yojana

  • May 10 2017 1:10PM

त्रिस्तरीय पंचायत में दो इकाइयों के पास कोई फंड नहीं, विकास योजनाओं पर पड़ता प्रभाव

त्रिस्तरीय पंचायत में दो इकाइयों के पास कोई फंड नहीं, विकास योजनाओं पर पड़ता प्रभाव

32 वर्षों बाद 2010 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में पंचायती राज की तीनों इकाई ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद को विकास फंड मुहैया कराया गया था. इस दौरान 13वें वित्त आयोग व बीआरजीएफ जैसी फंड इन तीनों इकाई को मुहैया कराया गया था. लेकिन, 2015 के पंचायत चुनाव के बाद त्रिस्तरीय पंचायती राज में पंचायत समिति व जिला परिषद विकास फंड से वंचित है. केवल ग्राम पंचायतों को ही केंद्र व राज्य सरकार द्वारा अलग-अलग योजनाओं की राशि मुहैया करायी गयी है. केंद्र सरकार से 14वें वित्त आयोग की राशि सीधे पंचायतों के खाते में भेजी जा रही है. अब पंचायत समिति व जिला परिषद इस फंड से वंचित है.

ऐसी परिस्थिति में पंचायत समिति व जिला परिषद का काम केवल मॉनिटरिंग तक ही सिमट कर रह गया है. राज्य सरकार कुल 13 विभागों की अधिसूचना जारी कर पंचायती राज के अधीन किया गया है. इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि एवं मत्स्य, लघु सिंचाई, पीएचइडी, समाज कल्याण, राजस्व, पशुपालन, खाद्य आपूर्ति, कल्याण विभाग, ग्रामीण विकास समेत 13 विभाग हैं. लेकिन, अधिसूचना जारी होने के बावजूद इन विभागों को पूर्ण रूप से पंचायती राज के अधीन नहीं सौंपा गया है. कई विभागों की योजनाओं पर पंचायत समिति व जिला परिषद से स्वीकृति भी नहीं ली जाती है. इसे लेकर अक्सर सवाल भी उठते रहे हैं. कृषि व मत्स्य विभाग से तालाबों की अनुशंसा का पावर भी 2015 में वापस लिये जाने का जोरदार विरोध हुआ था

फंड की मांग पर जिप व पंचायत आमने-सामने

देवघर जिले में कुल 192 पंचायतें हैं. इन पंचायतों में 14वें वित्त आयोग की राशि विकास के लिए भेजी गयी है. जिला परिषद के अध्यक्ष समेत 11 सदस्यों ने पिछले दिनों बैठक कर सरकार से पत्राचार कर 14वें वित्त आयोग की राशि से 20 फीसदी का हिस्सा जिला परिषद को दिये जाने की मांग रखी है. जिला परिषद के इस मांग पर ग्राम पंचायतों में उबाल आ गया है. मुखिया ने भी ग्राम पंचायत से 14वें वित्त आयोग की राशि में 20 की कटौती पर आपत्ति दर्ज कर दी है.

विकास के नाम पर हो रही सिर्फ खानापूर्ति 

सरकार और संविधान ने पंचायती राज अधिनियम के तहत गांव के विकास के लिए पंचायती राज व्यवस्था लागू की है. लेकिन, पंचायत प्रतिनिधियों के लिए कोई नियुक्ति हो या चुनाव हो या फिर विकास का कोई भी कार्य हो, सिर्फ विकास के नाम पर खानापूर्ति ही की जाती है. पंचायती राज व्यवस्था लोगों को ठगने का एक जरिया बन गया है. यहां पर ग्रामसभा का आयोजन भी नहीं होता है और बिना ग्रामसभा का आयोजन किये ही सिर्फ कागज पर हस्ताक्षर कर सभी कार्य घोषित कर दिये जाते हैं. ऐसे में संविधान द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने का जो उद्देश्य था, वह अब ऐसी व्यवस्था से सफल साबित होता नहीं दिख रहा है.

पंचायती राज दिवस पर कार्यक्रम आयोजित

24 अप्रैल को देशभर में पंचायती राज दिवस मनाया गया. इस अवसर पर बोकारो जिले के कसमार प्रखंड स्थित गरी पंचायत सचिवालय में भी कई कार्यक्रमों का आयोजत हुआ. गरी पंचायत सचिवालय में मुखिया संजय कपरदार की अध्यक्षता में बैठक का आयोजन हुआ. वहीं, बैठक में जन-समस्याओं पर त्वरित समाधान, क्षेत्र के सर्वांगीण विकास करने, सरकार द्वारा संचालित जन-कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सहित अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गयी. 

