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  • May 10 2017 1:07PM

नजीर बनतीं महिलाएं

नजीर बनतीं महिलाएं

पूरे झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था लागू है. गांव जवार की सरकार गांव में बैठती है. राज्यभर में पंचायत भवन बनाये गये हैं. पंचायतों की मजबूती के लिए राज्य सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है. पंचायतों का डिजिटाइजेशन हो रहा है, लेकिन इन सभी के बीच ग्रामीण सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं. उन्हें अपनी पंचायत में हो रहे विकास कार्यों के लिए प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगाना होता है. प्रखंड कार्यालय गांव से काफी दूर होता है, इससे ग्रामीणों का श्रम, समय और पैसा सभी बरबाद होता है. इसके अलावा आधारभूत संरचनाओं से लैस पंचायत भवनों में ग्रामीणों के काम नहीं हो रहे हैं. इंटरनेट की छतरी टांग दी गयी है, लेकिन उसमें कनेक्टिविटी नहीं है. फंड की समस्या है. इन्हीं सब मुद्दों पर चतरा जिला परिषद की अध्यक्ष ममता देवी से कनक राज ने बातचीत की. पेश है उसके अंश... 

सवाल : पंचायत सशक्तीकरण के लिए क्या कुछ हो रहा है.

जवाब : पंचायत सशक्तीकरण की दिशा में काफी कुछ हो रहा है. सबसे पहले तो सभी पंचायतों का अपना पक्का पंचायत भवन बनवाया गया है. पंचायत भवन में सोलर सिस्टम लगा है. जेनरेटर दिया गया है. इसके अलावा मूलभूत सुविधाएं बहाल की गयी हैं. इसके अलावा गांव के विकास के लिए कई योजनाएं हैं. खुले में शौच से मुक्ति के लिए घर-घर में शौचालय बनाया जा रहा है. सड़कें बनी हैं. नलकूप लगाये जा रहे हैं. खेतों में सिंचाई के लिए काम हो रहा है.

सवाल : महिला होने के नाते आपको काम करने में  किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

जवाब : महिला होने के नाते हमें कोई परेशानी नहीं होती. अगर परेशानी होती, तो दो-दो बार मैं पुरस्कार कैसे जीत पाती. इस बार तो रेवेन्यू बढ़ाने को  लेकर पुरस्कार मिला है, जबकि दो साल पहले भी पुरस्कार मिल चुका है. आप देख  लीजिए कि पंचायती राज में 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं को आरक्षित है. अवसर का  सदुपयोग कर महिलाएं नजीर बन सकती हैं और बन भी रही हैं. महिलाएं ज्यादा  जवाबदेही के साथ काम करती हैं. 

सवाल : पंचायती राज दिवस के अवसर पर आप सम्मानित हुईं. आपके जिला परिषद को किन कार्यों के लिए सम्मानित किया गया. 

जवाब : वित्तीय वर्ष 2015-16 में किये गये कार्यों के आधार पर इस साल जिला स्तर पर चतरा जिला परिषद को सम्मानित किया गया. यह सम्मान उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 24 अप्रैल को मिला. सम्मान पाकर काफी खुशी हुई. यह सम्मान अपने जिले में राजस्व में वृद्धि करने के मद्देनजर दिया गया है. ग्रामसभा का संचालन, सभी पंचायतों में पेयजल उपलब्धता और शौचालय निर्माण के लक्ष्य की प्राप्ति के फलस्वरूप यह पुरस्कार मिला  है. सभी पंचायत प्रतिनिधियों ने अपने कार्य को समर्पित भाव से पूरा किया, जिस वजह से चतरा जिला परिषद को यह पुरस्कार  प्राप्त हुआ है. इसके लिए सभी बधाई के पात्र हैं. 

सवाल : जिला परिषद हमेशा फंड का रोना रोता है. क्या वाकई में फंड की कमी है.

जवाब : 14वें वित्त आयोग में जिला परिषद को एक पैसा भी नहीं मिला है. 14वें वित्त का पैसा सीधे मुखिया के खाते में चला जा रहा है. 13वें वित्त आयोग से जो काम हुआ है, उसी से जिला परिषद की व्यवस्था चल रही है. इसके बावजूद, सरकार राज्य भर के जिला परिषद को आत्मनिर्भर होने के लिए कहा जा रहा है. 13वें वित्त आयोग के तहत जिला परिषद क्षेत्र में जो काम हुआ है, उसी से राजस्व उगाही करने और उससे विकास के काम करने की बात कही जा रही है. पहले जो काम हुआ है, जो संसाधन तैयार हुए हैं, जैसे-विवाह मंडप, डाक बंगला, दुकानें आदि उसका किराया न्यून होता है. ये संसाधन सार्वजनिक है और हम ज्यादा किराया नहीं रख सकते हैं. जितना किराया मिलता है, उससे उन भवनों का रख-रखाव भी संभव नहीं है. ऐसे में इन संसाधनों को आगे बढ़ाने और नये काम करने के लिए फंड की आवश्यकता तो है ही. 

