ssakshtkaar

  • Jun 21 2017 12:59PM

प्राथमिक शिक्षा को बेहतर करना पहली शर्त

प्राथमिक शिक्षा को बेहतर करना पहली शर्त

इमारत टिकाऊ और मजबूत हो, इसके लिए आवश्यक शर्त है नींव का मजबूत होना. ठीक उसी तरह देश में उच्च शिक्षा की बुनियाद मजबूत हो, इसके लिए जरूरी है प्राथमिक शिक्षा को सुदृढ़ करना. झारखंड के संदर्भ में हम बातें कर रहे हैं मैट्रिक और इंटर परीक्षा परिणाम 2017 की. जहां पर मैट्रिक में 58 फीसदी और इंटर साइंस में 52 तथा कॉमर्स में 60 फीसदी रिजल्ट हुआ, जिसे बेहतर नहीं कह सकते. लोगों का मानना है कि बुनियादी कही जानेवाली प्राथमिक शिक्षा पर उचित ध्यान नहीं दिया जा रहा है, लिहाजा माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के परिणाम खराब हो रहे हैं. बुनियादी शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए सभी की सहभागिता जरूरी है. पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर प्राथमिक शिक्षा सह राज्य शिक्षा परियोजना निदेशक मुकेश कुमार से पंचायतनामा ने विस्तार से बातचीत की. पेश है बातचीत के मुख्य अंश.

सवाल : पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा को लेकर क्या काम हो रहे हैं.

जवाब : पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा को लेकर लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं. इन अभियानों के मद्देनजर दो बिंदुओं पर विशेष जोर दिया गया. पहला, प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में पंचायतों की भूमिका कैसे सुनिश्चित की जाये. आधारभूत संरचना, पठन-पाठन का स्तर, समय पर्यवेक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर विशेष जोर देना भी जरूरी है. दूसरा, विद्यालय और पंचायत स्तर पर विद्यालय प्रबंध समितियां किस तरह कार्य कर रही है. विद्यालय प्रबंध समितियों के लिए जो निर्देश दिये गये हैं, उसको कितना गंभीरतापूर्वक अनुपालन किया जा रहा है. इस प्रयास के तहत बेहतर काम नहीं करनेवाली समितियों को चिह्नित कर पूरी सख्ती के साथ उसे भंग किया गया. इसके अलावा पठन-पाठन प्रभावित होने या फिर एसएमसी को दी गयी राशियों को खर्च करने के अनुपालन में गंभीरता नहीं बरती गयी हो, वैसे एसएमसी को पहली बार बड़े पैमाने पर अभियान चला कर भंग किया गया. यानी यह बताने की कोशिश की गयी कि एसएमसी को भी जिम्मेदारी लेते हुए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. दूसरा, एसएमसी को लेकर प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया. पंचायतों से लेकर राज्य मुख्यालय तक एसएमसी सम्मेलन किये गये. उनके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी, ताकि एसएमसी सीधे तौर पर सभी निर्देशों का अनुपालन करा सके.

सवाल : पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा को लेकर क्या-क्या योजनाएं है.

जवाब : पंचायतों को लेकर सरकार ने एक नया अभियान शुरू किया है पंचायतों में जीरो ड्रॉप आउट. इसके पीछे भावना यह है कि पंचायतों को भी जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाये कि एक पंचायत के भीतर बच्चे-बच्चियां पठन-पाठन में समुचित रूप में हिस्सा ले सके. अब तक इसमें अधिकारियों से लेकर शिक्षक-शिक्षिकाओं और कुछ हद तक एसएमसी की ही भूमिका रहती थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी पंचायत जनप्रतिनिधियों को भी दिया गया है. राज्यभर के करीब 350 पंचायतें जीरो ड्रॉप आउट के रूप में तब्दील हुए हैं और इसकी घोषणा जिलों के उपायुक्त की ओर से की गयी है. वहीं करीब 400 पंचायतें ऐसी है, जिसे मुखिया ने अपने स्तर से जीरो ड्रॉप आउट पंचायत की घोषणा की है, लेकिन उसका वेरिफिकेशन जिला स्तर की टीम से किया अभी जाना बाकी है. अब उम्मीद की जा रही है कि 15 अगस्त 2017 तक एक हजार पंचायतें यानी 25 फीसदी पंचायतों को जीरो ड्रॉप आउट घोषित किया जा सकता है. साथ ही 2019 तक राज्य के सभी पंचायतों को जीरो ड्रॉप आउट घोषित करने का लक्ष्य निर्धारित है. जिस तरह से खुले में शौच से मुक्त पंचायतें घोषित की जा रही है, उसी तरह जीरो ड्रॉप आउट पंचायतों के लिए मुखियाओं की जिम्मेदारी सुनिश्चित की गयी है. 

