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  • Jan 31 2020 5:29PM

मुख्यमंत्री पुरस्कार पाना चाहती थीं प्रिंसिपल, स्कूल को मिल गयी राष्ट्रीय पहचान

मुख्यमंत्री पुरस्कार पाना चाहती थीं प्रिंसिपल, स्कूल को मिल गयी राष्ट्रीय पहचान
सरबरवा प्रखंड के दुलसुलमा स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय

मिथलेश झा
जिला: पलामू 

दुनिया में बदलाव लाने का सबसे बड़ा औजार है शिक्षा. शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए जरूरी है कि स्कूल में बच्चे आयें और मन लगाकर पढ़ाई करें. यह तभी संभव है, जब स्कूल में बच्चों को उनके मन लायक माहौल मिले. उन्हें नयी चीजें देखने और सीखने को मिलें. बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करनेवाले ऐसे ही दो लोगों की बदौलत झारखंड के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार पलामू के एक ग्रामीण क्षेत्र का स्कूल पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. स्वच्छता और बागवानी के क्षेत्र में स्कूल के काम की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही है. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री और नीति आयोग तक इस स्कूल की प्रभारी प्रधानाध्यापिका अनीता भेंगरा की कोशिशों की सराहना कर रहे हैं. जिला प्रशासन ने उन्हें सम्मानित किया है. इस सम्मान से स्कूल की प्रभारी प्राचार्य और शिक्षक तो खुश हैं ही, प्रशासनिक अधिकारी भी फूले नहीं समा रहे.

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स्वच्छता व समग्र शिक्षा व्यवस्था की अनूठी पहल

पलामू जिला के सतबरवा प्रखंड में स्थित इस स्कूल का नाम है उत्क्रमित मध्य विद्यालय, दुलसुलमा. इस स्कूल के पूर्व प्राचार्य मृत्युंजय कुमार पाठक ने विद्यालय में बागवानी की शुरुआत की थी. अनीता भेंगरा ने उनके कार्यों को आगे बढ़ाया. आकांक्षी जिला पलामू के सतबरवा के दुलसुलमा मिडिल स्कूल के जर्जर भवन की मरम्मत करवायी, पेयजल, स्वच्छता और समावेशी आधारभूत संरचना का बेहतरीन प्रबंधन किया गया है. देश के विकास की रूपरेखा तय करने के लिए बने थिंक टैंक नीति आयोग ने इसे जिला के उज्ज्वल भविष्य के लिए जन आंदोलन करार दिया है. नीति आयोग के मुताबिक, एक ओर जहां झारखंड के स्कूलों में न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहीं दुलसुलमा मिडिल स्कूल ने स्वच्छता और समग्र शिक्षा व्यवस्था की दिशा में अनूठी पहल की है. स्कूल ने जो पहल की है, उससे हर तबके के बच्चे लाभान्वित हुए हैं. बच्चों में स्कूल आने की इच्छा जगी है. यही बात स्कूल की प्रभारी प्राचार्य अनीता भेंगरा भी कहती हैं. उनका कहना है कि बच्चे अब देर तक स्कूल में समय बिताना चाहते हैं. इस स्कूल की कक्षाओं में हिंदी-अंग्रेजी की वर्णमालाओं को आकर्षक रंगों से लिखा गया है, ताकि बच्चे खेल-खेल में पढ़ाई कर सकें. नि:शक्त या दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय में भी विशेष इंतजाम किये गये हैं. नल से जल की व्यवस्था है. स्कूल में लाइब्रेरी है, तो निरंतर विद्युत की आपूर्ति भी सुनिश्चित की जाती है. इतना ही नहीं, स्कूल परिसर में हरियाली के लिए पेड़-पौधे भी लगाये गये हैं.

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निजी स्कूल की तर्ज पर हुआ विकसित

20 साल से इस स्कूल में सेवा दे रहीं अनीता ने अपने पूर्ववर्ती प्राचार्य मृत्युंजय कुमार पाठक के प्रयासों को आगे बढ़ाया. विद्यालय को निजी स्कूल की तर्ज पर विकसित करना शुरू किया. स्वास्थ्य और स्वच्छता को प्राथमिकता दी. अंग्रेजी में पढ़ाई की शुरुआत करवायी. बच्चों के समग्र विकास के लिए कई अन्य कार्यक्रमों की शुरुआत की. इसमें समूह गान, एकल गान, चित्रकला आदि शामिल हैं. स्कूल में जब मात्र दो शिक्षक और एक सहायक शिक्षक रह गये थे, तब उन्होंने सीनियर स्टूडेंट्स की मदद से छोटे क्लास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. अनीता ने बताया कि स्कूल के सीनियर टीचर अर्पण कुमार गुप्ता, जो अब रिटायर हो चुके हैं, ने स्कूल की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर अपलोड किया. इसके बाद स्कूल चर्चा में आया.

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पूर्व प्राचार्य ने की शुरुआत, मैंने काम को आगे बढ़ाया : अनीता भेंगरा

स्कूल की प्रभारी प्राचार्य अनीता भेंगरा की इच्छा थी कि उनके स्कूल को मुख्यमंत्री पुरस्कार मिले. इसके लिए उन्होंने तैयारी शुरू कर दी. मुखिया के फंड से स्कूल को कुछ पैसे मिल गये. स्कूल के जर्जर भवन को ठीक कराया गया. रंग-रोगन में स्कूल ने कुछ अतिरिक्त खर्च किये. इससे स्कूल की खूबसूरती निखर गयी. अनीता भेंगरा कहती हैं कि वह बच्चों से यही कहती हैं कि शिक्षा से समाज में बदलाव आता है. आप जब बड़े हों, तो आपके क्षेत्र में बदलाव दिखना चाहिए. आप ही बदलाव ला सकते हैं. अभिनव प्रयोगों की वजह से स्कूल को फाइव स्टार रेटिंग मिली है. पहले 12,000 रुपये का अनुदान मिलता था. पहली बार 50,000 रुपये का अनुदान मिला. मुख्यमंत्री पुरस्कार की चाहत में स्कूल में कई बदलाव किये गये. इसकी कई स्तर पर जांच होगी और उसके बाद मुख्यमंत्री पुरस्कार के लिए स्कूल का चयन होगा. पहले ब्लॉक स्तर पर, जिला स्तर पर और फिर राज्य स्तर पर स्कूलों का चयन होगा. इससे पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल को पहचान मिल गयी है. यह हम सबके लिए गौरव की बात है.