सरपंच और पंच का अब तक नहीं हुआ चुनाव

राज्य में सरपंच और पंच का चुनाव नहीं होने से पंचायती राज व्यवस्था अधूरी मानी जा रही है. 1992 में 73वां संविधान संशोधन कर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गयी, जिसमें जिला स्तर पर जिला परिषद, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति सदस्य व वार्ड सदस्य तथा पंचायत स्तर पर मुखिया, पंच व सरपंच जैसे पदों का प्रावधान किया गया. झारखंड में 2010 से अब तक दो बार पंचायत चुनाव हो चुका है. बावजदू इसके, दोनों बार ही सरपंच और पंच का चुनाव नहीं किया जा सका. झारखंड को छोड़ शेष अन्य राज्यों में सरपंच और पंच के चुनाव हो चुके हैं. इसके विपरीत झारखंड में उक्त दोनों पदों के चुनाव को लेकर अब तक अनदेखी की गयी है. पंचायत स्तर पर घरेलू विवाद व ग्राम स्तर पर हुए विवादों का निबटारा करने का अधिकार सरपंच और पंच के पास होता है. सरपंच और पंच का चुनाव नहीं होने से घरेलू व ग्राम स्तर पर हुए विवाद थाना तक पहुंच जाते हैं. वर्तमान में राज्य के मुखिया को किसी भी प्रकार के विवाद का निबटारा करने का कोई भी कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है. वहीं, विधायकों और सांसदों ने भी पंचायती राज अधिनियम का गहन अध्ययन नहीं किया है. तभी तो सरपंच और पंच जैसे महत्वपूर्ण रिक्त पदों के लिए उनकी ओर से आज तक कोई सवाल नहीं उठाये गये हैं. अत: कहना गलत नहीं होगा कि राज्य में सरपंच और पंच का चुनाव नहीं होने से पंचायती राज व्यवस्था अधूरी ही है.

ग्रामीणों को नहीं मिलता कोई लाभ

राज्य में पंचायती राज व्यवस्था है, बावजूद इसके ग्रामीणों को कोई समुचित लाभ अब तक नहीं मिल पाया है. अगर विकास की योजनाएं बनती भी हैं, तो सिर्फ हवा-हवाई ही दिखती है. विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने में न तो प्रशासन विशेष दिलचस्पी दिखाते हैं और न ही पंचायत जनप्रतिनिधि. क्षेत्र के ग्रामीण अपने व अपने इलाके के विकास के लिए विभाग-दर-विभाग चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन सिर्फ कोरा आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता है.

पंचायती राज के बावजूद नहीं होता विकास

पूर्वी सिंहभूम जिले की दलदली पंचायत अंतर्गत गांव है हरमाडीह. इस गांव में पिछले एक साल में मात्र एक बार ही ग्रामसभा का आयोजन हुआ है. राज्य में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बावजूद दलदली पंचायत में विकास की बयार नहीं बह रही है. इतना ही नहीं हरमाडीह गांव में खुलेमुक्त शौचालय की योजना ही दम तोड़ रही है. इस गांव में मात्र एक शौचालय ही है. इससे पता चलता है कि इस गांव का विकास किस गति से हो रहा है. सबसे आश्चर्य बात तो यह है कि इस ओर न तो पंचायत जनप्रतिनिधियों का विशेष ध्यान जा रहा है और न ही प्रशासन का.

पंचायत चुनाव के बाद भ्रष्टाचार और हावी 

झारखंड में दूसरी बार हुए पंचायत चुनाव के बाद लोगों में एक आस जगी थी कि अब भ्रष्टाचार में कमी आयेगी, लेकिन इसका ठीक उलटा हुआ है. पंचायत चुनाव के बाद भ्रष्टाचार और ज्यादा हावी हो चुका है, जिसके प्रभाव काम की गुणवत्ता पर भी साफ दिखता है. पहले लोगों का कहना था कि हर काम में बिचौलियापन हावी था, लेकिन वर्तमान समय में भी इसमें कोई कमी नहीं आयी है. आज स्थिति यह उत्पन्न हो गयी है कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर बिना चढ़ावा के काम नहीं हो पा रहा है.

गरीबों को नहीं मिलता पेंशन का लाभ

इन दिनों पेंशन की राशि प्राप्त करने को लेकर लोग काफी परेशान हैं. खासकर गरीब तबका तो इस परेशानी से हाफ रहा है. वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन और विकलांगता पेंशन के लाभुकों को राशि भी नहीं मिल पा रही है. बिना चढ़ावा के इन पेंशनधारियों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है. कार्यालयों का चक्कर लगा-लगा कर लाभुक थक गये हैं, लेकिन इनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है.