सवाल : पंचायत जनप्रतिनिधियों का कितना सहयोग मिलता है. 

जवाब : कई पंचायतों को जीरो ड्रॉप आउट बनाने में मुखिया और पंचायत प्रतिनिधियों की अहम भूमिका रही है. पंचायत जनप्रतिनिधि उत्साही और ऊर्जावान भूमिका में हैं. पंचायत जनप्रतिनिधियों का सम्मेलन और प्रखंड, जिला व राज्य स्तर पर प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें उनकी भूमिका से अवगत कराने का प्रयास किया जाता है. मुख्य सचिव के स्तर पर भी राज्य के सभी मुखियाओं को शिक्षा के अधिकार अधिनियम में पंचायतों से क्या अपेक्षाएं हैं, के संदर्भ में उनकी भूमिका से अवगत कराया गया. हालांकि कई पंचायतों में मुखिया इससे विमुख भी हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में उनकी उपयोगिता के लिए लगातार उन्हें प्रेरित भी किया जा रहा है. इस मुद्दे पर मुखियाअों को पत्र लिख कर, राज्य मुख्यालय स्तर पर वीडियो कांफ्रेंस करा कर, प्रखंडों में सम्मेलन और प्रशिक्षण कार्यक्रम के अलावा माह के अंतिम दिनों में गुरु गोष्ठी आयोजित कर उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाता है. वहीं मुखियाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वो अपने-अपने पंचायतों को जीरो ड्रॉप आउट या आधारभूत संरचना के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग करें. कई पंचायतों में यह भी देखने को मिला है कि पंचायत प्रतिनिधि 13वें और 14वें वित्त आयोग की राशि का उपयोग स्कूलों को बेहतर बनाने में भी कर रहे हैं. पंचायती राज विभाग और शिक्षा विभाग की ओर से स्कूलों के निरीक्षण के लिए मुखियाओं की जवाबदेही भी तय की गयी है. मुखिया और पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग बहुत बढ़ा है और हम उम्मीद करते हैं कि उनका सहयोग और बढ़ेगा.

सवाल : हर बार सवाल उठता है कि शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य भी कराये जाते हैं, जिससे शिक्षा पर व्यापक असर पड़ता है. 

जवाब : मैं आपको बताऊं, झारखंड पहला राज्य है, जहां सभी शिक्षकों को सभी तरह की गैर शैक्षणिक कार्य से पूरी तरह से मुक्त कर दिया गया है. इसमें चुनाव जैसे कार्यों से भी इन्हें अलग रखा गया है. दो साल पहले ही लिया गया यह निर्णय काफी महत्व रखता है. अब यह विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य में नहीं लगाया जाये. हालांकि शिक्षा और शिक्षा विभाग से संबंधित प्रतिवेदन और रिपोर्ट, छात्र-छात्राओं का मूल्यांकन, उपलब्धि, सर्वे जैसी रिपोर्ट कार्य में ही अब शिक्षकों का उपयोग किया जाता है. आपको एक बार फिर बता दूं कि टीचिंग मैनपावर को हमलोगों ने अलग कर रखा है और बीएलओ के लिए भी सभी जिले ने अपने स्तर से इंतजाम किये हैं.

सवाल : आप कहते हैं बहुत काम हो रहा है, पैसे भी खर्च हो रहे हैं लेकिन रिजल्ट सामने नहीं आ रहा है, इसका क्या कारण है.

जवाब : निश्चित तौर से प्राथमिक शिक्षा एक महत्वपूर्ण मसला है. फाउंडेशन प्रीपेयर का काम प्राथमिक शिक्षा कर रहा है, तो बहुत जरूरी हो जाता है कि क्वालिटी एजुकेशन पर फोकस हो. तभी आप चरणबद्ध तरीके से पढ़ाई करते हैं और नौवीं-दसवीं या 11वीं-12वीं में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं. इसके पीछे मंशा यह है कि विद्यार्थियों में शिक्षा के प्रति रूचि पैदा हो, ना कि उसे बोझ समझे. विद्यार्थियों में यह समझ विकसित करने की कोशिश की गयी है कि बेहतर करोगे, तो परिणाम बेहतर आयेगा. पूर्व में दूसरी कक्षा में जाने की भी शर्त होती थी कि पहले वाली कक्षा में बेहतर करना है. यह शर्त कमजोर होने और अचानक बोर्ड परीक्षा की तिथि आ जाने से भी परिणाम पर असर पड़ा है. एक कारण इसे भी मान सकते हैं. 2017 तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर प्राथमिक शिक्षा में सुधार संबंधी नीति आयोग का स्पष्ट निर्देश भी है, जिस पर पूरा ध्यान केंद्रित है. इसके तहत कई कार्यक्रम भी शुरू किये गये हैं. शिक्षकों की कमी भी गुणात्मक शिक्षा में एक बड़ा बाधक था. इस कमी को दूर करने के लिए जहां पिछले साल काफी संख्या में शिक्षकों की बहाली हुई है, वहीं इस वर्ष भी शिक्षकों के खाली पदों को भरने की प्रक्रिया चल रही है. इससे शिक्षक-छात्र अनुपात के साथ-साथ गुणात्मक शिक्षा में भी सुधार आयेगा. पिछले साल वर्ग एक से आठ तक के करीब 40 हजार विद्यार्थियों के बीच उपलब्धि सर्वे कराया गया. इसके आधार पर ही इस बार भी इस तरह के सर्वे कराने की योजना है. मेरा मानना है कि आठवीं क्लास में भी बोर्ड की परीक्षा आयोजित हो, तो उससे भी छात्र-छात्राओं में एक सकारात्मक दबाव बनेगा और इन कार्य योजनाओं के बदौलत हम क्वालिटी एजुकेशन को बहुत आगे तक ले जा सकेंगे. 

