ssakshtkaar

  • Jul 4 2017 1:14PM

पिता से प्रेरणा, पति का साथ लिखना शुरू किया और छूआ आसमां

पिता से प्रेरणा, पति का साथ लिखना शुरू किया और छूआ आसमां

साहित्य के क्षेत्र में कोई काम करे और उस काम के एवज में उन्हें साहित्य का सर्वोच्च सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार मिले, तो निश्चित ही उस साहित्यकार के लिए वह क्षण गौरव, ऐतिहासिक और एक बड़ी उपलब्धि का होता है. जी हां, हम बात कर रहे हैं साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार 2017 की विजेता महिला साहित्यकार जोबा मुर्मू की. इन्हें संताली बाल कहानी पुस्तक ओलोन बाहा के लिए बाल साहित्य पुरस्कार 2017 देने की घोषणा साहित्य अकादमी के द्वारा की गयी है.

पेशे से शिक्षिका जोबा मुर्मू उच्च शिक्षित आदिवासी संताली महिला हैं. जमशेदपुर स्थित करनडीह के दुखूटोली निवासी जोबा मुर्मू ने अपने पिता की प्रेरणा से साहित्य के क्षेत्र में लिखना शुरू किया, जिसका साथ पति ने भी दिया और आज बाल साहित्य पुरस्कार 2017 की विजेता बनीं. उन्होंने बाल साहित्य पुरस्कार 2017 के लिए चयन को जीवन का ऐतिहासिक क्षण बताया. जोबा मुर्मू से संजय सरदार ने विस्तार से बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश….

सवाल साहित्य के क्षेत्र में आप कैसे आये और लिखने की प्रेरणा आप को कहां से मिली.

जवाब जब मैं छोटी थी, तो पिताजी लिखते थे और मैं सामने खड़ी होकर देखती थी. जब पिताजी कहीं जाते, तो मैं उनकी लिखावट को पलट कर देखते रहती थी. पिताजी कविता और कहानी के साथ-साथ झारखंड आंदोलन पर भी लिखा करते थे. यहीं से मुझे लिखने की प्रेरणा मिली और लिखने को ठानी. जब मैं इंटर में पढ़ रही थी, तभी एलबीएसएम कॉलेज के एक संताली पत्रिका खेरवाड़ आड़ांग निकलता था, तो 1985 को उस पत्रिका में मेरा एक कविता ञया जीयोन होर कविता छपा. इसके बाद मेरी शादी हो गयी. शादी के बाद घर और बच्चों के बीच थोड़ी व्यस्त हो गयी, लेकिन साल 2000 से पुन: लिखना शुरू किया, जो आज भी जारी है.

सवाल पहली बार जब आप लिखे और वह लेखनी जनता के बीच रखें, तो कैसा लगा और क्या रिस्पांस मिला.

जवाब देखिए, शुरुआत में कैसा महसूस होता है, ये सभी जानते हैं. लेकिन, लिखने और लेखनी को जनता के बीच रखने का जुनून था. अपनी लेखनी को अपने पिता को दिखाते थे, जहां वह थोड़ी बहुत गलती को सुधार करने को बोलते और फिर हौसला भी बढ़ाते थे. पहली बार मेरी कविता कॉलेज के पत्रिका में छपी. इसके बाद बारीपदा के लेखक सम्मेलन में मैंने एक कविता सुनायी थी, जो कविता ओड़िशा एवं पश्चिमी बंगाल में भी प्रकाशित हुआ और लोगों ने कविता को काफी सराहा, जिससे मेरा हौसला और बुलंद हो गया.

सवाल आप को लेखन के काम में किसका-किसका साथ मिला.

जवाब कहते हैं ना कि पति-पत्नी जीवन के दो पहिये हाेते हैं और दोनों के संतुलन से ही जीवन की गाड़ी आगे खींची जा सकती है. ठीक इसी तरह हम दोनों पति-पत्नी समान रूप से आगे बढ़े और अपनी मंजिल तक पहुंच पायें. मेरे लेखन के कार्य में मेरे पति ने हमेशा साथ दिया. यहां तक कि मैं जब लिखने में व्यस्त रहती थी, तो उन्होंने कभी मुझे परेशान नहीं किया. किसी चीज का दबाव नहीं दिया और उन्होंने मेरा पूरा सहयोग किया. आज में जो भी हूं, इसमें मेरे पिता की प्रेरणा व पति का पूरा सहयोग है.

सवाल परिवार के बीच रहते हुए लिखने के लिए आप कैसे समय निकाल लेते हैं.

