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  • Apr 22 2017 1:46PM

पंचायतों को समझें ग्रामीणों का समूह

पंचायतों को समझें ग्रामीणों का समूह

 राजधानी रांची से सटे बेड़ो प्रखंड के िनवासी हैं पद्मश्री सिमोन उरांव. अपने उत्कृष्ट कार्य के िलए पूरे क्षेत्र में ‘सिमोन बाबा’ के नाम से जाने जाते हैं. बाबा 12 गांवों के पाड़हा राजा हैं और साथ ही 51 गांवों के प्रतिनिधि भी. गांव का पानी गांव में, इस मॉडल को अपना कर सिमोन उरांव ने बेड़ो प्रखंड के बंजर पड़े तीन गांवों में हरियाली ला दी. उनके इस अथक प्रयास से सिमोन बाबा उन तमाम लोगों के लिए रोल मॉडल बने हैं, जो पानी के अभाव में किसानी छोड़ कर दूसरे राज्यों को पलायन कर जाते हैं. पहले बेड़ो प्रखंड की जामटोली, खक्सीदाग और बैरटोली में मात्र चार महीने ही लोग गांव में रहते थे. धान की कटनी होते ही ग्रामीण दोबारा यहां से पलायन कर जाते थे. कारण सिर्फ एक था, पानी का अभाव. बारिश तो होती थी, लेकिन पानी नाली-क्यारी होते हुए गांव के बाहर चला जाता था. सिमोन उरांव ने पानी को रोकने का प्रयास किया.

ग्रामीणों के सहयोग से उन्होंने जामटोली गांव में पहला बांध सन् 1961 में तैयार किया. यह बांध करीब चार एकड़ में बना है. इसकी सफलता के बाद सिमोन उरांव ने गायघाट, झरिया और देशवाली बांध तैयार किया. देशवाली बांध (25 एकड़) सबसे बड़ा बांध है. सिमोन बाबा ने सभी बांधों को एक-दूसरे से जोड़ा. बांध का पानी छोटी पक्कीनुमा नहर के सहारे समतल और पहाड़ी इलाके के खेतों तक जाता है.

इसके लिए बीच-बीच में कुएं भी बनाये गये हैं, जहां पाना को इकट्ठा कर रखा जाता है. जाड़े और बरसात में इन कूपों तक पानी तो खुद से चला जाता है, लेकिन गर्मी के दिनों में मोटर चला कर पानी पहुंचाया जाता है. इन सभी बांधों से करीब दर्जन भर गांव के खेतों में सिंचाई होती है. चारों बांधों को मिला कर 500 से ज्यादा केरोसीन, बिजली और डीजल के पंप चलाये जाते हैं. गांव में पेड़ लगवाने और जल संचयन की दिशा में अतुलनीय योगदान के लिए सिमोन उरांव को साल 2016 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है. 

विकास कार्य को तत्पर नहीं दिखते हमारे प्रतिनिधि 
पंचायती राज व्यवस्था में मुखिया-विधायक विनाश के लिए बना है. सभी पंचायतों में जब मुखिया समेत अन्य लोगों की कोई जवाबदेही तय नहीं होगी, तो विकास की रफ्तार कैसे बढ़ेगी. पंचायती राज के प्रतिनिधि वोट के जरिये आते हैं. एक बार चुन लिए जाने के बाद इनकी मनमर्जी चलती है. ये सरकार और कंपनी के आदमी हो जाते हैं. इसमें ग्रामीणों की बात गौण हो जाती है. सलाह तो दूर, उनकी बात भी नहीं सुनी जाती है. कभी-कभार औपचारिकता के नाम पर बैठकें तो करते हैं, लेकिन इसमें होता वही है, जो कंपनी और सरकार चाहती है. अगर ऐसी बात नहीं है, तो फिर गांव में सड़क निर्माण का ठेका बाहरी लोगों को कैसे मिल जाता है. हमारे खनिज का मालिक कंपनी के लोग कैसे बन जाते हैं. हमारी पंचायतों की नदियों और उसके बालू पर अधिकार बाहरी कंपनी का कैसे हो जाता है. पाड़हा व्यवस्था में यह बात नहीं थी. पाड़हा में सभी लोगों की बातें सुनी जाती थीं. गांव की संपत्ति के मालिक ग्रामीण होते थे. एक गांव की संपत्ति के उत्तराधिकारी उसी गांव के लोग होते हैं. कहते हैं कि हमारी पंचायत को देखिये. 1961 से डेढ़ हजार एकड़ में बरखा का पानी हम गांव से बाहर नहीं जाने दे रहे हैं. अपनी जामटोली पंचायत के खक्सीटोली और जामटोली गांव के जंगलों को हमने रखवाली पर दे रखा है. मजाल है कि कोई एक टहनी भी काट ले. ग्रामीण 20-20 किलो अनाज दे कर इसकी रखवाली कराते हैं. जब तक खबर नहीं होगा, प्रस्ताव पास नहीं होगा, कोई जंगल नहीं काट सकता है. लेकिन, देखिये सरकार जंगलों के विनाश पर तुली है. पोखरा-डोभा को भर कर उसमें विकास का मॉडल बना रही है. गाछ नहीं रहेगा, तो फिर पानी कहां से आयेगा. 
 
