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  • Jun 2 2017 12:44PM

किसान रिटायर नहीं, रिजेक्ट होता है : बालक महतो

किसान रिटायर नहीं, रिजेक्ट होता है : बालक महतो

किसान अन्नदाता है. धरती का सीना चीर वह देश को भोजन देता है. इसके लिए उसे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. पूरे देश की आवाम का पेट भरनेवाला किसान एक वक्त की रोटी का मोहताज है. किसानों के लिए योजनाएं अनेक हैं, लेकिन वह बिचौलियों के पेट में चली जाती है. लिहाजा, किसान अपने को ठगा-सा महसूस करता है. किसान के लिए कोई नहीं सोचता है. अन्न उपजाने से लेकर उसे कैश में बदलने तक किसान परेशान रहता है. मौसम की मार अलग होती है. किसान का बड़ा दिल है कि वह एक बार धोखा खाने के बाद भी बार-बार जमीन के अंदर दाना डालता है. यह कहना है किसान बालक महतो का. किसानों  के विभिन्न मुद्दों पर किसान बालक महतो से कनक राज ने विस्तार से बातचीत की. पेश है बातचीत के मुख्य अंश.

कौन है बालक महतो

खेती-किसानी और बागवानी में बालक महतो का झारखंड में बड़ा नाम है. साल 1972 में सुगनू से विस्थापित हो कर कुच्चू में आकर बसे और एक छोटे किसान से बड़े, व्यवस्थित और नित नये प्रयोगधर्मी किसान के रूप में अपनी पहचान बनायी. बालक महतो आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. बहुत कम ही किसान ऐसे हैं, जो विस्थापन के बाद खुद को पहले से ज्यादा सशक्त और मजबूत बनाया हो. बालक महतो बागवानी, पशुपालन, फूलों की खेती के साथ-साथ कृषि अनुसंधान केंद्र, प्लांडू के लिए बीज भी तैयार करते हैं. सब्जी की खेती में बालक महतो का बड़ा नाम है. कोलकाता, उत्तर प्रदेश से लेकर तमाम बड़े राज्यों के व्यापारी उनसे सब्जी लेते हैं. इसके अलावा राज्यभर के किसानों को वह प्रशिक्षण भी देते हैं. बालक महतो के पास कृषि के सभी संसाधन उपलब्ध है. छोटा कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, ड्रिप एरिगेशन और ट्रैक्टर सहित तमाम चीजें उनके पास एसेट्स के रूप में मौजूद है. बालक महतो 58 एकड़ के रकबे में खेती करते हैं. बालक महतो ने अब फूलों की भी खेती शुरू की है. दो बड़े कुएं और एक बोरिंग के सहारे उनके खेतों में सदाबहार हरियाली रहती है. बालक महतो अब नये बीज भी तैयार कर रहे हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, प्लांडू ने उनकी खेती और तकनीक को नया आयाम दिया है.

सवाल : किसानों की परेशानी क्या है.

जवाब : जब से झारखंड अलग हुआ है, तब से खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते हैं. फसल किसी तरह से लगा लिया, तो उसका उचित दाम नहीं मिलता है. हजार रुपये किलो बीज खरीद कर बोने के बाद रुपये-दो रुपये किलो भी उपज को कोई नहीं पूछता है. कई बार तो अपने फसलों को बाजार से वापस लाना पड़ता है. एक किसान जितना खेत में काम करता है, उसको वाजिब  मेहताना भी नहीं मिल पाता है.

सवाल : किसानों को सरकार खाद बीज उपलब्ध कराती है, इससे कितना फायदा होता है.

जवाब : सरकार  खाद-बीज तो उपलब्ध कराती है, लेकिन वह किसानों को समय पर नहीं मिलता है.  इससे किसानी पिछड़ जाता है. समय पर नहीं मिलने की वजह से ही किसान खाद, बीज और  दवा बाहर के दुकानों से खरीदने को मजबूर होते  हैं, क्योंकि उसे समय पकड़ना होता है. अगर  किसानों को किसानी के समान समय पर मिल जाये, तो काफी फायदेमंद रहेगा.

