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  • Aug 20 2019 12:55PM

व्यक्ति गरीब हो सकता है, गांव नहीं: सिद्धार्थ त्रिपाठी,मनरेगा आयुक्त

व्यक्ति गरीब हो सकता है, गांव नहीं: सिद्धार्थ त्रिपाठी,मनरेगा आयुक्त

पंचायतनामा टीम  

हर गांव की अपनी ताकत है. हर गांव आदर्श हो सकता है. इसके लिए जरूरी है ग्रामीणों का आदर्श होना. एक स्वस्थ मां ही स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है. वैसे ही अपने गांव को अपनी मां समझने वाले ग्रामीण ही उसे आदर्श या समृद्ध बना सकते हैं. किसी चमत्कार या सिर्फ सरकारी फंड के भरोसे किसी गांव की तकदीर नहीं बदली जा सकती. जब तक उस गांव के ग्रामीणों की सामूहिक सहभागिता नहीं होगी, तब तक आधारभूत संरचनाओं और बुनियादी सुविधाओं पर करोड़ों खर्च के बावजूद तस्वीर नहीं बदलने वाली. रांची के ओरमांझी स्थित आरा-केरम गांव तीन साल पहले काफी पिछड़ा हुआ था. रक्षा बंधन पर्व के बहाने उस गांव में जाना हुआ. ग्रामीणों का साथ मिला और यहीं से शुरू हुई बदलाव की यात्रा

ग्रामीण ही बना सकते हैं अपने गांव को आदर्श
किसी भी गांव में बदलाव की असीम ताकत सिर्फ और सिर्फ वहां के ग्रामीणों के हाथों में है. पानी की तरह पैसे बहाने से ही अगर गांव बदल जाते, तो अब तक असंख्य गांव बदल गये होते, लेकिन दुर्भाग्य ये कि आजादी के सात दशक बाद भी खोजे नहीं मिलते आदर्श गांव. प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का गांव रालेगण सिद्धि व पोपट राव पवार का हिवरे बाजार गांव आदर्श गांव हैं. गर्व से हम इनका नाम लेते हैं.

ग्रामसभा में दिखने लगी एकजुटता
राजधानी रांची के ओरमांझी प्रखंड की टुंडाहुली पंचायत के आरा-केरम गांव की तस्वीर यकायक नहीं बदली. रातोंरात कोई चमत्कार नहीं हुआ. वर्ष 2016 से पहले ये गांव भी झारखंड के अन्य गांवों की तरह सामान्य था. काफी पिछड़ा हुआ. जंगल बचाने के लिए वन रक्षा बंधन पर्व के अवसर पर पहली बार वर्ष 2014 में इस गांव में जाना हुआ. वर्ष 2015 में भी गया. लगातार आने-जाने से ग्रामीणों के साथ घुलता-मिलता गया. धीरे-धीरे उन्हें प्रोत्साहित करता रहा. वक्त के साथ इसका असर हुआ. उन्हें मुझ पर भरोसा होने लगा. वे बताये रास्ते पर चलने लगे. ग्रामसभा में गांव की एकजुटता दिखने लगी. गांव की उन्नति पर मंथन शुरू होने लगा.

नशामुक्त गांव
शराबबंदी के लिए महिलाएं आगे आयीं. पुरुषों ने भी उन्हें साथ दिया. धीरे-धीरे ये कारवां आगे बढ़ा और लड़ाई-झगड़ा, मारपीट व आर्थिक नुकसान की जड़ शराब पर काफी मशक्कत के बाद रोक लग गयी. गांव नशामुक्त हो गया. स्वच्छता, चराइबंदी, टांगीबंदी, लोटाबंदी, नसबंदी समेत कई कार्यक्रम साथ-साथ चलाये गये. ग्रामसभा की साप्ताहिक बैठक (गुरुवार) में विकास का खाका तय होने लगा. कृषि की नयी तकनीक से खेती, सखी मंडल का गठन, वृक्षारोपण, गौपालन, बकरी पालन, डोभा व कूप निर्माण होने लगे. जैविक खेती होने लगी. नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है. इस तरह पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर आती गयी. गांव के लोगों को झारखंड के बाहर के आदर्श गांवों का भ्रमण कराया गया, जिससे वे काफी उत्साहित हुए.

श्रमदान से जल संरक्षण की मिसाल
गांव के लोगों के बीच वक्त गुजारने, उन्हें एकजुट करने और लोकशिक्षण का असर दिखा. सामूहिक विकास पर वे जोर देने लगे. कई निरक्षर महिलाएं साक्षर हो गयी हैं. टांगीबंदी व चराइबंदी के कारण जंगल लहलहा रहे हैं. श्रमदान की ताकत से गांववालों में जंगल से बहते झरने के पानी को थामने के लिए 700 चेकडैम महज दो महीने में बना दिये. 50 एकड़ में तीन हजार ट्रेंच कम बंड (टीसीबी) बना दिये. जल संरक्षण की दिशा में इस अहम पहल से अब गांव का पानी गांव में ही रहेगा. इससे खेती में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सकेगा.

नशामुक्त सिमरकुंडी
ग्रामीणों की गरीबी दूर करने के लिए वर्ष 2004 से ही गांवों में प्रयोग कर रहा था. कोडरमा जिले में वन विभाग का पदाधिकारी रहते चौराही गांव, ढाब और सिमरकुंडी गांव में कई प्रयोग किये. संताल आदिवासी गांव सिमरकुंडी तक पहुंचने के लिए रास्ता तक नहीं था. काफी मुश्किल हालात थे. एक भी कुआं नहीं था. लोग चुआं का पानी पीते थे. इस गांव को एक कुआं दिया गया. जमीनी हकीकत जानने गांव पहुंचा, तो यहीं का होकर रह गया. कुल 289 बार इस गांव में गया हूं. 42 घर और 200 की आबादी वाला ये गांव श्रमदान, स्वच्छता, शराबबंदी व टांगीबंदी के बल पर कुछ ही वर्षों में काफी बदल गया. चेतना भवन में अनाज बैंक का निर्माण हुआ. 2007 में नशामुक्त इस गांव को पूर्व सीएम मधुकोड़ा पुरस्कृत कर चुके हैं. इन गांवों में किये गये प्रयोग की सफलता है आरा-केरम. इसका असर पास के गांव टुंडाहुली में भी दिखने लगा है.