ssakshtkaar

  • Dec 23 2016 8:38AM

सार्वजनिक की जगह, मनरेगा के कार्यों में देखें लापरवाही तो करें शिकायत

सार्वजनिक की जगह, मनरेगा के कार्यों में देखें लापरवाही तो करें शिकायत

व्यक्तिगत लाभ की योजनाअों पर जोर

पिछले वर्ष की योजना बनाओ अभियान के तहत सरकारी महकमा गांव-गांव, घर-घर गये तो लोगों की मांग बढ़ी. झारखंड में मनरेगा के कार्यों को देखते हुए केंद्र सरकार ने 700 लाख मानव दिवस सृजन करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. मनरेगा में सिर्फ मानव दिवस के बढ़ने से ही काम को अच्छा नहीं कहा जा सकता, बल्कि समस्याओं को दूर करने के भी सकरात्मक प्रयास होने चाहिए. पहले मनरेगा का मतलब सड़क, कुआं, चेकडैम और तालाब निर्माण को ही माना जाता था. राज्य में पहली बार मौसमी कैलेंडर के सहारे मनरेगा के तहत कार्यों का सही परिणाम आ रहा है और दूसरे राज्य भी इस मॉडल को अपनाने की बातें कह रहे हैं. इसमें मुख्य बदलाव व्यक्तिगत लाभ की योजना के तहत हुआ है. 

जहां पहले बड़ी योजनाओं के तहत सार्वजनिक लाभ की योजना पर काम होता था, वहीं अब छोटी राशि की योजनाओं पर व्यक्तिगत लाभ के तहत काम हो रहा है. इससे फायदा यह हुआ कि लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा रहा है और यही फोकस केंद्र समेत राज्य सरकार का भी है. राज्य में मनरेगा की योजनाएं, उसके क्रियान्वयन और संचालन को लेकर मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी से समीर रंजन ने विस्तार से बातचीत की.

सवाल : राज्य में मनरेगा पिछले साल नंबर वन पायदान पर था. इस वर्ष इसकी स्थिति क्या है.

जवाब : देखिये, नंबर वाली चीजों से मैं परहेज करता हूं. हो सकता है किसी एक चीज में हमलोग नंबर वन रहे हों. मनरेगा में राज्यों की उपलब्धि मापने के दो-तीन महत्वपूर्ण मानक हैं. 

कुछ में हमलोग नंबर वन हैं तो कुछ में नंबर दो, तीन और चार तक हैं, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि झारखंड में दिनों-दिन मनरेगा प्रत्येक पैमाने पर बेहतर हो रहा है. पहले सबसे महत्वपूर्ण होता है कि मनरेगा में कितने लोगों को रोजगार मिला. पिछले साल 646 लाख मानव दिवस सृजन का लक्ष्य था लेकिन हम करीब 587 लाख मानव दिवस सृजन ही हासिल कर पाये थे. इस वर्ष 700 लाख मानव दिवस सृजन के लक्ष्य के तहत वर्ष 2016 पहला वर्ष है, जहां बिंदु दर बिंदु के तहत अब तक 490 लाख मानव दिवस का सृजन हो चुका है और इस लक्ष्य को भी प्राप्त कर लिया जायेगा. झारखंड पूरे देश में अकेला ऐसा राज्य है जिसके लक्ष्य को केंद्र सरकार ने बढ़ाया है. 

सवाल : मनरेगा के तहत किन-किन योजनाओं को प्रमुखता दी जा रही है.

जवाब : मनरेगा के तहत पूर्व में कुछ खास तरह की योजनाएं चल रही थी जैसे- सड़क, कुआं, चेकडैम और तालाब. पहले मनरेगा का मतलब यही चार चीज होता था. इस बार योजना बनाओ अभियान के दौरान योजनाओं का मिश्रण अलग तरह का आया. एक तरफ 1,28,132 डोभा निर्माण का आया तो वहीं दूसरी तरफ 30-40 मॉडल भी आया. इसके अलावा मेढ़बंदी, जमीन समतलीकरण और शेड निर्माण की योजनाएं आयी लेकिन सड़क निर्माण की योजनाएं नहीं के बराबर आयी. प्रशिक्षण के कारण ऐसा बदलाव देखने को मिला है. प्रशिक्षण के दौरान हर पहलुओं पर चर्चा की गयी थी ताकि योजनाओं का गलत चयन नहीं हो सके. इस बार से मनरेगा के कार्यों के लिए मौसमी कैलेंडर पर जोर दिया गया. इसके तहत 15 जून तक जल संरक्षण के लिए डोभा का निर्माण हुआ. वहीं मॉनसून के समय पक्की योजनाओं पर ध्यान दिया गया जैसे- शेड निर्माण, आंगनबाड़ी केंद्र निर्माण, शौचालय घर निर्माण मुख्य रहा. शेड निर्माण के तहत गाय, बकरी, मुर्गी और सूकर शेड मुख्य है. 

