mehmaan panna

  • May 4 2019 4:28PM

हर किसी को भाता सरायकेला-खरसावां का छऊ नृत्य

हर किसी को भाता सरायकेला-खरसावां का छऊ नृत्य

अपनी उत्कृष्ट कला शैली के कारण सरायकेला-खरसावां जिले के ग्रामीणों के जीवन में रंग डालने वाले छऊ नृत्य ने गांव की देहरी को लांघते हुए देश-विदेश में भी अपनी विशेष पहचान बनायी है. 1930 के बाद जब देश नवजागरण का लंबा दौर पूरा कर चुका था और ब्रिटिश सरकार अपनी सांसें गिन रही थी, तब 1936 में पहली बार सरायकेला राजघराने की अगुवाई में छऊ नृत्य कला ने विदेशों में जा कर अपनी आभा बिखेरी थी.


गांधी से लेकर नेहरू तक को भाया था सरायकेला का छऊ नृत्य
छऊ की लोकप्रियता के लिए दो प्रसंगों का उल्लेख करना आवश्यक होगा कि 1937 में कोलकाता में शरत चंद्र बोस के घर पर सरायकेला राजघराने की अगुवाई में रॉयल डांस ग्रुप का कार्यक्रम आयोजित हुआ. राजघराने के कुंअर विजय प्रताप सिंहदेव, राजकुमार सुधेंद्र नारायण सिंहदेव, नाटशेखर बनबिहारी पट्टनायक ने अपनी टीम के साथ गांधी जी के सामने नृत्य प्रस्तुत किया. शहनाई वादक के रूप में मुस्लिम समुदाय के बड़े व छोटे मियां तथा ढोलक वादक के रूप में दलित समुदाय के मधु मुखी शामिल थे. दलित युवक के ढोलक की थाप पर राजकुमारों को नाचते देख महात्मा गांधी ने यहां तक कह दिया कि छऊ दिलों के साथ-साथ विभिन्न जाति व मजहब को जोड़नेवाली कला है. इस टीम द्वारा प्रस्तुत किया गया राधा-कृष्ण नृत्य गांधी जी को इतना पसंद आया कि उन्होंने दोबारा इसे देखने की इच्छा जतायी. इस नृत्य के संबंध में गांधी जी ने अपनी पहली टिप्पणी में कहा था कि नृत्य देखते वक्त ऐसी अनुभूति हो रही थी कि मानों मैं वृंदावन में हूं और मेरे सामने राधा और कृष्ण नृत्य कर रहे हों. इसका जिक्र पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुस्तक इटालियन इंडिया में भी किया गया है. दूसरा प्रसंग भारत की आजादी के बाद जब रॉयल स्कूल ऑफ छऊ के कलाकार प्रधानमंत्री आवास पर नृत्य करने पहुंचे, तो नृत्य का आनंद लेने के लिये नेहरू ने अपने प्रिय गुलाब का पौधा कटवा दिया था.

सरायकेला शैली ने दिये छह पद्मश्री
सरायकेला शैली के छऊ नृत्य कार्यक्रम देश के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ विदेशों में भी अक्सर होते रहते हैं. इस शैली ने सुधेंदु नारायण सिंहदेव, केदार नाथ साहु, श्यामा चरण पति, मंगलाचरण मोहंती, मकरध्वज दारोघा, पंडित गोपाल प्रसाद दुबे जैसे पद्मश्री से पुरस्कृत छह कलाकार दिये हैं.

पद्मश्री पानेवाले छऊ गुरु :
वर्ष                                             छऊ गुरु
1991                                 
सुधेंद्र नारायण सिंहदेव
2005                                    
केदार नाथ साहु
2006                            
श्यामा चरण पति जीवित
2009                           
मंगला चरण मोहंती जीवित
2011                                   
मकरध्वज दारोघा
2012
पं                        डित गोपाल प्रसाद दुबे जीवित

मानभूम व खरसावां शैली भी उत्कृष्ट
मानभूम शैली भी लोकप्रियता के मामले में किसी से कम नहीं है. इस शैली के कलाकारों ने भी विदेशी धरती पर अपनी सतरंगी छटा बिखेरी है. इस शैली के छऊ नृत्य ने भी नेपाल महतो, भंगीर सिंह जैसे पद्मश्री से अलंकृत कलाकार दिये हैं. यहां के कलाकारों ने भी देश-विदेश में अपनी माटी की इस कला को प्रदर्शित कर जिला का नाम रौशन किया है. सरकारी प्रोत्साहन के अभाव के बावजूद खरसावां शैली के छऊ कलाकार भले ही विदेश में अब तक अपने नृत्य का प्रदर्शन न कर सके हों, लेकिन यहां के कलाकार देश के अलग-अलग हिस्सों में छऊ की सतरंगी छटा बिखेर चुके हैं.

