हिस्सा झारखंड में है. यूएन बाल कोष का मानना है कि आदिवासी परिवारों में परंपरानुसार रीति-रिवाजों को आज भी अपनाया जा रहा है, इस कारण बच्चों का विकास बाधित हो रहा है. केंद्र सरकार ने कुपोषण दूर करने की ठानी है. कुपोषण  की समस्या के समाधान की दिशा में गर्भवती महिला, दुग्धपान करानेवाली माता, छह वर्ष तक के बच्चों व किशोरियों को दिये जानेवाले पूरक पोषाहार की राशि बढ़ा दी गयी है, वहीं गर्भवती व धात्री महिलाओं के साथ कुपोषित बच्चों के लिए 300 दिन के पूरक पोषाहार की व्यवस्था की जानी चाहिए.