ssakshtkaar

  • Nov 20 2017 11:49AM

सरकारी नियंत्रण से मुक्त हों ग्राम पंचायतें

सरकारी नियंत्रण से मुक्त हों ग्राम पंचायतें
झारखंड गठन के 17 वर्ष पूरे होने और इस राज्य में दो बार पंचायत चुनाव हो जाने के कारण यह विचार किया जाना जरूरी है कि गांवों के विकास की धुरी समझी जानेवाली पंचायतें किस हद तक सक्षम और सफल हैं. भारत में कंप्यूटर क्रांति के अग्रदूत बन कर उभरे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह कह कर खूब तालियां बटोरी थीं कि गरीबों के हित में केंद्र से चला एक रुपया लाभुक तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे रह जाता है यानी दिल्ली से भारत के किसी भी गांव की दूरी तय करने के दौरान सौ पैसे में से पचासी पैसे बिचौलिए हड़प लेते हैं.

राजीव गांधी ने अपनी इसी सोच के तहत ग्राम पंचायतों को दिल्ली से सीधे विकास राशि देने की नींव डाली थी. उस समय यह सब देख-सुन कर बहुत अच्छा लगा था, लेकिन परिणाम की बारी आयी, तो इसमें बड़ा घालमेल उजागर होने लगा. अब तो यह न केवल कहा जा रहा है, बल्कि माना भी जा रहा है कि विकास राशि में गड़बड़झाला करनेवालों में पंचायतें भी एक नया हिस्सेदार बन गयी हैं.

झारखंड में 32 वर्षों बाद 2010 में पंचायतों का पुनर्गठन हुआ था. इन 32 वर्षों में लोग पंचायती राज व्यवस्था को लगभग भूल चुके थे. एक तरह से एक पीढ़ी ही खत्म हो गयी थी. पहले पंचायत चुनाव में उभर कर आये जनप्रतिनिधियों का अधिकतर समय यह सीखने में ही चला गया कि पंचायती राज व्यवस्था क्या चीज है, फिर 2015 में जब दूसरी बार पंचायतें अस्तित्व में आयीं, तो उनका व्यावहारिक रूप-स्वरूप दाग-धब्बों वाला हो गया.
 
झारखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियां बताती हैं कि यहां के सभी गांवों का विकास किसी एक सूत्र के भरोसे संभव नहीं है. क्षेत्रवार गांवों की जरूरतों में अंतर है. यह अंतर समझे बिना सचिवालय में बैठ कर गांवों के उत्थान की नीतियां तय नहीं की जा सकतीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद रघुवर दास ने सराहनीय पहल की. उन्होंने गांवों की योजनाएं गांवों में ही और गांवों के निवासियों द्वारा ही बनाने की रणनीति पर अमल करना शुरू किया. यह जब पूरी तरह हकीकत में बदल जायेगा, तब झारखंडी गांवों का नजारा कुछ और होगा. अभी तो त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था के तहत पंचायतें काम कर रही हैं, लेकिन वे खुद को विधानसभा या संसद से कम नहीं समझतीं. पंचायतों का गहरा रिश्ता जब तक ग्रामसभाओं से कायम नहीं होगा, तब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की लहर पहुंचना शेष ही रहेगा. 

दरअसल पंचायतों का गठन सत्ता के विकेंद्रीकरण की नीयत से किया गया था, लेकिन कालक्रम में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पंचायतों की आर्थिक सहायता का कुछ ऐसा सिलसिला जमा कि सब कुछ केंद्रीकृत लगने लगा. पंचायत प्रतिनिधि ठेका-पट्टा में अधिक दिलचस्पी लेने लगे. पंचायतों के माध्यम से गांवों का विकास अपनी पुरानी जगह पर कायम रहा. बार-बार मांग उठने लगी कि गांवों के विकास के लिए पंचायतों के माध्यम से पूरी राशि जाये. इस व्यवस्था के तहत विधायकों की स्थिति कुछ ढीली पड़ गयी. विधायक और मुखिया में एक तरह से तनाव पैदा हो गया. छोटे-से-छोटा काम हो जाने पर भी उनमें श्रेय लेने की होड़ लग गयी. ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक राज्य और केंद्र मुख्यालय पर पंचायतें आश्रित रहेंगी. यदि ऐसी व्यवस्था बना दी जाये कि पंचायतें खुद कमाएं और योजनाओं पर खुद ही खर्च करें, तो उनकी जवाबदेही बढ़ जायेगी. जाहिर है कि उसमें बड़ी धनराशि लगेगी, जिसका पंचायतों द्वारा अर्जित करना अभी नामुमकिन सा लगता है.