सवाल : धान क्रय केंद्र खोले गये हैं, इसका लाभ तो मिल रहा है.

जवाब : धान  क्रय केंद्र खुला है, लेकिन उसकी प्रक्रिया काफी जटिल है. जमीन के कागजात,  लगान, रसीद और फिर क्रय केंद्र तक पहुंचाने का झंझट किसानों को रास नहीं  आता है. इसके साथ ही पैसा मिलने में भी काफी समय लग जाता है. पिछले साल धान  क्रय केंद्र में जो धान दिया था, उसका पैसा अभी तक नहीं आया है. अब बताइए  कि एक गरीब किसान, जो महाजन से सूद पर पैसा लेकर खेत बोया होगा, वह कितना  इंतजार करेगा. इतने दिनों में सारा मुनाफा तो सूद में ही चला जाएगा.  धान क्रय केंद्र को और सरल करने की जरूरत है. कई ऐसे किसान भी हैं जो खेती  दूसरे लोगों की जमीन पर करते हैं. उनके लिए भी कुछ प्रावधान होना चाहिए और  पैसा तुरंत हाथों-हाथ मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए. तभी किसान क्रय केंद्र  का रूख करेंगे, नहीं तो बिचौलिया औने-पौने दाम में सब खरीद लेगा.

सवाल : किसानों को क्या-क्या सुविधाएं मिलनी चाहिए.

जवाब : किसान अपने लिए काम नहीं करता है, बल्कि वह देश के लिए काम करता है. एक दिन किसान  काम न करे, तो पूरे देश की गति रूक सकती है. किसानों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और तमाम तरह की सुविधाएं मिलनी चाहिए. किसानों के लिए किसान कार्ड  जारी होना चाहिए. जो पूरी तरह से किसानी से ही आजीविका चलाते हैं, उनके लिए  सुविधाएं बहाल की जानी चाहिए. उत्पाद को बाजार मिलना चाहिए और फसल की पूरी  कीमत. खेतों से कम कीमत पर ले जानेवाले बिचौलिया लाखों रुपये का मुनाफा  कमाते हैं, लेकिन किसान को कुछ नहीं मिलता है. इसलिए सरकार को चाहिए कि  किसान की फसल को उनके खेत पर अच्छी रकम दी जाये. सिंचाई के लिए उचित  व्यवस्था होनी चाहिए. गांव-गांव तक बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित हो. खाद-बीज समय पर मिले. मजदूर मुहैया कराए जाएं. बीमा की राशि बढ़ायी जाए और उसका  भुगतान समय पर हो. बीज सस्ते किये जायें.

सवाल : खेती-किसानी में हाइब्रीड बीज से किसानों को कितना लाभ या हानि होता है. 

जवाब : हाइब्रीड बीज से उत्पादन तो बंपर हो जाता है, लेकिन इससे हमारे देसी बीज लुप्त हो जा रहे हैं. हाइब्रीड का नुकसान यह है कि उसका बीज सिर्फ एक बार ही प्रयोग किया जा सकता है. दोबारा खेती करने के लिए फिर से हाइब्रीड बीज लेनी पड़ती है. हाइब्रीड बीज काफी महंगा होता है. कृषि अनुसंधान परिषद ने देसी बीज के उन्नत किस्म इजाद किये हैं. किसानों को इसका प्रयोग करना चाहिए. देसी बीज के उन्नत किस्म से हाइब्रीड बीज की तुलना में  ज्यादा पैदावार होती है. हालांकि हाइब्रीड वाले भी कम चालाक नहीं हैं. उन्होंने देसी उत्पाद की तरह ही अपने बीज तैयार किये हैं, जिससे फसल देसी के शक्ल में ही दिखता है. इसी तरह धान का देसी वेराइटी भी खत्म हो रहा है. कुछ ही किसानों के पास धान की देसी वेराइटी है.

सवाल : हाइब्रीड के बारे में लोगों की क्या राय है.

