mehmaan panna

  • Apr 2 2019 6:30PM

सोयाबीन की पांच उन्नत किस्मों की हुई पहचान

सोयाबीन की पांच उन्नत किस्मों की हुई पहचान

पंचायतनामा डेस्क

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में सोयाबीन वैज्ञानिकों की तीन दिवसीय राष्ट्रीय समूह की बैठक हुई. इसमें उच्च प्रोटीन से युक्त तेलहनी फसल सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में चल रहे प्रयोगों के आंकलन के आधार पर अधिक उत्पादन क्षमतावाले और रोगों-कीड़ों के प्रति प्रतिरोधी या सहिष्णु पांच प्रभेदों को चिह्नित किया गया है. संबंधित क्षेत्रों के लिए वर्तमान में अनुशंसित प्रभेदों की तुलना में इन नये प्रभेदों की उत्पादन क्षमता 15 से 21 प्रतिशत अधिक है.

सोया उत्पाद को लोकप्रिय बनाने की कोशिश : डॉ वीएस भाटिया
भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के निदेशक डॉ वीएस भाटिया ने कहा कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एसएल-1104 प्रभेद को पंजाब, उत्तर प्रदेश (बुंदेलखंड क्षेत्र को छोड़कर) और दिल्ली मैदानी क्षेत्रों के लिए चिह्नित किया गया है. यह फली अंगमारी और पीला मोजेक वायरस रोगों के प्रति प्रतिरोधी है तथा इसकी उत्पादन क्षमता क्षेत्र के वर्तमान सर्वोत्तम प्रभेद से 21 प्रतिशत अधिक है.


इसी प्रकार पूर्वोत्तर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए डीएसबी-32 को चिह्नित किया गया है. इसकी उत्पादन क्षमता चेक से 17 प्रतिशत अधिक है तथा रतुआ रोग व कई कीड़ों के प्रति यह प्रतिरोधी है. मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा एवं विदर्भ क्षेत्रों के लिए एमएसीएस-1520, एएमएस-एमबी 5-18 तथा आरएससी 10-52 को चिह्नित किया गया है. देश के विभिन्न क्षेत्रों में पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए शोध प्रयोगों के आधार पर रोग एवं कीड़ों के प्रभावी प्रबंधन के लिए भी कई अनुशंसाएं की गयी हैं. किण्वित (फर्मेंटेड) सोया उत्पाद और सोया कुकीज के अर्थशास्त्र का विश्लेषण करने, इन्हें लोकप्रिय बनाने तथा ऐसा सोया प्रभेद विकसित करने की अनुशंसा की गयी, जिसके दूध में बीन की गंध न हो, ताकि इसके दूध की स्वीकार्यता बढ़ सके.

राज्य की मिट्टी व आबोहवा सोयाबीन उत्पादन के लिए अनुकूल : डॉ परविंदर कौशल
बीएयू के कुलपति डॉ परविंदर कौशल ने कहा कि देश में सोयाबीन उत्पादकता वैश्विक औसत का लगभग आधा और झारखंड में एक-चौथाई है, जबकि राज्य की मिट्टी एवं आबोहवा इसके उत्पादन के लिए काफी अनुकूल है. इसलिए राज्य के कृषि प्रसार तंत्र को इसकी गुणवत्ता और संभावना के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इसके आच्छादन क्षेत्र में विस्तार के लिए योजनाबद्ध प्रयास करना चाहिए.

सोयाबीन से कम हो सकती है कुपोषण की समस्या : डॉ डीएन सिंह
बीएयू के अनुसंधान निदेशक डॉ डीएन सिंह ने कहा कि देश में सोयाबीन उत्पादन का 90 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा पर आश्रित है, जहां कि मिट्टी अम्लीय है. सिंचाई की कमी है और मिट्टी में जैविक पदार्थ की कमी है. इसलिए उपज क्षमता से समझौता किये बिना 105-110 दिनों की परिपक्वता अवधिवाली किस्मों का विकास किया जाना चाहिए. सोयाबीन से राज्य में कुपोषण की समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है. इससे 105 प्रकार के पोषक खाद्य पदार्थ और पकवान बनते हैं.