जवाब मैंने 1985 से लिखना शुरू किया, लेकिन तब ज्यादा दिन तक नहीं लिख पायी. फिर मेरी शादी हो गयी. इसके बाद घर और बच्चों को बीच थोड़ी व्यस्त हो गयी, लेकिन पुन: वर्ष 2000 में लिखना शुरू किया, जो आज भी जारी है. मैंने 2004 में शिक्षिका के रूप में चाकुलिया के पाखुड़िया प्राथमिक विद्यालय से सरकारी सेवा शुरू किया. प्रतिदिन ट्रेन से आना-जाना करती थी. ट्रेन लेट रहती, तो स्टेशन में भी बैठ-बैठ कर लिखती रहती थी. इस तरह घर में सारे काम के बीच जो समय बचता था, उस दौरान भी लिखती थी.

सवाल आप को संताली बाल कहानी पुस्तक ओलोन बाहा के लिए बाल साहित्य पुरस्कार के लिए चयन हुआ. इस पुस्तक में क्या कुछ है.

जवाब यह ओलोन बाहा पुस्तक बाल कहानी पर आधारित है. इसमें 13 बाल कहानी को शामिल किया गया है. पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2014 को हुआ है. पुस्तक में बाल कहानी के माध्यम से बच्चों को मनोरंजन, सामाजिक व शैक्षणिक जानकारियों को दिया गया है.

सवाल आप समाज के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे.

जवाब मैं अपना आदर्श पंडित रघुनाथ मुर्मू को मानती हूं. पंडित रघुनाथ मुर्मू ने कहा है कि ओल मेना: तामा, रोड़ मेना: तामा, धोरोम मेना: तामा, ओम हो मेनाम, रोड़ एम आद लेरे, धोरोम एम आद लेरे, आम हो आदो: (यानी हमारी भाषा है, धर्म है और संस्कृति है, तो हम हैं. यदि हम इसे भूल जायेंगे, तो हमारा अस्तित्व भी खत्म हो जायेगा). इसी कथन पर चलते हुए वह संताली साहित्य, कला और संस्कृति पर कार्य रह ही है. समाज के सभी लोगों से अपील, विशेषकर युवाओं से कि वह समाज के लिए काम करें. भाषा को नहीं भूले. संस्कृति को बचाये रखें और साहित्य का प्रचार-प्रसार करें. 

व्यक्ति परिचय

नाम जोबा मुर्मू

पति पितांबर हांसदा (साहित्यकार)

पिता सीआर मांझी 

(झारखंड आंदोलनकारी)

माता स्व बाहा मुर्मू

पुत्र लालमोहन हांसदा (टेक्सटाईल कंपनी में कार्यरत)

पुत्री सोनाली हांसदा 

(निफ्ट, गुजरात में अध्ययनरत)

जन्म तिथि 27 फरवरी 1968

प्राथमिक शिक्षा करनडीह मध्य विद्यालय

मैट्रिक 1984, बिरसा मेमोरियल उच्च विद्यालय, सारजमदा

इंटर-स्नातक एलबीएसएम कॉलेज, करनडीह

स्नातकोत्तर रांची विश्वविद्यालय (संताली)

एलएलबी कॉ-ऑपरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर

पेशा शिक्षिका, प्रावि बाल विकास, उलियान, कदमा

जोबा मुर्मू द्वारा लिखी गयी पुस्तकेंबाहा उंबुल

कविता संग्रह

2009

प्रेमचंद आ: सोरेस 

सर्वश्रेष्ठ कहानियों का संताली रूपांतर

2014

बेवरा

लघु कहानी

2010

सेरेञांजली 

गीतांजली का संताली रूपांतर

2015

ओलोन बाहा       बाल कहानी 2014

अब तक मिले सम्मान एवं पुरस्कार

आसेका, राउरकेला की ओर से साहित्य सम्मान- 2012

राज्यपाल के हाथों आरआर किस्कु रपाज सम्मान- 2016

पति को भी मिला है बाल साहित्य पुरस्कार, बेटी भी लेखिका

जोबा मुर्मू के पति पितांबर हांसदा टाटा स्टील के कर्मी रहे हैं. वह भी संताली लेखक हैं. उन्हें वर्ष 2012 में जीव जियाली कोवा : गिदरा कहानी लेखन पर बाल साहित्य पुरस्कार मिल चुका है. वहीं पुत्री सोनाली हांसदा भी कहानी और कविता लिखती है, जबकि फोटोग्राफी के क्षेत्र में भी उनकी काफी रुचि है. सोनाली हांसदा ने वर्ष 2017 का संताली कैलेंडर भी बनायी है. 

सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी हैं जोबा मुर्मू

संस्था पद

ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन आजीवन सदस्यता 

दिशोम जाहेरगाढ़ कमिटी, करनडीह सदस्य

ऑल इंडिया संताली फिल्म एसोसिएशन सदस्य

केके बिड़ला फाउंडेशन एडवाइजरी बोर्ड मेंबर

ऑल इंडिया संताली सेमलेद सदस्य