इस हाल में रास्ता यही बचता है कि पारंपरिक ग्रामसभाएं विकास की अपेक्षित लाइनें तय करें, जिन पर काम पंचायतों के माध्यम से हो. ये दोनों एजेंसियां एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्वी भाव से पेश आने की बजाय परस्पर सहयोग की भावना रखें और एक-दूसरे को पूरक समझें, तो दोनों को ही सुविधा होगी और उनसे जुड़े गांवों का भी भला होगा. गांवों में सामान्य रूप से सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं हैं. हर गांव की अपनी अलग-अलग जरूरत है, जिस पर पूरी सावधानी और सतर्कता से विचार कर आगे बढ़ने से मंजिल पाना आसान हो जायेगा. ग्रामीण जब सक्षम बन जायेंगे, तो अपने विकास को स्थायित्व देने अथवा उसका विस्तार करने के लिए वे राजस्व चुकाने में कोई कोताही नहीं करेंगे. पंचायतों के आत्मनिर्भर बनने का मंत्र इसी में छिपा हुआ है. यह बात नीति-नियंता सरकारों को भी समझनी होगी.
 
राज्य सरकार द्वारा गांवों में योजना बनाओ अभियान चलाने के बावजूद यह परिपाटी नहीं बन सकी है. जब हर कोई यह समझ लेगा कि अपने विकास की रूपरेखा उसे ही तय करनी है, तो उसका आत्मविश्वास और अधिक बढ़ेगा. इस स्थिति में हर किसी में जागरूकता बढ़ेगी, दिलचस्पी बढ़ेगी और सोच-समझकर काम करने की इच्छाशक्ति भी बढ़ेगी. इस प्रकार पूरी पंचायत या यूं कह लें कि पूरा राज्य विकास के लिए न केवल चिंतित होगा, बल्कि उसके लिए वह पुरुषार्थ भी करेगा, क्योंकि आखिरकार जवाबदेह वही होगा. अलबत्ता राज्य सरकार कार्यकारी एजेंसी की तरह कुछ तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन जरूर कर सकती है. 

जाहिर है कि ऐसे कार्यों में धन की जरूरत पड़ेगी. ग्रामसभाओं के माध्यम से जब सारा कुछ तय होने लगेगा, तब जाहिर है कि सामूहिकता की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी. निर्माण और संरक्षण सामुदायिक जवाबदेही होगी. जब ऐसा होने लगेगा, तब पंचायतों में भ्रष्टाचार नहीं होगा. यदि होगा भी, तो न्यूनतम स्तर पर होगा. योजनाओं के सूत्रण से लेकर निर्धारण और क्रियान्वयन तक सामुदायिक नियंत्रण की परिपाटी विकसित होते ही सरकारी नियंत्रण की जरूरत खत्म हो जायेगी. जब तक पंचायतें सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं होंगी, तब तक उनसे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि अभी तो वे सरकार की बाट जोहती रहती हैं और सरकार उनमें अपना वोट देखती है. दोनों को यह समझना होगा कि सारा कुछ विकास पर आश्रित है. जब स्थायी विकास होने लगेगा, तब किसी को किसी की बाट जोहने की जरूरत नहीं रहेगी. सभी बहुत तसल्ली और विश्वास के साथ अपना-अपना काम करते रहेंगे.

पद्मश्री अशोक भगत
(सचिव) विकास भारती