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  • Feb 1 2019 6:39PM

सामूहिक प्रयास से बाल विवाह मुक्त बनेगा झारखंड

सामूहिक प्रयास से बाल विवाह मुक्त बनेगा झारखंड

पंचायतनामा डेस्क

18 साल से पहले लड़की और 21 से पहले लड़के की शादी बाल विवाह है. यह काननून अपराध है. यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है. कई बार जागरूकता के अभाव में, तो कई बार जानबूझ कर भी चोरी-छिपे बाल विवाह किये जाते हैं. स्थानीय लोगों के सहयोग के कारण उस पर रोक नहीं लग पाता, लेकिन यह मासूम बेटियों के साथ अन्याय है. खेलने-कूदने-पढ़ने के वक्त शादी के वैसे पारिवारिक बंधन में उसे बांध दिया जाता है, जिसका उसे एहसास तक नहीं है. इसके पीछे की वजह कुछ भी हो सकती है, लेकिन उस प्यारी-सी बच्ची की जिंदगी के साथ तो खिलवाड़ ही है. इस पर हर हाल में रोक लगना चाहिए. सरकार सामूहिक प्रयास से झारखंड को बाल विवाह मुक्त प्रदेश बनाने को लेकर प्रयासरत है. इसके लिए कार्ययोजना बनाकर विभागों की जिम्मेदारी तय की गयी है

पांच जिलों में 50 फीसदी से अधिक बाल विवाह
गोड्डा, गढ़वा, देवघर, गिरिडीह, कोडरमा जिले में 50 फीसदी से अधिक बाल विवाह होते हैं. झारखंड के 12 जिले बाल विवाह से ज्यादा प्रभावित हैं. राज्य के वैसे जिले ज्यादा इसकी चपेट में हैं, जो बिहार के बॉर्डर से सटे हुए हैं. झारखंड के ग्रामीण इलाकों से बाल विवाह के मामले ज्यादा सामने आते हैं. अशिक्षा, गरीबी और दहेज को लेकर ग्रामीण जल्द से जल्द बिटिया की शादी कर देना चाहते हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री सुकन्या योजना वरदान साबित होगी. अब बेटियां बोझ नहीं बनेंगी. सरकार की प्रोत्साहन राशि से उन्हें काफी मदद मिलेगी.

बाल विवाहमुक्त झारखंड बनाना है
झारखंड में 38 फीसदी लड़कियां बालिका वधू बना दी जाती हैं. बाल विवाह के मामले में झारखंड देश में तीसरे पायदान पर है. पहले स्थान पर बिहार (42.50 फीसदी) है. दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल (40.70 फीसदी) है. एक दशक पूर्व झारखंड में करीब 63 फीसदी बाल विवाह हुआ करते थे. हालांकि, लगातार प्रयास के बाद आंकड़ो में कमी आयी है. अभी भी काफी कुछ किया जाना है. गिरिडीह और पूर्वी सिंहभूम में बाल विवाह पर रोक को लेकर चलाये गये कार्यक्रमों का असर हुआ है. लोगों में जागरूकता बढ़ी है. सबसे खास तो ये कि प्रशिक्षित बाल पत्रकार और पियर एजुकेटर के साथ प्रतिनिधियों व आम लोगों की सहभागिता से सकारात्मक असर पड़ा है.

अगली पीढ़ियां भी होती हैं प्रभावित
बाल विवाह का असर सिर्फ बच्चियों पर ही नहीं पड़ता है, बल्कि अगली पीढ़ी भी प्रभावित होती है. बच्ची की शादी होती है, तो पढ़ नहीं पाती. जल्द मां बन जाती है. इससे स्वास्थ्य प्रभावित होता है. बाल मृत्यु दर में बढ़ोतरी होती है. ऐसी माताएं घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की शिकार होती हैं. इनकी आजादी छीन जाती है. इनके बच्चे भी नहीं पढ़ पाते. आर्थिक बोझ बढ़ता है. गरीबी बढ़ती है. यह एक से दूसरी पीढ़ी तक जाती है. देश व राज्य पर इसका असर पड़ता है. राष्ट्रहित में बाल विवाह पर तत्काल रोक जरूरी है.

बाल पत्रकारों ने कई सहेलियों की बदली जिंदगी
प्रशिक्षित बाल पत्रकारों और पियर एजुकेटर के जरिये बाल विवाह पर ब्रेक लगाने की कोशिश जारी है. गिरिडीह और पूर्वी सिंहभूम जिले में साढ़े तीन हजार बाल पत्रकार हैं, जिन्होंने कई सहेलियों को बालिका वधू बनने से बचा कर उन्हें नयी जिंदगी दी है. बच्चों की जागरूकता का असर हुआ. माता-पिता और घर-समाज अब जग गया है. घर से निकली यह बदलाव की कहानी गांव-समाज की सोच बदल रही है.

पढ़ाई के बाद कीजिए विदाई
बच्चियां पढ़ेंगी, तो बाल विवाह में कमी आयेगी. पढ़ाई के बाद विदाई से हालात बदलेंगे. स्कूलों की पहुंच बच्चियों तक बढ़ानी होगी. ऐन वक्त पर शादी रोकने की बजाय उससे पहले रोक लगाने की जरूरत है. मां-पिता के साथ-साथ बिटिया जागरूक होगी. समाज सजग होता, तो बाल विवाह रुकेगा ही. हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है कि वह किसी भी कीमत पर समाज में बाल विवाह नहीं होने दे. धर्मगुरुओं, मालाकारों, टेंट मालिक समेत विवाह से जुड़ा हर व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि बाल विवाह रोकने में अहम भूमिका निभाए.