mehmaan panna

  • Aug 19 2019 6:02PM

आरा-केरम में बह रही बदलाव की बयार

आरा-केरम में बह रही बदलाव की बयार

झारखंड बदल रहा है. गांवों में भी बदलाव की बयार महसूस की जा रही है. राज्य सरकार के प्रयास और अपने हौसलों से ग्रामीण विकास की नयी इबारत गढ़ रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में जल प्रबंधन के लिए रांची के ओरमांझी प्रखंड के आरा-केरम गांव के लोगों की सराहना की. इससे पूर्व उन्होंने जल संरक्षण के क्षेत्र में बेहतर काम करनेवाले हजारीबाग की लुपुंग पंचायत के मुखिया दिलीप कुमार रविदास की तारीफ की थी. इन दिनों जल संरक्षण को लेकर देश भर में प्रभावी प्रयास चल रहे हैं. झारखंड में भी रघुवर सरकार जल संरक्षण की दिशा में जन-जन के साथ प्रयासरत है

जल संरक्षण के प्रति जागरूकता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में 28 जुलाई 2019 को मन की बात कार्यक्रम में सभी से जल संरक्षण को लेकर जनचेतना पैदा करने की अपील की थी. सुझाव दिया कि त्योहारों पर लगनेवाले मेलों के जरिये जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलायी जाये. इस तरह के मेलों में समाज के हर वर्ग के लोग पहुंचते हैं. आजकल जल संरक्षण को लेकर देश भर में प्रभावी प्रयास चल रहे हैं. रांची का आरा-केरम गांव एक आदर्श उदाहरण है. यहां का जल प्रबंधन अनुकरणीय है. ग्रामीणों ने श्रमदान कर पहाड़ से बहते झरने को एक निश्चित दिशा देने का काम किया है. वह भी पूरी तरह देसी तकनीक से. इससे न केवल मिट्टी का कटाव और फसल की बर्बादी रुकी है, बल्कि खेतों को भी पानी मिल रहा है. ग्रामीणों का यह श्रमदान, अब पूरे गांव के लिए जीवनदान से काम नहीं है. मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने आरा-केरम की चर्चा कर ग्रामीणों के अथक प्रयासों को ग्लोबल पहचान दी है. मुख्यमंत्री रघुवर दास के अनुसार, झारखंड में जल संरक्षण जनआंदोलन का रूप ले रहा है. रांची के आरा-केरम गांव के लोगों ने पूरे देश के सामने मिसाल पेश की है. मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण के क्षेत्र में झारखंड के प्रयास को राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया.

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दो साल के भीतर मिला मुकाम
केरम गांव के ग्रामीणों ने जल संरक्षण के लिए जो पहल की है, उसने प्रधानमंत्री का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है. ओरमांझी प्रखंड चौक से चंदवे जानेवाली सड़क पर कुच्चू से पहले चार किलोमीटर अंदर जाने पर ये गांव मिलता है. रांची जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर ओरमांझी ब्लॉक की टुंडाहुली पंचायत के दो गांव आरा और केरम में 110 घर हैं, जिसमें लगभग 650 लोग रहते हैं. आरा में करीब 80 घर हैं तथा केरम में 30 घर. पहाड़ की तलहटी पर बसा केरम पूरी तरह जनजातीय (बेदिया) गांव है, वहीं आरा में महतो और कुछ अन्य जातियां हैं. आरा-केरम गांव के बीच की दूरी महज दो किमी की है. पहाड़ की तलहटी में बने मार्ग का भले ही केरम आखिरी गांव हो, लेकिन झारखंड में ये दोनों गांव पहले स्थान पर हैं. आरा-केरम झारखंड का पहला ऐसा गांव है, जो पूरी तरह से नशामुक्त गांव है. यहां की व्यवस्था, स्वच्छता और सौंदर्य देखने योग्य है. इस मामले में यह गांव शहरी क्षेत्र के वार्ड को भी मात देता है. इसी वजह से मुख्यमंत्री रघुवर दास इस आदर्श गांव की तरह दूसरे गांवों को भी विकसित करने पर जोर देते रहे हैं.