छऊ के स्वरूप में आया बदलाव
समय के साथ-साथ छऊ के स्वरूप में भी बदलाव आया है. जानकार बताते हैं कि शुरुआत के दिनों में छऊ नृत्य में सिर्फ पौराणिक तथ्यों पर आधारित नृत्य होते थे. उस समय रामायण, महाभारत, शिव पुराण समेत अन्य पुराणों से थीम लिये जाते थे. बाद में राजघरानों के संरक्षण में जब छऊ नृत्य आगे बढ़ा, तो इसकी पोशाक में कुछ परिवर्तन आया. इसके बाद इस नृत्य में आधुनिकता का समावेश कर इसे और व्यापक बनाने का प्रयोग किया गया. छऊ में दैनिक जीवन शैली से जुड़े तथ्यों से लेकर प्रकृति को भी जोड़ा गया और प्रयोग सफल हुआ.

हर पहलू को छूता छऊ नृत्य
छऊ नृत्य में वर्तमान में कृषि पर आधारित कृषि कला, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेताजी सुभाष चंद्र बोस की चलो दिल्ली, आदिवासी परंपरा पर आधारित शिकार (सबर), कारगिल युद्ध पर आधारित ऑपरेशन कारगिल, कालिदास की अमर कृत्य मेघदूत में यक्ष-यक्षणियों के प्रेम पर आधारित नृत्य और नाभिक पर आधारित नौका नृत्य भी जोड़ा गया. लोगों ने भी इन नृत्यों को खूब सराहा और ये भी अब छऊ के हिस्सा बन चुके हैं. समय के साथ छऊ नृत्य में आये बदलाव से छऊ को एक नया आयाम मिला है.

छऊ नृत्य में महिलाओं की बढ़ी सहभागिता
सरायकेला-खरसावां जिले के विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य में महिलाओं के प्रवेश से एक ओर जहां पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती मिल रही है, वहीं दूसरी ओर इस नृत्य को नया आयाम देने का भी प्रयास किया जा रहा है. छऊ नृत्य में शुरू से ही पुरुषों का वर्चस्व रहा है. पूर्व में इस नृत्य में महिलाओं की भागीदारी नहीं थी, लेकिन अब यह नृत्य महिलाओं में भी खासा लोकप्रिय होता जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों से इस नृत्य में महिलाओं की काफी भागीदारी बढ़ी है. सरायकेला व खरसावां की महिलाएं न सिर्फ नृत्य सीख रही हैं, बल्कि मुखौटा व पोशाक बनाने का कार्य भी सीख रही हैं. छऊ नृत्य की ओर महिलाओं के झुकाव से इसकी व्यापकता और बढ़ रही है. स्थानीय महिलाओं व किशोरियों के अलावा विदेशों से भी महिलाएं इस कला को सीखने के लिए सरायकेला पहुंच रही हैं.

छऊ नृत्य की चार शैलियां
विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की चार शैलियों में महत्वपूर्ण शैली है सरायकेला व मानभूम शैली का छऊ नृत्य. इन दोनों ही शैली के छऊ नृत्यों की विशेषता मुखौटा से है. मुखौटा के बगैर इन शौलियों के छऊ नृत्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है. छऊ का मुखौटा बनाना जितना कठिन है, उसे पहन कर नृत्य करना उससे भी अधिक कठिन कार्य है. दूसरी शैली के छऊ नृत्य में नर्तक के नृत्य सहित उसके आंख, मुंह आदि की भाव-भंगिमा तथा अभिनय क्षमता को देखा जाता है. मानभूम व सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में नर्तक मुखौटे के सहारे नृत्य के चरित्र में समाहित हो कर नृत्य करता है.

प्रसन्न कुमार महापात्र ने मुखौटा बनाने की शुरुआत की थी
करीब सौ साल पहले सरायकेला के प्रसन्न कुमार महापात्र ने इस शैली के छऊ नृत्य के लिए मुखौटा तैयार किया था. सरायकेला छऊ में मुखौटा को शामिल करने के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली. सरायकेला शैली में फिलहाल दर्जनभर कलाकार मुखौटा तैयार कर रहे हैं. मुखौटा बनाने में मिट्टी को पानी में गिला कर छाना जाता है. इसके बाद इसमें कपड़ा व कागज मिलाये जाते हैं. फिर पेपरमशी को मिट्टी के ऊपर दबा कर उनकी नाक, कान, मुंह आदि को गढ़ा जाता है. इससे पहले मुखौटे के नीचे जो मिट्टी रहती है, उस मिट्टी में नृत्य के चरित्र को आकार दिया जाता है. मुखौटा सूखने के बाद इसमें रंग डाला जाता है. रंग डालते समय मुखौटों के शास्त्रीय व मार्गी रूप का भी ध्यान रखा जाता है. चरित्र के अनुरूप रंग डाला जाता है. भगवान कृष्ण के शरीर में पीतांबर रंग, मां दुर्गा का लाल, महिषासुर का हरा रंग होता है. मुखौटा की रंगाई के बाद चरित्र के अनुरूप ही मुकुट को गहना आदि से सजाया जाता है. एक मुखौटा तैयार करने में आठ से 10 दिन का समय लग जाता है. मुखौटा पर शोध करने के लिए हर वर्ष विदेशों से लोग आते हैं. मुखौटा पहनने के बाद नर्तक को सांस रोकने का अभ्यास करना पड़ता है. मुखौटा पहन कर नृत्य करने के लिए भी महीनों अभ्यास करना होता है, तभी नर्तक मुखौटा पहन कर नृत्य कर पाता है.