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  • Feb 16 2017 9:41AM

डायन-अंधविश्वास से लड़ने में पंचायतें निभा सकती हैं कारगर भूमिका : डॉ लुईस मरांडी

झारखंड देश के उन राज्यों में है, जहां अंधविश्वास और ओझा-गुनी के नाम पर हर साल हत्याएं होती हैं. स्त्री, पुरुष और यहां तक कि बच्चे भी मारे जाते हैं. अलग राज्य निर्माण के बाद झारखंड में अब तक 1200 से अधिक हत्याएं डायन के नाम पर हुई हैं. सरकारी आकड़े बताते हैं कि सितंबर 2015 से मई 2016 के बीच केवल नौ माह में डायन और जादू-टोने के नाम पर 35 हत्याएं हुईं और 524 मामले दर्ज हुए. पिछले पांच वर्ष का रिकॉर्ड देखें, तो डायन के नाम पर प्रताड़ना के 3300 मामले दर्ज हुए. हालत इतनी खराब है कि मासूम बच्चे भी इसके शिकार बनाये जा रहे हैं. पिछले साल बुंडू इलाके में तीन मासूमों की जान डायन कुप्रथा के नाम पर ले ली गयी. बुंडू रांची से सटा हुआ इलाका है. इससे यह समझा जा सकता है कि सुदूर ग्रामीण इलाकों में हालत क्या होगी. यह सब इसे रोकने की सरकार की कोशिशों के बाद भी हो रहा है. 
 
झारखंड मंत्रिमंडल ने तीन जुलाई 2001 को ही ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999’ को स्वीकृति दी थी. इस कानून में डायन के नाम पर किसी को प्रताड़ित करने पर जुर्माने और कैद दोनों की सजा का प्रावधान है. हाइकोर्ट भी इस मामले में हस्तक्षेप कर चुका है. स्वयं सेवी संगठन, सरकार और अदालतें इसे लेकर संवेदनशील हैं, मगर इसके बाद भी यह कुप्रथा थम नहीं रही. राज्य सरकार ने डायन, जादू-टोना और ओझा-गुनी जैसे अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता के प्रसार के लिए चालू वित्त वर्ष में समाज कल्याण मंत्रालय को पांच करोड़ रुपये दिये गये, लेकिन यह राशि खर्च नहीं हो सकी. इन सभी सवालों को लेकर झारखंड की समाज कल्याण मंत्री 
 
डॉ लुईस मरांडी से वरिष्ठ पत्रकार आरके नीरद ने लंबी बात की. पेश है बातचीत का प्रमुख अंश.
 
सवाल : पिछले 16 सालों में झारखंड में डायन के नाम पर 1200 से अधिक हत्याएं हुई हैं. सरकार इस पर कितना चिंतित है? डायन कुप्रथा उन्मूलन के लिए आपकी सरकार क्या कर रही है‍?
 
जवाब : हमारी सरकार इसे गंभीर समस्या मानती है और उसे दूर करने के लिए कानूनी और सामाजिक स्तर पर लड़ाई लड़ने के पक्ष में है. मैं आपको बताना चाहूंगी कि डायन, ओझा और तंत्र-मंत्र को संताल परगना से ज्यादा गंभीर स्थिति छोटानागपुर की है. खास कर यहां का आदिवासी समाज इस समस्या से इस हद तक जकड़ा हुआ है कि बाहरी दुनिया के लोग सोच भी नहीं सकते. ऐसा नहीं कि यहां के पढ़े-लिखे लोग इसके विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन यह समस्या इतनी जटिल है कि हम कह सकते हैं कि राज्य और समाज के विकास में यह बड़ा बाधक है. यह समाज के लिए बड़ा अभिशाप तो है ही, सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती भी है. जहां तक मुझे समझ में आता है, आदिवासी समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इस अंधविश्वास का शिकार है. इसे खत्म करने के लिए सरकार निश्चित रूप से प्रयास कर रही है.
 