ग्रामीणों की पहल ने दिखाया असर
पहाड़ के बीच बसे आरा और केरम गांव की 10 साल पहले तक कोई पहचान कहीं नहीं थी. इस गांव में कोई सरकारी कर्मचारी तक नहीं पहुंचता था. पहले ये गांव झारखंड के अधिसंख्य गांवों की तरह ही था. ग्रामीणों का जीवन चुनौतियों से भरा हुआ था. यहां तक कि साल-दो साल पहले तक गांव के लोगों के दिन की शुरुआत शराब से होती थी. सुबह से शाम तक हड़िया या शराब पीकर कई लोग नशे में रहते थे. महिलाएं भी पीने लगी थीं. ग्रामीण लकड़ी बेच कर और मजदूरी करके जितना कमाते, उतना नशे में खर्च कर देते. गांव के हालात बहुत खराब थे. धीरे-धीरे ग्रामीणों ने छोटी सी पहल की. यह रंग लाने लगी. वक्त के साथ गांव के विकास का रंग गाढ़ा होता गया और आज गांव की फिजा ही बदल गयी है. मुस्कुराइये, आप झारखंड के नशामुक्त गांव आरा-केरम में हैं.

नशा मुक्ति का प्रतीक है आरा-केरम गांव
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने नशामुक्त गांवों को प्रोत्साहित करने की योजना बनायी. घोषणा हुई कि इस काम के लिए गांव को एक लाख रुपये तक का पारितोषिक सरकार की ओर से मिलेगा. इसका सकारात्मक असर हुआ. गांव से नशे को खत्म करने के लिए महिला समूह की दीदी और गांव के कुछ लोगों ने बैठक की. एक साल लगातार इन लोगों को समझाने के बाद गांव को नशामुक्त बनाने में सफलता मिली. आज ये दोनों गांव पूरे राज्य में नशा मुक्ति के प्रतीक बन गये हैं. वर्तमान में आरा-केरम के हालात बदल गये हैं. दोनों गांव में अच्छी खेती होती है. केरम गांव के ग्राम प्रधान रामेश्वर बेदिया के मुताबिक, हमारे गांव में एकजुटता हमेशा से थी. सिर्फ नशा की वजह से पूरे गांव का माहौल खराब था. अगस्त 2016 से नशामुक्त गांव का अभियान शुरू हुआ. शराब से दूरी बनानेवालों की संख्या लगातार बढ़ती गयी. इस काम में राज्य सरकार और विभागीय अधिकारियों का निरंतर सहयोग मिला. केरम नवंबर, 2017 में राज्य का पहला नशामुक्त गांव बना.

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ग्रामीणों ने बचत करना सीखा
गांव में पहाड़ का पानी पहाड़ में, खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में बचाने का लक्ष्य रखा गया है. गांव के पानी को बचाने के लिए सोख्ता गड्ढा बनाया गया. टुंडाहुली पंचायत के आरा गांव के ग्राम प्रधान गोपाल राम बेदिया कहते हैं कि शराबबंदी से सबसे अधिक फायदा मेहनत-मजदूरी करनेवाले ग्रामीणों को हुआ. ग्रामीणों ने बचत करना सीखा. गांव में व्यवसाय, खेती-बारी और अन्य योजनाओं को लेकर मौसम के अनुसार योजनाएं बनायी जाने लगी हैं. एक साल के भीतर गांव में बदलाव आया है. अब नियमित रूप से ग्रामीण बैठक कर फैसले लेते हैं. श्रमदान से सभी गांव की रोजाना सफाई करते हैं. पानी की कमी न हो, इसके लिए मनरेगा के तहत डोभा खोदे गये हैं. इनके चारों ओर पपीते के पेड़ लगाये गये हैं. इससे भी आमदनी हो रही है. खुले में शौच मुक्त होने से गांव में मलेरिया, हैजा जैसी बीमारी से निजात मिली है. गांव के लोगों ने मिलकर डस्टबीन लगाये हैं. गोबर से बिजली पैदा करने की योजना है. गरीबों को जोहार योजना से जोड़ कर उनके सशक्तीकरण के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं. आरा गांव में आये इस बदलाव का असर बगल के गांव केरम पर भी पड़ा है. आरा और केरम गांव में आयी जनजागरूकता और इसके लिए ग्रामीणों का मनोबल बढ़ाने को मुख्यमंत्री रघुवर दास खुद गांव में पहुंचे थे.

