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  • Oct 25 2017 1:21PM

झारखंड में खाद्य सुरक्षा की स्थिति, सही प्लानिंग व इच्छाशक्ति की जरूरत : बलराम

झारखंड में खाद्य सुरक्षा की स्थिति, सही प्लानिंग व इच्छाशक्ति की जरूरत : बलराम

अक्सर हम विकास की बातें करते हैं. देश या राज्य के विकास को जीडीपी की दर से आंकते हैं, लेकिन इस विकास के पीछे की सच्चाई क्या है, वो नहीं दिख रहा है. मानव संपदा का विकास नहीं हो रहा है. राज्य में मानव संपदा में लगातार गिरावट आ रही है. इसका सीधा संबंध कहीं-न-कहीं खाद्य सुरक्षा से है, क्योंकि अगर भरपेट भोजन नहीं मिलेगा, तो मानव संपदा कमजोर होगी और विकास अवरुद्ध होगा. देश में खाद्य सुरक्षा कानून लागू हो गया, लेकिन इसकी कई खामियां भी सामने आ रही हैं. सिर्फ पेटभर देना ही विकल्प नहीं है. पोषणयुक्त भरपेट भोजन करना देश के हर नागरिक का अधिकार है और उसे भरपेट भोजन मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है, पर क्या वाकई सरकार इस पर ध्यान दे पा रही है ? भरपेट पोषणयुक्त भोजन देने के क्या-क्या रास्ते हो सकते हैं. झारखंड में खाद्य सुरक्षा कानून की क्या है स्थिति, इन तमाम मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के झारखंड में खाद्य सुरक्षा सलाहकार बलराम से पवन कुमार ने विशेष बातचीत की. पेश है बातचीत का मुख्य अंश. 

सवाल : विश्व खाद्य दिवस के पीछे की परिकल्पना क्या थी और वर्तमान में झारखंड में इसकी तस्वीर कैसी है.

जवाब : देखिए, सबसे पहले मैं कुछ अन्य चीजों का जिक्र करना चाहूंगा, जो सीधे तौर पर खाद्य दिवस से संबंधित तो नहीं है, लेकिन खाद्य सुरक्षा के लिए उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है. इसके लिए सबसे पहले एक सुनियोजित तरीके से कार्य करना होगा. यहां पर एक बात कहना चाहूंगा कि प्रकृति खुद अपने अनुरूप हमें अपना जीवन जीने का अवसर देती है, लेकिन अगर हम अपनी जीवनशैली को आरामदायक बनाने के लिए प्रकृति का दोहन करते हैं, उससे दूर भागते हैं, तो उसका खामियाजा अंतत: हमें ही भुगतना पड़ता है. खाद्य सुरक्षा की बात हम सभी करते हैं, लेकिन इसे कैसे हासिल किया जाये, इसके लिए सकारात्मक सोच के साथ काम करने की जरूरत है. मेरा मानना है कि इसके लिए उत्पादन, भंडारण, वितरण और उपभोग पर ध्यान देकर काम करना होगा, तभी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो पायेगी. सबसे पहले उत्पादन की बात करते हैं. 

झारखंड की बात करें, तो किसान यहां धान की खेती ज्यादा करते हैं. हाइब्रिड धान का ऐसा दौर चला कि पारंपरिक धान लोगों के खेतों से गायब होते चले गये. लिहाजा पोषणयुक्त भोजन न देकर सिर्फ पेट भरना ही एकमात्र मकसद रह गया. बाजारीकरण के दौर ने लोगों को पारंपरिक खेती से दूर कर दिया. झारखंड में खेती का इतिहास 350 साल से भी पुराना है. लोग उस समय मकई, मड़ुआ, गोंदली, ज्वार-बाजरा जैसे मोटे अनाजों की खेती किया करते थे, पर लोग धीरे-धीरे उससे दूर होते गये. सिर्फ फायदे की खेती ही अब इसका मकसद बन गया, जबकि गौर करनेवाली बात यह है कि मोटे अनाज में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व मौजूद रहते हैं. अब देखिये, बाजार की हालत क्या हो गयी. जो अनाज पहले गरीबों की थाली में आसानी से उपलब्ध होते थे, आज वो खाना गरीबों की थाली से  अमीरों की थाली में जा पहुंचा है. गरीबों के लिए सिर्फ चावल ही बचा है. वो भी ऐसा चावल, जिसे खाकर गरीब सिर्फ अपना पेट भर सकता है. प्रोटीन और विटामिन की आवश्यकताओं की पूर्ति इससे नहीं हो सकती. बाजारीकरण के बाद बाजार अपने हिसाब से खेती को नियंत्रित करने लगा. आज हालत ये हो गयी है कि खाद व बीज से लेकर कृषि उपकरण के लिए किसान बाजारों पर आश्रित हो गये हैं. हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी किसान और मजदूर वर्ग के लोगों को ही सबसे कम खाना नसीब होता है. खाद्य सुरक्षा की बात होती है, लेकिन दाल की स्थिति देख लीजिये. दाल लोगों की थाली से कितनी दूर होती जा रही है. 

