gram savraj

  • Nov 3 2017 1:26PM

गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहे संजय कच्छप

गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहे संजय कच्छप

जहां चाह, वहां राह. सचमुच समाज के लिए कुछ करने की चाहत हो, तो संसाधनों का अभाव रोड़ा नहीं बनता. चाईबासा के संजय कच्छप ने इसे साबित कर दिखाया है. वह खुद अभाव में रहे, लेकिन हमेशा गरीब-गुरबों के बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाते रहे. वह अभी जमशेदपुर कृषि उत्पादन बाजार समिति, जमशेदपुर के प्रभारी सचिव हैं, लेकिन फुर्सत मिलते ही वह जरूरतमंदों के सहयोग में जुट जाते हैं.

 संजय सरदार

संजय अपनी गाढ़ी कमाई का आधा हिस्सा बच्चों को शिक्षित करने पर ही खर्च कर देते हैं. उनकी आंखों में बस एक ही सपना है और वह है अशिक्षितों को शिक्षित करना. उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना. जरूरतमंदों को शिक्षित करने के लिए उन्हें किताबें देना उनकी आदत में शुमार है. 

चली गयी थी पिता की नौकरी

कृषि उत्पादन बाजार समिति के प्रभारी सचिव संजय कच्छप के पिता बंधु कच्छप पुलिस विभाग में कार्यरत थे, लेकिन अत्यधिक नशा करने के कारण उनकी मानसिक स्थिति खराब हो गयी, जिससे उनकी नौकरी चली गयी थी. उस समय संजय कच्छप कक्षा चार में पढ़ते थे. नौकरी जाते ही परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होनी शुरू हो गयी थी. उस वक्त उनकी मां पार्वती बड़हा ने महिला कॉलेज, चाईबासा में मजदूरी कर परिवार संभाला. बाद में पिता भी मजदूरी करने लगे. इस बीच बच्चों को पढ़ाना-लिखाना भी जारी रखा. 

साथियों का भी मिलता है सहयोग

संजय कच्छप ट्राइबल चेंबर ऑफ कॉमर्स एवं अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद से जुड़े हैं. सामाजिक कार्य में बसंत तिर्की, संजू तिर्की, संजय नीमा, राजेन कच्छप, अमरेंद्र उरांव, खुदिया खलको, तुलसी कुजूर, अनिल लकड़ा, संतोष कुमार दे एवं बिट्टू टोपो आदि का उन्हें हमेशा साथ मिलता है. इन दोनों संस्थानों को सरकार की ओर से किसी तरह की मदद नहीं मिलती है. 

अभाव के बावजूद पढ़ाना नहीं छोड़ा

इन तमाम अभावों के बावजूद मांगीलाल रूंगटा उच्च विद्यालय से संजय ने 1996 में मैट्रिक पास किया. इसके बाद जीसी जैन कॉमर्स कॉलेज से 1999 में आई कॉम और रांची विश्वविद्यालय से 2004 में बीए की पढ़ाई पूरी की. इसके पूर्व से ही उन्होंने कार्तिक उरांव इंस्टीट्यूट बना कर आसपास के ड्रॉप आउट और सरकारी विद्यालय के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था, लेकिन फंड के अभाव में यह इंस्टीट्यूट ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. बावजूद इसकके संजय ने बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा. 

चाईबासा से शुरू कुड़ुख पुस्तकालय

संजय कच्छप ने रेलवे में नौकरी करने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई जारी रखा. उन्होंने 2007 में जेपीएससी की बाजार पर्यवेक्षक की परीक्षा पास की और 2008 में नौकरी ज्वाइन कर लिया. उनकी पहली पोस्टिंग कृषि उत्पादन बाजार समिति, चाकुलिया में हुई. इसके बाद उन्होंने समाज के प्रबुद्ध लोगों से सहयोग लेकर 2008 में चाईबासा बड़ी बाजार के पुलहातु में कुड़ुख पुस्तकालय की स्थापना की. यहां बच्चों को ग्रुप स्टडी का एक सुनहरा मौका दिया. इतना ही नहीं, प्रतियोगिता परीक्षा के लिए पुस्तक की व्यवस्था की. सीखने के लिए कंप्यूटर दिया. यहां आज भी बच्चे पढ़ते हैं. यहीं से ग्रुप स्टडी कर कई बच्चे आज नौकरी कर रहे हैं. 