देसी जुगाड़ से दूर हुई पानी की कमी
हरियाली से ही खुशहाली है. आरा गांव के ग्रामीणों ने इस मंत्र को आत्मसात करना शुरू कर दिया है. गांव के पानीदार बनने के कारण सिंचाई और खेती का काम बेहतर तरीके से हो रहा है. ग्रामीण बताते हैं कि पहले झरना से पानी गिर कर नदी में जाता था और पानी बर्बाद हो जाता था, लेकिन जब से लोगों ने पहाड़ से गिरनेवाले पानी के बीच चेकडैम बनाया, उसके बाद से पानी की गति में कमी आयी है. इससे पानी को रोकते हैं और मिट्टी का कटाव भी कम होता है. लोगों ने बारिश के दिनों में बेकार बहनेवाले पानी को रोकने का एक नया तरीका अपनाया है. इस तरीके से बचाये गये पानी का इस्तेमाल रोजमर्रा के कामों में हो रहा है. गांव में भूजल स्तर भी ऊपर आने लगा है. पहाड़ की तलहटी में बसे आरा-केरम गांव में ग्रामीणों ने बहते पानी को चलना और चलते पानी को रेंगना सिखलाया है. इससे खेतों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हुए. बारिश के पानी का संचय कर भूमिगत जलस्तर में वृद्धि करने में मदद मिल रही है. ग्रामीणों के इसी प्रयास की सराहना प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में की थी. उन्होंने आरा-केरम गांव का उदाहरण पूरे देश के सामने रखते हुए गांववालों को बधाई दी थी. कहा कि यहां ग्रामीणों ने श्रमदान करके पहाड़ से गिरते झरने को संरक्षित कर एक मिसाल पेश की है. सघन पौधरोपण से जल संचयन और पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है. आरा-केरम में पहाड़ से गिरनेवाले बारिश के पानी को ग्रामीणों ने रोककर संरक्षित कर दिया. आज इस गांव के लोगों ने श्रमदान कर देसी जुगाड़ से पहाड़ से बहते झरने के पानी को एक निश्चित दिशा दी है. इससे मिट्टी का कटाव और फसल की बर्बादी रूकी है. खेतों को भी पानी मिल रहा है. ग्रामीणों का ये श्रमदान अब पूरे गांव के लिए जीवनदान साबित हो रहा है. आरा गांव के प्रधान गापोल राम बेदिया कहते हैं कि इस गांव के लोगों का उद्देश्य बहते पानी को चलना और चलते पानी को रेंगना तथा रेंगते पानी को खेत में उतारना था. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहाड़ से उतरने वाले झरने की गति बोल्डर स्ट्रक्चर से जगह-जगह पर धीमी की गयी. बोल्डर स्ट्रक्चर के अलावा गांव की परती भूमि पर ट्रेंच खोदकर पानी का संचय किया जाता है. आरा-केरम के 150 से अधिक ग्रामीणों ने तीन महीने तक श्रमदान किया. इस दौरान ग्रामीणों ने पहाड़ी के बीच जगह-जगह छोटे-बड़े पत्थरों से 700 चेकडैम बनाये. इससे बारिश के जल का ठहराव होने लगा. अब ये पानी खेतों में सिंचाई के काम आता है. इससे भूमिगत जल में वृद्धि हो रही है.