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  • Oct 31 2016 7:41AM

खेत से घर और घर से पेट का रिश्ता

खेत से घर और घर से पेट का रिश्ता
...तभी झारखंड से खत्म हो सकती है भुखमरी
खाद्य सुरक्षा तभी कारगर होगा जब उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर होंगे. सिर्फ दूसरे देशों से अनाज का आयात कर हम खाद्य सुरक्षा को फलीभूत नहीं कर सकते. राज्य बनने के बाद मोटे अनाज, दलहन, तेलहन के उत्पादन पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है और सरकार खाद्य सुरक्षा की बात करती है, यह दिखावा नहीं तो और क्या है. दूर-दराज के इलाके में सरकार और अधिकारी कभी झांक कर तो देखें कि आदिम जनजाति के लोग कैसे रहते हैं और क्या खाते हैं. सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों से उनका पेट नहीं भरेगा और ना ही खाद्य सुरक्षा जिस उद्देश्य से आया है उसका सही नतीजा सामने आयेगा. आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां के ग्रामीणों को सही अनुपात में भोजन नसीब नहीं होता. खाद्य सुरक्षा की स्थिति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के खाद्य सुरक्षा सलाहकार बलराम से समीर रंजन ने लंबी बातचीत की. बातचीत में बलराम ने राज्य की जो वस्तुस्थिति बतायी, वो वाकई में काफी चिंताजनक है. पेश है बातचीत के मुख्य अंश.
 
झारखंड जैसे राज्य में खाद्य सुरक्षा की क्या स्थिति है?
 
अनाज के उत्पादन के मामले में हमारा राज्य अन्य राज्यों की तुलना में आधा है. राज्य में सिर्फ धान और गेहूं के भरोसे खाद्य सुरक्षा नहीं हो सकता है. राज्य की मिट्टी मोटे अनाज, दलहन, तेलहन के लिए उपयुक्त है लेकिन राज्य बनने के बाद इस ओर नहीं के बराबर ध्यान दिया गया.
 
अगर अब भी सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती है तो सिर्फ जन वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्य सुरक्षा को सफल नहीं बना सकते. खाद्य सुरक्षा कानून को ही कमजोर बनाया गया जिसके कारण यह तेज रफ्तार नहीं पकड़ पायी है. सिर्फ गेहूं और चावल पर आश्रित रह कर खाद्य संप्रभुता नहीं ला सकते. राज्य के कई इलाके मोटे अनाज के लिए जाने जाते हैं. पलामू जिला भी उसमें से एक है. मोटे अनाज में मड़ुआ, कोदो, ज्वार, बाजरा जैसे अनाज अब इस राज्य से लगभग खत्म हो गया और सरकार इसके उत्पादन को बढ़ावा देने में कोई दिलचस्पी भी नहीं दिखा रही है. खाद्य सुरक्षा सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं हो सकता. इसे तीन तरीके से देखा जा सकता है, जिसमें जंगल, पशुपालन और खेतीबारी मुख्य है. आदिम जनजाति के लोग जंगल पर निर्भर थे लेकिन जंगल कम होने के कारण कंदमूल और फल-फूल से भी उन्हें हाथ धोना पड़ा. नयी योजना के तहत पशुपालन कम होने लगा और खेतीबारी भी कम होने लगी जिससे खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ा. 
 
क्या राज्य में मोटे अनाज की पैदावर नहीं होती है?
 
बिल्कुल नहीं होती है. आदिम जनजाति के लोग जिस मोटे अनाज के भरोसे जिंदा रहते थे आज नहीं रहने के कारण खाने-खाने को मोहताज हो गये हैं और सरकार भोजन उपलब्ध कराने की बातें करती है. सरकार की बातें सिर्फ दिखावा है और कुछ नहीं. सरकार और अधिकारी दूर-दराज के इलाके में जाकर देखे कि आज भी आदिम जनजाति के लोग किस तरह जीवन यापन कर रहे हैं तो हकीकत खुद ब खुद सामने आ जायेगी. दाल आयत होने वाले देश के सात पोर्ट की जिम्मेवारी अडानी समूह के पास है. ऐसे में आप सोच सकते हैं कि देश में दाल की क्या स्थिति है.
वर्तमान समय में लोगों को कितनी दाल मिल पाती है?
 