सवाल : खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से राज्य कैसे आत्मनिर्भर बनेगा. 

जवाब : झारखंड में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहले किसानों को आत्मनिर्भर बनाना होगा. कृषि की प्लानिंग करनी होगी. जो भी कृषि योग्य जमीन है, उसे हर हाल में अतिक्रमण से बचाना होगा. सरकार को खेती और किसानों के प्रति संवेदनशील होना होगा. कई तरह के प्रयोग हर जगह किये जाते हैं और सक्सेस स्टोरी के नाम पर उसे दिखाया जाता है, पर उसके पीछे की सच्चाई यह है कि आप प्रकृति के खिलाफ जाकर कोई कार्य कर रहे हैं, तो उसका खामियाजा आपको भविष्य में भुगतना ही पड़ेगा, क्योंकि प्रकृति ने हर चीज को अपने तरीके से बनाया है. उदाहरण के रूप में गन्ने की खेती को ही लीजिए. गन्ने की खेती वैसी जगह होती है, जहां पर पानी काफी मात्रा में पाया जाता है, लेकिन अगर कोई किसान पलामू में गन्ने की खेती करता है और अच्छा उत्पादन होता है, तो उसकी खूब वाहवाही होती है. इसके ठीक उलट गन्ने की खेती कर वह किसान अपना और आसपास के किसानों के लिए समस्या खड़ी करता है. यह समस्या तत्काल नजर नहीं आती है, लेकिन भविष्य में इन किसानों के समक्ष वह समस्या उत्पन्न हो जाती है. यही कारण है कि मैं हमेशा कृषि प्लानिंग की बात करता हूं. कृषि प्लानिंग के तहत हमें किसानों से यह सुनिश्चित कराना होगा कि किसान प्रकृति के अनुसार ही खेती करें. जिस जगह पर जिस चीज की खेती बेहतर तरीके से हो सकती है, उस जमीन पर उसी प्रकार की खेती करें. जैसे- अगर पलामू की जमीन में दलहन की खेती अच्छी हो सकती है या वहां की जलवायु में कम पानी वाली फसलों का उत्पादन हो सकता है, तो उन्हीं फसलों के उत्पादन पर विशेष जोर देना चाहिए. किसानों को मोटे अनाजों के उत्पादन पर भी जोर देना चाहिए, ताकि भोजन में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व सभी को आसानी से मिल सके. 

सवाल : राज्य में अनाजों के भंडारण की क्या स्थिति है. 

जवाब : राज्य में अनाजों के भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं है. यह इस प्रदेश की गंभीर समस्या है. भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण हर साल सैंकड़ों टन अनाज यूं ही बर्बाद हो जाते हैं. रांची का ही जिक्र करें, तो एफसीआइ गोदाम का हाल देख लीजिए. वहां भी सैंकड़ों टन चावल बर्बाद हो रहे हैं. यह सिर्फ झारखंड तक ही सीमित नहीं है. पूरे देश का हाल देख लीजिए कि भंडारण की क्या स्थिति है. खुले में अनाज के सड़ने की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं. अगर किसान अनाजों का सरप्लस उत्पादन कर भी रहे हैं, तो सरकार के पास उन्हें खरीद कर रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. लोगों तक वो अनाज पहुंच ही नहीं पा रहे हैं. इस कारण आज भी कई लोग आधा पेट खाना खाकर रहने को विवश हैं, वहीं दूसरी तरफ रख-रखाव के अभाव में अनाज सड़ रहा है. सब्जियों की भी वही स्थिति है. अगर किसानों को तुरंत बाजार नहीं मिल पाता है, तो किसानों की सब्जियां यूं ही बर्बाद हो जाती हैं. मजबूरन किसानों को अपनी मेहनत की कमाई को सड़कों पर फेंकना पड़ता है. अगर किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था की जाती और सही समय पर बाजार मिलता, तो कम-से-कम किसान अपनी सब्जियों को वहां रखवा देते, जिससे उनकी सब्जियां बर्बाद होने से बच जातीं. इससे यह लाभ होता कि लोगों को सस्ते दामों में पौष्टिक सब्जियां उपलब्ध हो जातीं. दूसरे देशों में सरकार किसानों को लेकर कितनी संवेदनशील है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां कृषि उत्पादन वाले क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज बनाये गये हैं. इन कोल्ड स्टोरेज में किसान अपने बीज और कृषि उत्पाद रख सकते हैं. इसलिए खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए भंडारण की उचित व्यवस्था होनी चाहिए. 

सवाल : राज्य में खाद्य वितरण की क्या स्थिति है. 

जवाब : जन वितरण प्रणाली के क्षेत्र में सरकार ने बेहतर कार्य किया है. इसमें अभी और सुधार की जरूरत है. सरकार 35 किलोग्राम चावल बांट कर अपना पल्ला झाड़ लेती है, जबकि चावल 35 किलोग्राम या उससे कम मिलता है, यह बात सभी जानते हैं. राशन डीलरों की मनमानी भी कोई नयी बात नहीं है. सरकार को इन बिंदुओं पर तत्काल सुधार करने की जरूरत है. सिर्फ चावल से ही सभी पोषक तत्व नहीं मिलते हैं. दाल को भी जन वितरण प्रणाली के तहत लाना होगा, ताकि गरीबों को सस्ती दाल मिल सके और और उनके आहार में प्रोटीन की कमी न हो. झारखंड में  दाल का उत्पादन काफी अच्छा होता है. सरकार खुद इस पर विचार कर सकती है. खाद्य सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है वितरण. इस लिहाज से अनाज का वितरण सही तरीके से और सही लाभुकों को हो, यह सरकार की महती जिम्मेवारी है. 