किसान मंडी की शुरुआत की

संजय वर्तमान में कृषि उत्पादन बाजार समिति के प्रभारी सचिव हैं. उन्होंने बाजार समिति परिसर में व्यापारियों के साथ-साथ किसानों के लिए भी मंडी की शुरुआत की है. उनके प्रयास से ही गांव-देहात के किसान यहां आते हैं और बाजार समिति में सीधे अपनी उपज की बिक्री करते हैं. इससे काफी संख्या में किसान जुड़ रहे हैं.

यहां पढ़े बच्चे कर रहे हैं नौकरी

वह समाज के सहयोग से चाईबासा व चक्रधरपुर में पांच जगहों पर पुस्तकालय खुलवाकर नि:शुल्क शैक्षणिक संस्थान चला रहे हैं. यहां वे विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं की पढ़ायी करवाते हैं. काम से फुर्सत मिलने पर खुद भी बच्चों को पढ़ाते हैं. सुदूर गांव-देहात में उनका सपना हकीकत में तब्दील हो रहा है. उनके शिक्षण संस्थान में पढ़ाई कर चुके दर्जनों गरीब छात्र सरकारी नौकरी कर रहे हैं. यही सफलता उन्हें सुकून देती है. 

चक्रधरपुर में खुला पांचवां पुस्तकालय

संजय के प्रयास व समाज के सहयोग से अब तक चार पुस्तकालय संचालित किये जा रहे थे. चक्रधरपुर की इंदिरा कॉलोनी में पांचवें पुस्तकालय की स्थापना की गयी. पहला कुड़ुख पुस्तकालय 2008 में चाईबासा के बड़ी बाजार स्थित पुलहातु, दूसरा आदिवासी पुस्तकालय 2013 को झिंकपानी ईचापुर, तीसरा 2016 को सदर प्रखंड, कोनपोसी, चौथा 2017 को चक्रधरपुर, सेताहासा एवं चक्रधरपुर के इंदिरा कॉलोनी में पांचवें पुस्तकालय का उदघाटन किया गया. पुस्तकालय में प्रतियोगिता परीक्षा के लिए नि:शुल्क कोचिंग की व्यवस्था है, वहीं सभी जगह नि:शुल्क कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है. यहां गरीब एवं जरूरतमंद छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं.

बच्चों को प्लेटफॉर्म मिले आगे बढ़ें, यही है तमन्ना

संजय कच्छप बताते हैं कि वह काफी अभाव में आगे बढ़े हैं. वह नशापान का भारी विरोध करते हैं, क्योंकि नशे के कारण उनके परिवार को काफी तंगहाली झेलनी पड़ी है. वह कहते हैं कि हमारी इच्छा है कि गरीब बच्चों को प्लेटफॉर्म के साथ-साथ सही मार्गदर्शन भी मिले, ताकि वे दिशाहीन नहीं हों और जीवन में आगे बढ़ सकें. इसमें समाज के अहम सहयोग की जरूरत है. 

रेलवे में मिली गुड्स गार्ड की नौकरी

2003-04 में उन्होंने गरीब आदिवासी, हरिजन एवं पिछड़े 40 छात्रों के साथ ग्रुप स्टडी शुरू किया, जहां वह खुद पढ़ाया करते थे. पढ़ाई में तेज संजय को 2004 में इस्टर्न रेलवे में गुड्स गार्ड की नौकरी मिल गयी. उनकी पोस्टिंग बंगाल में हुई, लेकिन समय-समय पर वह यहां पहुंच कर छात्रों को पढ़ाते रहते थे.