आजादी के समय लोगों को प्रति दिन प्रति व्यक्ति 60 ग्राम दाल मिलती थी. वैसे मेडिकल साइंस के मुताबिक औसतन 65 ग्राम प्रति दिन प्रति व्यक्ति की जरूरत होती है. झारखंड बनने पर यहां 30 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन पहुंच गया और वर्तमान में तो स्थिति काफी बुरी है. यहां अभी मात्र पांच ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन उपलब्ध हो पा रहा है. इसके अलावा कई ऐसे समुदाय आज भी हैं जिसे आज तक दाल नसीब ही नहीं हुआ है. 
 
ऐसी स्थिति में खाद्य सुरक्षा नाम क्यों पड़ा?
 
खाद्य सुरक्षा का नाम ही गलत रखा गया है. खाद्य सुरक्षा बहुत बड़ी बात है लेकिन झारखंड में तो यह सिर्फ मजाक बनकर रह गया है. खाद्य सुरक्षा का मतलब लोगों को पर्याप्त मात्रा में कैलोरी, प्रोटिन, कैल्शियम जैसे तत्व मिले, लेकिन स्थिति बहुत भयावह है तो इसे खाद्य सुरक्षा नहीं कहा जा सकता. खाद्य सुरक्षा को लेकर एक बड़ा सवाल हमेशा उठ रहा है कि उत्पादन के बढ़ावा लेकर जो विशेष ध्यान देना चाहिए, वो अभी भी नहीं हो रहा है. सही मायने में अगर खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करना है तो उत्पादन और वितरण पर भी ध्यान देना होगा. 
 
झारखंड में जन वितरण प्रणाली की स्थिति बतायें.
 
इसके लिए पहले यह जानना होगा कि कितने लोगों को भोजन मिल रहा है. इंडियन कौंसिल मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, एक व्यक्ति को 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है, वहीं बच्चों को 1600 कैलोरी की. अगर कामकाजी व्यक्ति की बात करें तो प्रति व्यक्ति प्रति माह 14 किलोग्राम अनाज की जरूरत होगी लेकिन वर्तमान में प्रति व्यक्ति प्रति माह मात्र पांच किलोग्राम अनाज ही मुहैया हो रही है.
 
वैसी स्थिति में अगर सिर्फ पीडीएस पर निर्भर व्यक्ति है तो भी उसे हर माह नौ किलोग्राम अनाज कम मिल रहा है. पीडीएस से सिर्फ कार्बोहाइडेड की प्राप्ति होती है. प्रोटिन तो कहीं से मिल ही नहीं रही, तो ऐसी स्थिति में पीडीएस के भरोसे खाद्य सुरक्षा कहना बेमानी होगी. वर्तमान में भुखमरी में रहकर जीने वाले लोगों की ओर ध्यान देना बहुत जरूरी है. 
 
आपने भुखमरी में रहकर जीने वालों का जिक्र किया तो इसका कैसे आकलन किया जाता है.तीन तरीके से इसका आकलन किया जाता है. पहला जन वितरण प्रणाली की स्थिति क्या है. दूसरा पीडीएस के अलावा और क्या वैकल्पिक व्यवस्था है और तीसरा प्रभावित लोगों के घरों में कितना भोजन हर दिन बन रहा है और वो कितना खाते हैं. उक्त तीनों पहलुओं पर सर्वे कर भुखमरी में रहने वालों की स्थिति जाना जाता है. 
 