इसके लिए कानून और हमारी कई योजनाएं हैं, लेकिन इसे केवल सरकारी योजनाओं की बदौलत जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता है. सरकार यह महसूस ही नहीं कर रही, बल्कि इस बात को हम स्वीकार भी कर रहे हैं कि जब तब गांव-समाज का एक-एक व्यक्ति जागरूक नहीं होगा, तब तक इस समस्या को खत्म करने में हमें सफलता नहीं मिल सकती. हम इस बात को समाज के लोगों को भी बता रहे हैं और उनसे अपील भी कर रहे हैं कि वे आगे आएं.
 
सवाल : तो सामाजिक स्तर पर सरकार इस लड़ाई को कैसे लड़ेगी?
 
जवाब : डायन प्रथा को खत्म करने में हमारी पंचायती राज संस्थाएं सबसे कारगर साबित हो सकती है. सरकार को इनसे काफी अपेक्षाएं हैं. जिला परिषद के अध्यक्ष और पार्षद से लेकर मुखिया और वार्ड सदस्य, सभी इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि निर्वाचित होकर आये हैं कि गांव-समाज के एक-एक व्यक्ति तक पंचायती राज संस्थाओं की व्यापक पहुंंच है. मुखिया, वार्ड सदस्य तथा मांझी-परगना और मानकी मुंडा गांव में रहते हैं और पूरा समाज उनके इर्द-गिर्द रहता है. 
 
वो ऐसे लोगों की पहचान भी कर सकते हैं, जो इस अंधविश्वास के शिकार हैं और उन्हें इसके विरुद्ध जागरूक भी कर सकते हैं. उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि डायन-ओझा-गुनी यह सब कुछ होता नहीं है. हमने इन्हें भी जोड़ा है.
 
सवाल : आप कह रही हैं कि लोगों को जागरूक करने में पंचायती राज संस्थाएं आपके साथ हैं. दूसरे भी माध्यमों का सरकार इस्तमाल कर रही है. फिर भी ठोस नतीजे नहीं आ रहे. आखिर डायन और ओझा-गुनी को लेकर लोगों को जागरूक करना इतना जटिल क्यों है?
 
जवाब : दरअसल, यह समस्या स्वास्थ्य और संपत्ति से भी जुड़ी है. आमतौर पर बीमारी के मामले में लोग उसके वास्तविक कारणों की पड़ताल नहीं करते हैं. सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध होने और उन तक आसान पहुंच होने के बाद भी वे बीमारियों की अनदेखी करते हैं और जब कोई हादसा हो जाता है, तो किसी पर आरोप मढ़ देते हैं कि वह हमारे बच्चे या आदमी को खा गया या खा गयी.
 
अब यह सहज ही सोचा जा सकता है कि कोई आदमी किसी आदमी को कैसे खा सकता है, भाई? इसलिए जो हमारे अनपढ़ या इस तरह की सोच वाले लोग हैं, उन्हें उनकी सोच को बदलना एक तरह से बड़ी चुनौती है. संपत्ति विवाद में भी इस अंधविश्वास को टूल बनाया जाता है और समाज काे दिग्भ्रमित किया जाता है. बाद में जांच करने पर सच्चाई का पता चलता है. इन चुनौतियों को छोटे-छोटे समूह में चर्चा-परिचर्चा के जरिये ही हल किया जा सकता है और हम यह काम कर भी रहे हैं.
 
सवाल : आपकी सरकार बनने के बाद भी इसमें कमी नहीं आयी है. सितंबर 2015 से मई 2016 के बीच 35 
हत्याएं हुईं.
 
जवाब : मैं इस बात को स्वीकार करती हूं कि डायन के नाम पर महिलाओं और कई मामलों में बच्चों का भी उत्पीड़न और उनकी हत्याएं हुई हैं, लेकिन हम इसे कम करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं. हमारी सरकार यह मानती है कि यह हमारे राज्य की एक बड़ी समस्या है और इसे हम तब तक हल नहीं कर सकते, जब तक कि समाज जागरूक नहीं होगा और इसके खिलाफ उठ खड़े होने की ताकत उसमें नहीं आयेगी. यह अकेले सरकार के बस की बात नहीं है कि इस समस्या का वह उन्मूलन कर सके.
 