सवाल : जिला परिषद को राजस्व की प्राप्ति किस प्रकार होती है. 

जवाब : चतरा जिले  के सभी 154 पंचायत भवन के निर्माण कार्य पूरा हुआ और सभी 12 प्रखंडों में 423 दुकान का निर्माण कराया गया है. सिर्फ दुकानों से किराये के रूप में  जिला परिषद को दो लाख 30 हजार रुपये से भी अधिक की आमदनी हो रही है. बैंक ऑफ इंडिया से किराया 26,262, टंडवा डाक बंगला से 18,536 और सीसीएल से  32,100 रुपये प्रति माह प्राप्त हो रहा है. इससे जिला परिषद की आय में  वृद्धि हुई है.

सवाल : जिला परिषद और पंचायतों के बीच हमेशा समन्वय का अभाव देखा जाता है.

जवाब : ऐसा नहीं है. हमारे यहां जिला परिषद और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच हमेशा तालमेल बना रहता है. सभी एक-दूसरों का यथासंभव सहयोग करते हैं. यही वजह है कि खुले में शौच के लिए जो अभियान चला है, चतरा जिले में सफल रहा. पानी बचाने के लिए भी हमारे प्रतिनिधि खूब काम कर रहे हैं. 

सवाल : ग्रामीण महिलाओं को विकास से जोड़ने संबंधी क्या कुछ हो रहा है.

जवाब : महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम हो रहा है. स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को आगे बढ़ाने का काम हो रहा है. सैकड़ों महिलाएं सखी मंडलों से जुड़ कर अपनी आजीविका चला रही हैं. मुर्गी पालन, कृषि और कुटीर उद्योग चला कर महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनी हैं. चटाई बुनाई, अचार, पापड़, मुरब्बा, सिलाई, ब्यूटीशियन जैसे कोर्स भी महिलाओं को कराया गया है, जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हुई हैं. 

सवाल : अपने काम को लेकर ग्रामीण आज भी प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं, फिर भी काम नहीं होता है, क्या यह सही है.

जवाब : यह सही है कि गांव के लोग आज भी प्रखंड कार्यालय का चक्कर काटते हैं. दफ्तरों में बाबू दौड़ाते हैं. काम नहीं होता है. छोटी-छोटी रकम के लिए लोगों को परेशान होना पड़ता है. इसके पीछे कई कारण हैं. आज भी पंचायतों को अधिकार नहीं मिला है. जो काम पंचायतों में आसानी से हो सकता था, उसके लिए लोग प्रखंड कार्यालय दौड़ते हैं. लोगों का समय, श्रम और पैसा सब बरबाद होता है. 

सवाल : योजना बनाओ अभियान से ग्रामीणों को कितना लाभ हुआ है. 

जवाब : योजना बनाओ अभियान सिर्फ दिखावा बन कर रह गया है. चतरा जिले के गांव-गांव जाकर मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों के साथ योजना बनायी थी. लेकिन, अब लग रहा है कि योजनाओं को पोटली में बांध कर ले गये. आज तक गांव के लिए कोई भी योजना धरातल पर उतरते नहीं दिख रही है. हमलोगों ने भी कई सुझाव दिये थे. दो साल से भी अधिक समय बीत गया, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ है. काम नहीं होने से निराशा हो रही है.

सवाल : पंचायतों का डिजिटाइजेशन होने का सरकार दावा करती है, कितना सही है.

जवाब : पंचायतों का डिजिटाइजेशन नहीं हुआ है. चतरा जिले की बात करें, तो एकमात्र बचरा पंचायत ही है, जहां पर इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है. कुछ काम वहां दिखता है. बाकी सभी पंचायतों में कुछ नहीं है. पंचायत भवन तो बना है, लेकिन उसे साधन विहीन कर दिया गया है. पंचायतों में जेनरेटर दिया गया है, लेकिन तेल की व्यवस्था नहीं की गयी है. फिर जेनरटेर चलेगा कैसे. बाबू लोग बोलते हैं कि पंचायत अपने फंड से डीजल की व्यवस्था करे. 

सवाल : पंचायत भवन बन गये, लेकिन इसके बावजूद काम प्रखंड कार्यालय में हो रहा है, क्या कारण है. 

जवाब : पंचायत भवन तो बना है, लेकिन वहां पर काम करनेवाले कर्मचारी बहाल नहीं किये गये हैं. इस वजह से आज भी सारा काम प्रखंड कार्यालय में ही हो रहा है. 

पंचायत भवन सिर्फ शो पीस बन कर रह गया है. जो मूल काम है, वह आज भी प्रखंड कार्यालय में ही हो रहा है. फिर करोड़ों रुपये लगाकर पंचायत भवन बनाने का मकसद समझ से परे है.