हाल में गोड्डा और दुमका जिले के कुछ सुदूर गांवों का भ्रमण कर स्थिति जानने की कोशिश की तो कई भयावह स्थिति देखने को मिली. इन गांवों मेें पीडीएस के साथ आंगनबाड़ी और मिड डे मील की व्यवस्था पूरी तरह से फेल नजर आती है. भादो और आश्विन माह में सबसे ज्यादा लोग भुखमरी की स्थिति में होते हैं. पहाड़िया जनजाति के कई परिवारों का तो अभी तक कोई कार्ड ही नहीं बना है तो योजनाओं का कैसे लाभ मिल सकता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सभी आदिम जनजाति को अंत्योदय की श्रेणी में रखना है, जिसका भी पालन नहीं हो रहा है. कुछ पहाड़िया परिवारों को राशन देने की बात तो आती है लेकिन काफी कम मात्रा में दिया जा रहा है. जबकि राज्य सरकार ने भी आदिम जनजाति परिवारों को 35 किलोग्राम अनाज निःशुल्क देने की योजना चलायी. 
 
हर जिले में शिकायत निवारण पदाधिकारी हैं?
 
खाद्य सुरक्षा कानून के तहत हर जिले में एक शिकायत निवारण पदाधिकारी की नियुक्ति होनी है. झारखंड में भी शिकायत निवारण पदाधिकारी नियुक्त हैं लेकिन उक्त पदाधिकारी को ही पता नहीं होता कि खाद्य सुरक्षा के लिए शिकायत निवारण पदाधिकारी हैं. जानकारी नहीं रहने के कारण उनके पास शिकायत भी नहीं के बराबर आती है. 
 
पीडीएस में बायोमीट्रिक सिस्टम की उपयोगिता कितनी है?
 
राज्य वासियों को बायोमीट्रिक सिस्टम का तब फायदा मिलेगा जब हर जगह नेटवर्क और बिजली की उपलब्धतता हो. कई जगह से हमेशा लिंक फेल होने की शिकायतें मिलती है तो इसके लाभ पर संशय उत्पन्न होता है. सिस्टम के खराब होने की स्थिति में तत्काल बदलने की कोई व्यवस्था नहीं है. लाभुकों के अंगूठे के निशान को मशीन सही तरीके से फीड नहीं कर पा रहा है. खासकर वृद्ध, विकलांगों के लिए तो ये परेशानी का सबब है. 
 
कैश फाॅर फूड की अवधारणा क्या है और इससे कितना लाभ िमलेगा?
 
अनाज के बदले पैसे देने की अवधारणा गंभीर है. अनाज का विकल्प पैसा कभी नहीं हो सकता. सरकार का बाजार पर नियंत्रण नहीं है. सरकार अगर इस योजना के तहत लाभुक को पैसा देती है तो यह गारंटी कहां है कि लाभुक पैसा लेकर अनाज ही खरीदेगा. वो सबसे पहले परिवार की पहली जरूरतों को पूरा करेगा. फिर उसके बाद जब पैसा बचेगा तो अनाज खरीदेगा, वैसी स्थिति में यह योजना विफल साबित होगी. मेरा मानना है कि कैश मिलने से लोगों के घरों में पहले की तुलना में अब अनाज और कम हो जायेगा. 
 
खाद्य सुरक्षा को पटरी पर लाने संबंधी आपके क्या सुझाव हैं?
 
खाद्य सुरक्षा के लिए समाज को आत्मनिर्भर बनाना, खेतों में उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना, खेत से घर और घर से पेट तक के रिश्ता को सुदृढ़ बनाना, राज्य में खाद्य संप्रभुता को बढ़ाना, योजना को धरातल पर उतारने में सरकार समेत अधिकारियों में इच्छाशक्ति का होना और सबसे महत्वपूर्ण मोटे अनाज, दलहन और तेलहन के उत्पादन पर विशेष ध्यान खाद्य सुरक्षा को पटरी पर लाने के मुख्य सुझाव हैं.