सवाल : लोगों का मानना है कि सरकारी कर्मियों के बच्चे अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ें, तो स्थिति में काफी सुधार आ सकता है, आप क्या सोचते हैं. 

जवाब : निश्चित तौर पर यह परसेप्शन का इश्यू है. सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का विश्वास नहीं बढ़ा है, यह हमलोग भी जान रहे हैं. इसका सुमचित कारण भी है. सरकार निजी स्कूलों की भांति मात्र कुछ संख्या में स्कूल तो चलाते नहीं हैं, बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों का संचालन होता है. निजी स्कूलों के शर्तों की तुलना में सरकारी स्कूलों में नाममात्र की शर्तें होती हैं. एक से दूसरे क्लास में जाने के लिए विद्यार्थियों को पास होनेवाले शर्तों पर ही जोर दिया जाता है, जो जरूरी भी है. दूसरा, किसी भी शिक्षक, सरकारी कर्मी, अधिकारी या किसी व्यक्ति को बाध्य नहीं किया जा सकता कि उनका बच्चा सरकारी स्कूल में ही पढ़े. हां, लोगों से यह अपेक्षा जरूर की जा सकती है कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़े. इसके लिए क्वालिटी टीचर्स, अच्छी पढ़ाई, सरकारी स्कूलों में निजी स्कूलों की भांति वातावरण आदि पर विशेष जोर देना होगा, तभी यह सफल हो सकता है. वर्तमान में कई सरकारी स्कूल हैं, जहां यह वातावरण विकसित हो रहा है. इसकी जानकारी भी लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. 

सवाल : क्या कारण है कि स्कूलों में पढ़ाने के बजाए शिक्षक आंदोलन को बाध्य होते हैं.

जवाब : सरकार वेलफेयर मोड में चीजों को सोचती है. शिक्षकों की अपनी-अपनी मांगें हो सकती है. शिक्षकों को समय-समय पर प्रमोशन देकर उन्हें प्रोत्साहित भी करती है. पारा शिक्षकों ने वेतन बढ़ाने को लेकर कई बार हड़ताल पर भी गये. सरकार और विभाग ने सकारात्मक सहयोग किया. लेकिन, किसी को भी यह कतई अधिकार नहीं है कि वह हड़ताल के नाम पर शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित करें. सरकार सहानुभूति पूर्वक काम करती है. शिक्षक सकारात्मक एप्रोच के साथ काम करें, तो कहीं कोई समस्या उत्पन्न नहीं होगी. 

सवाल : शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के संदर्भ में पंचायतों के लिए भावी योजनाएं क्या है.

जवाब : हमलोग बहुत जल्द एक मॉडल के साथ आ रहे हैं, जहां पहले चरण के तहत प्रखंड मुख्यालय में एक मॉडल स्कूल हो, जहां तीन साल के अंदर अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई हो सके. इस संबंध में विभाग की ओर से सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है. दूसरे चरण में पंचायत स्तर पर मॉडल स्कूल स्थापित करने पर जोर होगा. इसके अलावा रात्रि अखड़ा का अभिनव प्रयोग हुआ है. रात में गाड़ियों की हेडलाइट की रोशनी में, सड़क के किनारे, स्कूल प्रांगण में या फिर किसी चबूतरे पर बैठ कर अलग-अलग जिलों में शिक्षा रात्रि अखड़ा का आयोजन हो रहा है. सुदूरवर्ती गांवों में भी लोग अखड़ा लगा रहे हैं. इसमें सांसदों और विधायकों की भी उपस्थिति दर्ज होने लगी है. राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में यह एक बढ़ता हुआ कदम माना जा सकता है. q