पंचायतों को गांव के संचालन का मिले जिम्मा 
पंचायत है तो सबको मिला कर चलाने की व्यवस्था होनी चाहिए. पंचायतों को गांव के संचालन का जिम्मा क्यों नहीं दे दिया जाता है. सीधी-सी बात है कि जब पंचायत को अधिकार मिल जायेगा, तो फिर कंपनी को ठेका कैसे मिलेगा. जंगल कैसे काटेंगे. खदान का लीज कैसे मिलेगा. जब खनिज, जमीन, जंगल, जल हमारे क्षेत्र में है, तो उसका लाभ हमें ही मिलना चाहिए. गांव टूटता जा रहा है. सही काम नहीं हो रहा है. पारंपरिक पाड़हा व्यवस्था समूह में रहता था. घूस, कमीशन नहीं चलता था, लेकिन अब मुखिया से लेकर जिला परिषद तक के लोग अपनी व्यवस्था में ही व्यस्त हैं. चुनाव के समय ही देख लीजिये, जीतने के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं. बाबू दफ्तरों में बैठ कर तैयार करते हैं विकास का खाका. सरकारी विभाग के पास कोई योजना सही नहीं है. मुझे पद्मश्री दे देने से क्या होता है. पद्मश्री तो किसान है. उसे कुआं चाहिए. खेतों को पानी चाहिए, लेकिन सरकार कहां देती है. सरकारी बाबू पैसों की बंदरबांट करते हैं. यही कारण है कि बेवजह की योजना बनाते हैं. 10 के काम में हजार खरचते हैं, फिर भी काम टिकाऊ नहीं होता. इस बार का डोभा ही देख लीजिए. गांव के कितने तालाब हैं, जिसे कम से कम 10-10 फीट गहराई की जरूरत है, लेकिन उसके लिए पैसा ही नहीं है. 
 
अन्न का कारखाना हैं किसान, िफर भी स्थिति बेहाल
किसान अन्न का कारखाना हैं. उनके लिए कुछ योजना नहीं हैं. सरकार कितना भी कारखाना लगा ले, लेकिन जब तक अन्नदाता की स्थिति नहीं सुधरेगी, सब कुछ बेकार है. किसान के लिए जरूरी है कि खेतों तक पानी पहुंचे. उन्हें जमीन मिले, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. जब तक किसानों की हालत नहीं सुधरेगी, देश का विकास संभव नहीं है. 
मिसाल है सिमोन उरांव की 
पाड़हा व्यवस्था 
सिमोन उरांव 1961 से 12 गांवों के पाड़हा राजा हैं और साथ ही 51 गांवों के प्रतिनिधि भी हैं. गांव के झगड़ों का निपटान वह आज भी करते हैं. हर गुरुवार को गांव के लोगों के साथ उनकी बैठकें होती हैं. गांव में जंगल बचाने, जल वितरण, तालाबों में मछली पालन सहित तमाम कामों के लिए वह लोगों को राय देते हैं. एक तालाब और बांध से सैकड़ों लोगों का रोजगार जुड़ा हुआ है. पाड़हा व्यवस्था के तहत ही मछली उत्पादन में हिस्सेदारी, जंगलों की रखवाली, पानी में हिस्सेदारी तय होती है.
 
प्रकृति से छेड़छाड़ की मिल रही है सजा
गांवों की दुर्दशा सुधारने और गांवों में हरियाली लाने के दौरान सिमोन बाबा दो बार जेल भी जा चुके हैं. जंगल की जमीन पर बांध बनाने, पेड़ काटने और लोगों को जमा करने के आरोप में पद्मश्री दो बार जेल गये. साल 1998 में उन्हें 22 दिन और दो दिनों के लिए जेल भेजा गया था. जज के सामने उन्हें जब पेश किया गया, तो सिमोन उरांव ने अपने तर्क से जज महोदय को प्रभावित कर दिया. सिमोन उरांव से जज महोदय ने जब पूछा कि जंगल की जमीन पर बांध क्यों बना दिये. सिमोन बाबा का जवाब था कि सरकार खेतों तक पानी नहीं पहुंचा सकी, तो हमने खुद यह काम कर लिया. इस तर्क के बाद उन्हें छोड़ने का आदेश दिया. वन विभाग के अधिकारियों को फटकार लगायी. सिमोन बाबा कहते हैं कि गांवों की वर्तमान स्थिति को देखकर काफी दुख भी होता है. आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां कोई योजना सही रूप में नहीं पहुंच पायी है. कहते हैं कि सुनने में तो बहुत कुछ मिलता है, लेकिन आज भी किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, ऐसा देखकर बहुत तकलीफ होती है. आकाश, जल, जंगल, जमीन को ईश्वर ने बनाया और जनता के हाथों सुपुर्द कर दिया. उसने न तो सरकार को सुपुर्द किया और न ही कंपनी को. जहां जैसे हुआ वैसे गांव बसा. जैसे आम गाछ हुआ तो अंबा टोली, महुआ तो महुआ टोली. मुंह के मुतालिक नाम बंटा, कागज-पत्तर पर नहीं. हमारे पुरखों ने अपनी जीविका के लिए गढ़ा, ढीपा कर जमीन बनाया. आज भी खतियान में जमीन की प्रकृति में लिखा जाता है कोड़खर जमीन. गांव का मालिक महतो, पूजा करनेवाला पाहन, बैठाने-उठाने के लिए भंडारी, परंपरा को बचाने के लिए अखरा, 12 महीनों के लिए 12 किस्म के बाजा. विवाद को निबटाने के लिए घुमकुड़िया बनाया. रिपोर्ट, इजहार, पत्तर, फैसला नहीं मानने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट पाड़हा. पुरखा के समय कभी तकलीफ नहीं हुई. बरखा अपने समय पर होती थी. धूप और जाड़ा भी पूरा चार-चार महीने के लिए होता था, लेकिन प्रकृति की बात को नहीं मानने की सजा है कि जाड़े में बरखा और बरखा में गर्मी का मौसम आ जाता है. अब शांति नहीं है, प्रेम नहीं है, संतोष नहीं है.