इन सात तरह की योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसके अलावा वृक्षारोपण, 30-40 मॉडल पर जोर दिया जा रहा है. मौसमी कैलेंडर से किये जा रहे कार्यों का नतीजा भी सकारात्मक आ रहा है और अन्य राज्य भी इस मॉडल को सराह रहे हैं. वहीं बारिश की पानी को संजो कर रखने के लिए डोभा निर्माण पर विशेष जोर दिया गया. पहली बार इस मॉडल का बड़े पैमाने पर काम हुआ. इस दौरान मुख्य सचिव की निगरानी में हर दस दिन पर मॉनिटरिंग भी हो रही थी. इसके तहत लक्ष्य आधारित कार्य हुए, हालांकि कुछ जगहों पर स्थलों का चयन गलत भी हुआ. इस दौरान कई परेशानी भी आयी लेकिन परेशानियों से जूझते और हल निकालने में पूरी टीम ने तन्यमता से काम किया. एमआइएस में 70 हजार से अधिक डोभे पूर्ण दिख रहे हैं. यह सभी व्यक्तिगत लाभ की योजना है. जहां पहले सार्वजनिक लाभ की योजना थी उसे बदलकर व्यक्तिगत लाभ की योजना में परिवर्तित कर दिया गया. 

सवाल : क्या है 30-40 मॉडल.

जवाब : यह जल संरक्षण का एक खूबसूरत मॉडल है. इसकी खोज का श्रेय पुरुलिया के दीनबंधु कर्मकार को है. दीनबंधु कर्मकार अपनी बैठकों में हमेशा चर्चा करते थे कि नीचे की जमीन पर तो डोभा का निर्माण हो जाता है लेकिन टांड़ वाले क्षेत्रों में क्या हो सकता है. उन्होंने कुछ इलाके को चिन्हित किया और 30 गुना 40 के क्षेत्रफल के हिसाब से बांटते हुए नीचे के इलाके में दो गड्डों का निर्माण किया. क्षेत्र में अच्छी बारिश और बारिश की मात्रा को देखते हुए गणीतीय तरीका निकाला. जिससे बारिश की पानी को गड्डे के अलावा उसके आस-पास जमा करने में कामयाबी पायी. इसके अलावा उस गड्डे की मिट्टी से ही मेढ़बंदी भी की जाने लगी. मतलब यह हुआ कि इसके प्रयोग से ऐसा लगा मानो छोटे-छोटे घरौंदे गड्डे के रूप में बन गये हों. ग्रामीणों ने इस मॉडल को अपनाते हुए अनुपयोगी जमीन को उपयोग में लाया और आज 17 एकड़ में आम की बागवानी और पेड़ों के बीचों-बीच सब्जियां भी उगा रहे हैं.

सवाल : मनरेगा में योजनाएं घट गयी है, इसमें कितनी सच्चाई है.

जवाब : देखिये, ऐसा है कि जितनी योजनाएं गरमी में चलेगी, उतनी योजनाएं तो मॉनसून में नहीं चलेगी. मनरेगा उनके लिए है जिनको कोई काम नहीं मिलता है. राज्य में मनरेगा के तहत एक लाख दस हजार योजनाएं तक चली है, जबकि सामान्यत: एक समय में आठ से दस हजार योजनाएं ही चलती है. डोभा अभियान के दौरान पूरे राज्य में एक लाख दस हजार योजनाएं चली. मॉनसून के समय कई योजनाएं नहीं चलनी चाहिए लेकिन वो भी चली. योजनाओं को लेकर कई गड़बड़ी भी सामने आयी, तो ऐसी स्थिति में योजनाओं की संख्या कम नहीं हुई बल्कि योजनाओं की मांग ही कम हो गयी. 

सवाल : योजनाओं के चयन की क्या प्रक्रिया है.

जवाब : योजनाओं के चयन में सबसे बड़ी भूमिका ग्रामसभा की होती है. मनरेगा के तहत ग्रामसभा और टोलासभा को सबसे बड़ी ताकत मिली है. ग्रामसभा ही तय करती है कि गांवों में योजनाओं की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए. प्राथमिकता तय होने के बाद उसे पंचायत समिति के पास भेजा जाता है. पंचायत समिति से जिला समिति और फिर मुख्यालय में पहुंचता है. ग्रामसभा द्वारा तय किये गये योजनाओं को पंचायत कार्यकारिणी हटा नहीं सकते. वहीं किसी अन्य योजनाओं को जिला परिषद अगर जोड़ती है तो उन योजनाओं पर ग्रामसभा विचार करते हुए उस पर सहमति या असहमति दे सकता है. यानी योजनाओं के चयन में ग्रामसभा को ही विशेषाधिकार प्राप्त है. 