जवाब : हाइब्रीड सब्जी और अनाज को बाजार में कोई लेना नहीं चाहता है. अब जमाना फिर से देसी खेती की ओर लौट रहा है. लोग ज्यादा से ज्यादा स्थानीय फसल ही खाना चाहते हैं. इसके लिए दाम भी देते हैं. लेकिन, स्थानीय  फसल का लाभ बिचौलिएं उठा लेते हैं, क्योंकि हमारे यहां समुचित बाजार का अभाव है. कुछ ही किसान अपनी फसल को बाजारों तक पहुंचा पाते हैं. शहरों में किसानों को फसल बेचने के लिए कोई उपयुक्त जगह भी नहीं है.

सवाल : सरकार किसानों को प्रशिक्षण देती है, कितना फायदा होता है.

जवाब : प्रशिक्षण से फायदा तो होता है, लेकिन किसानों को प्रशिक्षण उनके खेत में दिये जाने चाहिए. बड़े-बड़े क्लास रूम में सीखने के बाद खेत आते-आते किसान भूल जाते हैं. कई बार किसानों को जो प्रशिक्षण देने आते हैं, वह सिर्फ किताबी होते हैं. उन्हें जानकारी तो होती है, पर उसे धरातल पर उतारने की सही योजना का अभाव दिखता है. इसलिए जो प्रशिक्षक बहाल किए जाते हैं, वह योग्य हों, ताकि किसानों को दिग्भ्रमित न कर सकें.

सवाल : किसानों को भविष्य के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए.

जवाब : किसान रिटायर नहीं होता है बल्कि रिजेक्ट हो जाता है. इसलिए किसानों को अपने भविष्य का पूरा ध्यान रखना चाहिए. किसान खेती करने के साथ-साथ बागवानी करें. ज्यादा से ज्यादा फलदार पौधे लगा कर रखें. ये पौधे हमारे लिए भविष्य निधि का काम करते हैं. जब किसान थक जाते हैं, तो इन फलदार वृक्षों का उत्पादन ही उनकी  आजीविका के स्रोत बनेते हैं. इसके साथ ही अपने बाल-बच्चों को काबिल बनाना चाहिए. मुझे ही देख लीजिए पांच संतानों में मैंने सभी को पढ़ाया-लिखाया, ताकि आगे चल कर किसी तरह की परेशानी न हो. मेरी दो बेटियों ने हिंदी में ग्रेजुएशन किया है. एक बेटा इंजीनियरिंग की डिग्री ले रखी है. और दो बेटे अभी इंटर और मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे हैं.

सवाल : फसल बीमा और सरकारी योजनाओं को लेने में कितनी परेशानी होती है.

जवाब : सरकारी योजना में मेरा ही उदाहरण ले लीजिए. एक कंपनी के स्टाफ ने हमसे खाता-प्लॉट की जानकारी लेकर ड्रिप एरिगेशन का पैसा गट कर गया. ड्रिप एरिगेशन मेरे लिए  आया था, लेकिन कंपनीवालों ने मेरा पैसा निकाल लिया. बाद में पता चला कि ड्रिप एरिगेशन आया था. जब हम पता लगाए, तो मालूम चला कि मेरे पैसे भी निकल लिए गये. फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए. अभी तक गेंहू, सरसों, धान और एक दो फसलों का ही बीमा होता है. धान का बीमा का पैसा भी हमेशा नहीं मिलता है. मुआवजे की राशि भी बढ़ायी जानी चाहिए.

सवाल : किसान और कैसे कमाई कर सकता है.

जवाब : किसान पारंपरिक खेती से हट कर काम करे. एक साथ दो या तीन फसल लगाए. फूलों की खेती से जुड़ें और बीज का उत्पादन करें. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद किसानों को बीज उत्पादन के लिए बीज उपलब्ध कराता है. उत्पादित बीज को भी परिषद खरीद लेता है. यह कमाई का अच्छा स्रोत है. किसानों को इससे जुड़ना चाहिए. इसके साथ ही किसान को खुद से आत्मनिर्भर रहना चाहिए.