सवाल : आपके समाज कल्याण मंत्री बनने के बाद भी ऐसी घटनाएं हुई हैं. आपने क्या कदम उठाया?
 
जवाब : यह सही है कि मेरे मंत्री बनने के बाद भी ऐसी कई घटनाएं हुई हैं. सबसे बड़ी घटना मांडर में हुई थी, जहां डायन के नाम पर पांच महिलाओं की हत्या कर दी गयी थी. वह दिल दहला देने वाली घटना थी. उसके बाद हमने प्रचार-प्रसार का काम उन इलाकों में ज्यादा तेज कर दिया. हम पंपलेट, नुक्कड़ नाटक और प्रचार रथ के माध्यम से लोगों को जागरूक करने में लगे हैं, लेकिन एक समस्या यह भी है कि जिनके लिए पंपलेट जरूरी है, उन्हें पढ़ना ही नहीं आता है. ऐसे में मेन-टू-मेन बात करना जरूरी है. हम इस पर भी काम कर रहे हैं. 
 
सवाल : डायन निषेध पर कानून को लागू किये भी 15-16 साल हो गये. फिर भी डायन उत्पीड़न की घटनाएं कम नहीं हो रहीं. आंकड़ों को देखें, तो 2011 से 2015 तक औसत 40 हत्याएं हर साल हुई हैं. 2011 में 36 हत्याएं हुई थीं. 2013 में यह संख्या 47 पहुंच गयी. 2014 में 38 हत्याएं हुईं और 2015 में फिर यह संख्या 48 हो गयी. क्या इस कानून के कार्यान्वन को लेकर सरकार समीक्षा करती है?
 
जवाब : कानूनी कार्रवाई निश्चित रूप से होती है. हम अभी आपको आंकड़े नहीं दे पा रहे हैं, लेकिन जहां भी डायन उत्पीड़न का मामला पकड़ में आता है, वहां मामले दर्ज होते हैं और कार्रवाई होती है, लेकिन यह भी सच है कि इस कानून को लेकर लोगों में जो भय होना चाहिए, वह बहुत ज्यादा नहीं दिखता है. 
 
एक बात यह भी है कि इस कानून को लागू करने वाली एजेंसियों और इससे प्रभािवत होने वाले लोगों के बीच कहीं-न-कहीं गैप है. इसका परिणाम है कि समय पर ऐसी सूचनाएं नहीं मिल पातीं. इसलिए रिव्यू करने तथा इसे और भी सख्ती से लागू करने की जरूरत हम भी महसूस करते हैं. 
 
सवाल : चालू वित्त वर्ष में डायन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए आपके मंत्रालय को पांच करोड़ रुपये मिले थे. उनका कितना उपयाेग हो सका?
 
जवाब : मुझे डाटा तो ज्ञात नहीं है, लेकिन जहां तक मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, राशि खर्च हुई है. मैंने देखा है कि प्रचार गाड़ियां और रथ निकाले गये. इससे तो लगता है कि राशि का उपयोग किया गया होगा.
 
सवाल : डायन उत्पीड़न को रोकने के लिए आपके विभाग का एक्शन प्लान क्या है?
 
जवाब : दरअसल, इस मामले में हमारे विभाग की सीधी कोई बड़ी भूमिका नहीं है. सबसे बड़ा रोल पुलिस विभाग का है. जहां तक मेरी जानकारी है कि पुलिस इस मामले में संवेदनशील है. 
 
इसीलिए इतने मामले दर्ज भी हाे रहे हैं. हमारे विभाग की भूमिका लोगों को जागरूक करने में है और हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं. हमने अगले वित्त वर्ष के लिए प्रचार-प्रसार के लिए बजट की राशि भी बढ़ायी है. नेटवर्क भी हमने बढ़ाया है. सेविका, सहायिका और अब पोषण सखी की हम मदद ले रहे हैं. वाट्सअप के जरिये हम इन सभी को जोड़ कर काम कर रहे हैं. प्रचार-प्रसार को हम और आक्रामक, प्रभावी और सघन बनाने जा रहे है.