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  • May 4 2019 4:43PM

शहनाई वादक भीखम ने विरासत को रखा है जिंदा

शहनाई वादक भीखम ने विरासत को रखा है जिंदा

अब शहनाई वादक कहां नजर आते हैं. नयी पीढ़ी सीखना भी नहीं चाहती है. अब तो लगता है कि मेरे मरने के साथ ही मेरी शहनाई की धुन भी हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी. इतना कहने के बाद भीखम लोहरा अपनी शहनाई की ओर देखने लगते हैं. वह गुमला जिले के भरनो प्रखंड अंतर्गत सीमावर्ती गांव पंडामसिया के रहनेवाले हैं. अपने आस-पास के प्रखंडों के इकलौते शहनाई वादक हैं. तुरियांबा पंचायत का यह गांव गुमला जिले का आखिरी गांव है. इस गांव से रांची जिले की सीमा शुरू होती है. आदिवासी बहुल इस गांव में पर्व-त्योहारों में अखरा में ग्रामीणों का जुटान होता है, जहां से लोककला और संस्कृति की बुनियाद पड़ती है.

विरासत में मिली परंपरा, अब आगे संभालने वाला कोई नहीं
भीखम लोहरा की शहनाई दो पीढ़ियों की गवाह है. कई दशकों तक शुभ मौकों पर अपनी धुन से लोगों को मंत्रमुग्ध किया है. सैकड़ों विवाह में शामिल हुए हैं. पहले पिता, फिर चाचा और अब भीखम इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, पर अफसोस इस बात का है कि दशकों तक शादियों में मीठी धुन बिखेरने वाली शहनाई उनके बाद हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी क्योंकि भीखम के बाद की पीढ़ी ने शहनाई से किनारा कर लिया है. समाज में हावी होती आधुनिकता, कला-संस्कृति के प्रति कम होता लगाव, अखरा से युवाओं की बन रही दूरी और शादी-विवाह जैसे आयोजनों में सिर्फ डीजे की धुन को भीखम लोहरा जिम्मेदार मानते हैं. भीखम बताते हैं कि उन्होंने 1961 से शहनाई सीखना शुरू किया था, पर 1990 से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर सबके सामने बजाना शुरू किया. भीखम बताते हैं कि उन्होंने जब शहनाई बजाना शुरू किया था, उस वक्त शहनाई बजाने के 30 रुपये मिलते थे, पर अब 2500-3000 तक मिलते हैं. शहनाई बजाने के लिए वो रांची, बोकारो, गुमला के अलावा कोलकाता व राउरकेला तक जा चुके हैं.

कई विधाओं में माहिर हैं भीखम
भीखम लोहरा सिर्फ शहनाई तक ही सीमित नहीं हैं. शहनाई के अलावा वो बांसुरी भी बजाते हैं. रोजी-रोटी के लिए हाथ के हुनर का भी इस्तेमाल करते हैं. पारंपरिक कृषि के औजार भी बनाते हैं. उनके बनाये गये हसुआ की मांग पटना और कोलकाता तक हुई. इसके अलावा वो हल भी खुद से बनाते हैं और बेचते हैं. खेती-बारी करते हैं, जिससे उनकी आजीविका चलती है. भीखम लोहरा खुद से शहनाई भी बना लेते हैं.

युवा पीढ़ी में सीखने की लगन नहीं है : भीखम लोहरा
शहनाई बजाना एक साधना की तरह है. इसे बजाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. इसे बजाने के लिए लोकगीतों की समझ भी होनी चाहिए. सुरों की समझ होनी चाहिए, पर आज की युवा पीढ़ी डीजे की दीवानी हैं. लोकगीतों से उसका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. युवाओं में आधुनिकता इस कदर हावी है कि वो अपनी लोककला को भूलते जा रहे हैं. अखरा से अब युवाओं का वास्ता नहीं है. सामाजिक आयोजनों में लोकगीतों का प्रचलन खत्म होता जा रहा है.