सवाल : विभाग की ओर से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के किस तरह के प्रयास हो रहे हैं.

जवाब : कार्यों को लेकर गड़बड़ियां भी हुई, शिकायतें भी मिली. भ्रष्टाचार और गड़बड़ी पाये जाने वालों पर कठोर कार्रवाई हुई और आगे भी होते रहेगी. 

इसे रोकने के लिए जांच सही पाये जाने पर आरोपी से राशि वसूलने, अगर स्थायी कर्मचारी हैं तो निलंबित करते हुए विभागीय कार्रवाई करने, अनुबंधित कर्मचारियों का अनुबंध खत्म करने और आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज भी किया जाता है. यह सब इसलिए होता है कि अन्य लोग इससे सीख ले कि सरकारी कार्य में कोई भी लूट-खसोट नहीं कर सकता है. इतना ही नहीं, अब तक एक लाख 71 हजार योजनाओं को बंद भी कर दिया गया है. इसके अलावा लाभुकों के अकाउंट पोस्ट ऑफिस से बदलकर बैंक में कर दिया गया. एक अभियान के तहत साढ़े आठ सप्ताह में 32 प्रतिशत से बढ़कर 93 प्रतिशत लाभुकों का अकाउंट बैंक में खुला. 30 हजार महिला मेट को प्रशिक्षण देकर कार्य में लगाया गया है ताकि हावी होते बिचौलियापन को पूर्णत: रोका जा सके और 30 हजार महिला मेट को प्रशिक्षण देकर कार्य में लगाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है. 

सवाल : मनरेगा संबंधित मामले की शिकायत कैसे और कहां करें.

जवाब : शिकायत दर्ज कराने के तीन-चार तरीके हैं. पहला लिखित आवेदन के तहत शिकायत भेज सकते हैं. दूसरा फोन और व्हाट्सअप के जरिये भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं. व्हाट्सअप नंबर 7369018090 पर शिकायत कर सकते हैं. इस कार्य के लिए एक व्यक्ति को व्यापक जिम्मेदारी दी गयी है. व्हाट्सअप पर आयी शिकायतों का जल्द निपटारा भी हो रहा है. इसके अलावा लाभुक अपना आवेदन प्रखंड, डीपीसी, डीडीसी को भी दे सकते हैं. मनरेगा के व्हाट्सअप के अलावा जन शिकायत केंद्र में 181 के तहत भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं. जिला स्तर पर भी जांच दल बन रहे हैं जो लाभुकों की शिकायतों को अपने स्तर से सहयोग करेगा. 

सवाल : मनरेगा के तहत जनभागीदारी और कैसे बेहतर हो, इसके लिए विभाग क्या प्रयास कर रहा है.

जवाब : विकास की जितनी भी योजनाएं हैं उसमें बदलाव लाने में मनरेगा का बहुत बड़ा योगदान है. आज के दिन जनसहभागिता से योजनाओं का चयन मनरेगा ही ने दिया. इसके अलावा सोशल ऑडिट, एमआइएस पर चीजों को देखने की प्रक्रिया भी मनरेगा ने ही दिया है. इस तरह कह सकते हैं कि मनरेगा एक तरह से प्रयोगशाला है, जहां से बहुत अच्छी चीजें निकलकर दूसरे स्थानों पर भी जा रही है. 

सवाल : सामाजिक संगठन नरेगा वॉच ने योजना ढूंढो अभियान का नारा देकर कई गड़बड़ियों को उजागर किया है, इस पर आपकी क्या राय है.

जवाब : नरेगा वॉच ने मात्र 15 प्रतिशत की गड़बड़ी बतायी है. गड़बड़ी करने वालों पर अगर जरूरत पड़ी तो जांच की जायेगी, नहीं तो ऐसे ही गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई होगी. नरेगा वॉच की टीम को चार जिलों के अलावा अन्य जिलों में भी जांच करनी चाहिए ताकि मुझे भी पता चले कि काम किस तरह का हो रहा है. वैसे हमारी टीम भी गड़बड़ी करने वालों पर पैनी निगाहें रखी हुई है और पता चलते ही उसपर कार्रवाई की जाती है.