सवाल : लोगों को पोषणयुक्त भोजन देने संबंधी सरकार की क्या जिम्मेदारी है.

जवाब : एक रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड के लोगों की औसत लंबाई धीरे-धीरे कम हो रही है. यह कोई आनुवांशिक लक्षण नहीं, बल्कि पोषणयुक्त आहार की कमी से सूबे के लोगों की लंबाई धीरे-धीरे कम हो रही है तथा शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पा रहा है. यही कारण है कि किसान अब पारंपरिक खेती से दूर होते जा रहे हैं. मोटे अनाज का उत्पादन और सेवन भी काफी कम हो रहा है, जिसके चलते पहले जो मोटे अनाज से प्रोटीन और विटामिन लोगों को मिलता था, वो अब नहीं मिल पा रहा है. बाहर से आप प्रोटीन ले नहीं रहे हैं, क्योंकि आप की कमाई इतनी अच्छी नहीं है. दूध पीना कभी खान-पान की शैली में शामिल रहा ही नहीं. इस वजह से बचपन से ही यहां के बच्चे कुपोषण का शिकार होने लगे हैं. एक उदाहरण देखिए- जापान के लोग छोटे कद के होते हैं, लेकिन इस अवधारणा को अब जापान झूठला रहा है. मेरे पास पहले एक जापानी शिक्षक आया करते थे, जिनकी लंबाई कुछ कम थी, लेकिन कुछ साल बाद उन्हीं शिक्षक के छात्र जब मेरे पास आये, तो उनकी औसत लंबाई में आठ से नौ इंच की बढ़ोत्तरी दिखी. यह सिर्फ बेहतर खानपान से हुआ है. 

सवाल : प्रदेश के लोग भी मांस-मछली का सेवन करते हैं, इसके बावजूद उनका शारीरिक विकास क्यों नहीं हो पाता?

जवाब : देखिये, इसे समझने की जरूरत है. राज्य के 90 फीसदी लोग मांसाहारी हैं. अगर दूसरे देशों की तुलना करें, तो दूसरे देशों में एक साल में प्रति व्यक्ति 370 किलोग्राम मांस का सेवन करता है, लेकिन झारखंड में इसकी मात्रा काफी कम है. अगर अंडों की बात करें, तो दूसरे देशों में प्रति व्यक्ति अंडे का उपभोग 1000 होता है, वहीं झारखंड में यह आंकड़ा 100 से 150 तक ही है, तो इसका असर तो होगा ही. यहां के लोग संसाधन रहने के बावजूद उसका सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. इसको लेकर सरकारें भी संवेदनशील नहीं दिखती हैं. इसका व्यापक असर यह होता है कि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीछे होते जाते हैं. 

सवाल : खाद्य सुरक्षा से घर-बारी का सीधा संबध कैसे है. 

जवाब : राज्य में घर-बारी का प्रचलन पहले था और आज भी कई गांवों में यह प्रचलन है. बोलचाल की भाषा में घर-बारी का उपयोग होता था, पर अब यह खेती-बारी हो चुका है. घर-बारी कहने का तात्पर्य यह है कि पहले गांवों में लोगों के घर बड़े होते थे. घर के आसपास ही बाड़ी होती थी, जिसमें तरह-तरह की सब्जियां किसान लगाते थे और सुबह-शाम उन सब्जियों को तोड़ कर उपयोग करते थे. घर में ही कृषि उपकरण रखने के लिए अलग घर, मुर्गा-मुर्गी, बतख, गाय, बकरी, सूकरों के लिए अलग-अलग घर होते थे. इससे घर के लोगों को अंडा और मीट की उपलब्धता आसानी से होती थी और जरूरत पड़ने पर बकरी या सूकरों को बेच कर पैसे भी अर्जित करते थे, पर वर्तमान दौर में उस चीज से लोग दूर होते जा रहे हैं. माइनिंग और औद्योगिक क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हुआ. इसके  बाद शहरीकरण के दौर में भी कई लोग विस्थापित हुए. घरों का आकार छोटा होता गया. खेती व्यावसायिक होती गयी. अब विस्थापितों को सरकार जो घर देती है, उसका इस्तेमाल सिर्फ रहने के लिए ही हो सकता है. खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमें प्रकृति के साथ रहना होगा. कृषि प्लानिंग, भंडारण और वितरण पर खासा ध्यान देना होगा. जब सरकार का मकसद सिर्फ लोगों का पेट भरना नहीं, बल्कि पोषणयुक्त आहार देना होगा, तब जाकर सही मायनों में खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य पूरा हो पायेगा.